झारखंड : इन 5 कारणों से पटरी से उतर गया भाजपा का डबल इंजन

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 23 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 के सोमवार को आये परिणामों ने प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा को करारा झटका दिया है और सत्ता से बेदखल कर दिया है। राज्य में भाजपा ने सहयोगियों को दरकिनार करके अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था, यही निर्णय उसे भारी पड़ गया और दूसरी तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और लालूप्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी ने मिल कर चुनाव लड़ा और भाजपा के भगवा किले पर फतह कर ली। पार्टी ने इस बार 65 पार का नारा दिया था, परंतु वह इसका आधा आँकड़ा भी पार करने में सफल होती दिखाई नहीं दे रही है। पार्टी ने दूसरा नारा डबल इंजन का दिया था, परंतु उसका झारखंड का इंजन ही डिरेल हो गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड में सत्तारूढ़ भाजपा की हार के पाँच प्रमुख कारण रहे। सहयोगियों से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला, वर्तमान सीएम रघुवर दास के फैसलों से एक बड़े समुदाय की नाराजगी के बावजूद सीएम का चेहरा नहीं बदलना, अन्य दलों से आये विधायकों को टिकट देना और पार्टी के ही नेताओं की अवगणना करने से उनके बागी तेवर, युवाओं और आदिवासियों की नाराजगी, स्थानीय मुद्दों के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर प्रचार करना।

1 अकेले चुनाव लड़ने के फैसले से बँट गया वोट : सबसे पहले उस बड़े कारण की बात करते हैं, जिसने भाजपा के वोटों को बाँटने का काम किया। वर्ष 2000 में गठित हुए झारखंड राज्य की देश और दुनिया में कोयले और यूरेनियम की खदानों के लिये पहचान है। दूसरी बड़ी पहचान है दलित और आदिवासी बहुल राज्य की। इस राज्य में भाजपा प्रदेश के गठन से ही ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (AJSU) के साथ मिल कर चुनाव लड़ती आ रही है। 2014 में भी दोनों ने मिल कर चुनाव लड़ा था और 81 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ने 37 तथा आजसू ने 5 सीटें जीत कर सरकार बनाने के लिये जरूरी 41 सीटों का आँकड़ा छू लिया था। पिछले चुनाव में 5 सीटें जीतने वाली आजसू ने इस बार के चुनाव में अधिक सीटों की माँग की तो भाजपा ने उससे गठबंधन तोड़ लिया और अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। भाजपा ने एक और सहयोगी दल जो उसके साथ राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए में शामिल है, रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के साथ भी गठबंधन नहीं किया। हालाँकि इसके पीछे कारण यह माना जा रहा है कि भाजपा ने महाराष्ट्र में उसके साथ शिवसेना ने जो किया कि विरोधी दलों के साथ जाकर सरकार बना ली और उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह सत्ता से बाहर निकाल दिया, ऐसा न हो, इसीलिये उसने इस चुनाव में फूँक-फूँककर कदम रखते हुए खुद के लिहाज से तो निर्णय सही ही किया था, परंतु उसका दाँव उलटा पड़ गया।

2 स्थानीय मुद्दों की जगह राष्ट्रीय मुद्दों पर किया प्रचार : पार्टी को उम्मीद थी कि राष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के चेहरे उनकी सरकार के काम और उनका प्रदेश में आकर रैलियाँ करने से तथा प्रदेश में 5 वर्ष तक सफल तरीके से सरकार चलाने वाले रघुवर दास के नेतृत्व का फायदा मिलेगा, जो नहीं हो सका। दूसरी तरफ जिन सहयोगियों को उसने अलग किया, वह अलग से चुनाव लड़े जिससे भाजपा का वोट बँट गया।

3 अपनों की नाराज़गी और भीतरघात ने नुकसान पहुँचाया : तीसरा बड़ा कारण यह रहा कि पार्टी ने विरोधी दलों से भाजपा में आये विधायकों को टिकट दिये और पार्टी के ही जो नेता टिकट की उम्मीद कर रहे थे, उनका पत्ता काट दिया। इससे पार्टी में नेताओं ने बागी तेवर अपनाये। कुछ नेताओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ कर पार्टी के वोटों में सेंध लगाई तो कुछ नेताओं ने भीतरघात करके चुपके-चुपके दूसरे दलों के प्रत्याशियों का समर्थन किया। इसका खुलासा होने पर पार्टी ने कुछ बागी नेताओं पर कार्यवाही भी की और 11 नेताओं को 6 साल के लिये पार्टी से बाहर कर दिया। पार्टी से निकाले गये इन नेताओं ने भी खुले तौर पर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ा।

टिकट बँटवारे में ही पार्टी ने एक सीनियर नेता सरयू राय की उपेक्षा कर दी। सरयू राय की उपेक्षा भी पार्टी को भारी पड़ी। सरयू राय की गिनती प्रदेश में ईमानदार नेताओं में होती है। उन्होंने बिहार और झारखंड में न सिर्फ कई घोटालों का पर्दाफाश किया है, बल्कि चारा घोटाले को उजागर करके अदालती जाँच को अंजाम तक पहुँचाने में भी अहम भूमिका निभाई है। इसी प्रकार उन्होंने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को जेल भिजवाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनके और रघुवर दास के बीच रिश्ते ठीक नहीं थे, जिसके कारण उनका टिकट कटा। टिकट कटने का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने जमशेदपुर पूर्व विधानसभा सीट से सीएम रघुवर दास के खिलाफ ही चुनावी ताल ठोक दी। इसका अंजाम यह है कि सीएम इस सीट पर पीछे चल रहे हैं और सरयू राय आगे चल रहे हैं। इस प्रकार वह भी भाजपा को झटका देने वाले एक प्रमुख कारण बने।

4 रघुवर दास को रिपीट करने से हुआ नुकसान : झारखंड में 26.3 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय की है और 28 सीटें आदिवासियों के लिये आरक्षित हैं। इससे समझा जा सकता है कि प्रदेश में इस समुदाय की भूमिका कितनी बड़ी है। दूसरी तरफ भाजपा ने वर्तमान सीएम रघुवर दास के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का फैसला किया, जो कि आदिवासी चेहरा नहीं हैं। विरोधी महा गठबंधन ने इसका भरपूर लाभ उठाया और अपने आदिवासी चेहरे हेमंत सोरेन को प्रमुख रूप से प्रचारित किया। आदिवासी समुदाय से अर्जुन मुंडा को सीएम पद का उम्मीदवार बनाने की माँग हो रही थी, जिसे भी भाजपा ने कोई अहमियत नहीं दी। दूसरी तरफ भाजपा को यह विश्वास था कि 5 वर्ष में रघुवर दास सरकार ने जो काम किये हैं, उन्हें देखते हुए चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिलेगा, परंतु यहाँ भी पार्टी का दाँव उल्टा पड़ गया। रघुवर दास सरकार के किये गये कामों पर विरोधी महा गठबंधन की ओर से की गई उनके कामों की आलोचना भारी पड़ गई। क्योंकि रघुवर दास के कार्यकाल में झारखंड में कुछ ऐसी घटनाएँ भी हुईं, जिनका प्रचार करके विरोधी गठबंधन फायदा उठा ले गया और रघुवर दास को उन घटनाओं ने चोट पहुँचाने का काम किया।

5 युवाओं का असंतोष पड़ा भारी : पिछले साल 15 नवंबर को झारखंड स्थापना दिवस के मौके पर प्रदर्शन करने वाले पारा शिक्षकों पर लाठीचार्ज की घटना ने लोगों में सीएम के विरुद्ध नाराजगी पैदा की थी। इस लाठीचार्ज में कई पारा शिक्षक घायल हुए थे, जिनमें से एक की मृत्यु भी हो गई थी। इसके विरोध में कई दिनों तक शिक्षक हड़ताल पर रहे थे और बच्चों की पढ़ाई बिगड़ी थी। प्रदेश में पारा शिक्षकों की संख्या 70 से 80 हजार है।

इसके बाद इसी साल सितंबर में भी आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं पर भी पुलिस लाठी चार्ज हुआ, जिसका भी राज्य में कड़ा विरोध हुआ और रघुवर दास की छवि को धक्का लगा। हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे को तो जोर-शोर से उठाया ही। रघुवर दास सरकार की ओर से काश्तकारी कानून (CNT ACT) में बदलाव का फैसला भी उनके विरुद्ध गया। विपक्ष ने आदिवासियों के लिये जल, जंगल और ज़मीन का मुद्दा भी उछाला और उनके कल्याण की बात की। लोगों के दिमाग में यह बात बैठाने में भी विपक्ष सफल रहा कि आदिवासी नहीं होने से रघुवर दास उनके कल्याण की बात नहीं कर सकते।

पिछले 5 वर्ष में सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों की बहाली को लेकर भी हंगामा बरपा रहा। सरकार ने हाई स्कूल शिक्षकों की नियुक्ति की तो दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों को नौकरी मिल जाने का मामला भी विपक्ष ने जमकर उछाला। इससे राज्य के युवाओं में नाराजगी थी ही, ऊपर से बीते 5 वर्ष में राज्य लोकसेवा आयोग की ओर से एक भी परीक्षा नहीं ली गई, इससे राज्य के शिक्षित युवाओं में भी रोष और असंतोष है। इस प्रकार बेरोजगारी और रोजगार के मोर्चे पर भी रघुवर दास को नुकसान उठाना पड़ा।

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