महाराष्ट्र से पहले गोवा और मणिपुर में भी रातों रात बाज़ी पलट चुके हैं मोदी और शाह

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 24 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। शुक्रवार शाम को मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार और कांग्रेस नेताओं की बैठक हुई थी। दो घण्टे चली बैठक में महाराष्ट्र में मिली-जुली सरकार बनाने की चर्चा हुई और सरकार में भागीदारी के मुद्दे तय होने के बाद उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र का महाराजा बनाने पर सहमति हुई। इसके बाद रात को ठाकरे सहित सभी नेता चैन से सो गये और खास कर ठाकरे मुख्यमंत्री बनने के सपनों में खो गये, परंतु जब सुबह उनकी आँख खुली तो भाजपा नेता देवेन्द्र फडणविस महाराष्ट्र के मुखिया बन चुके थे। यह देख कर उद्धव ठाकरे और उनके साथियों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई, जो कि स्वाभाविक भी था। रातों रात पलटी बाज़ी ने पूरे देश की सियासत को हिला दिया, परंतु ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी इससे पहले वर्ष 2017 में गोवा और मणिपुर में इसी तरह रातों रात सरकार बना चुके हैं। इसलिये कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में भी इन दोनों ने सोच-समझ कर पूरी रणनीति के साथ ही सरकार गठित की होगी।

गोवा में आधी रात को ऐसे पलटी थी बाज़ी

गोवा में 2017 में विधानसभा चुनाव हुए थे। 40 सदस्यों वाली विधानसभा में 17 सीटें जीत कर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी। इसलिये माना जा रहा था कि कांग्रेस ही प्रदेश में सरकार का गठन करेगी, परंतु रातों रात भाजपा नेता नितिन गड़करी सक्रिय हुए और उन्होंने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह तथा पीएम नरेन्द्र मोदी के साथ मिल कर सुबह होने से पहले ही गोवा विधानसभा की तस्वीर बदल दी। परिणाम यह हुआ कि 17 सीटें जीतने वाली कांग्रेस मुँह देखती रह गई और 13 सीटें जीतने वाली भाजपा ने बहुमत का आँकड़ा जुटा कर सरकार बना दी। भाजपा ने गोवा में निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेकर सरकार बनाई और मनोहर पर्रिकर ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हालाँकि पर्रिकर के निधन के बाद अब प्रमोद सावंत गोवा के मुख्यमंत्री हैं।

मणिपुर में भी दोहराई थी गोवा वाली रणनीति

गोवा की तरह ही मोदी शाह की जोड़ी ने पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में भी इसी रणनीति से पहली बार भाजपा की सरकार बनाई। मणिपुर में भी 2017 में ही विधानसभा के चुनाव हुए थे। 60 सदस्यों वाली मणिपुर विधानसभा में भी कांग्रेस सर्वाधिक 28 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और भाजपा को मात्र 21 सीटें मिली थी। यहाँ भी आँकड़े बता रहे थे कि कांग्रेस सरकार बनाएगी, परंतु मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस का गणित बिगाड़ दिया और रातों रात स्थानीय छोटी-छोटी पार्टियों तथा निर्दलीय विधायकों का समर्थन जुटा कर सरकार बना दी थी। भाजपा को सरकार बनाने के लिये नागा पीपुल्स फ्रंट के 4, नेशनल पीपुल्स पार्टी के 4, लोक जनशक्ति पार्टी और ऑल इण्डिया तृणमूल कांग्रेस के एक-एक विधायक के अलावा निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिल गया था, जिनके बलबूते भाजपा ने पूर्वोत्तर के इस राज्य में पहली बार सत्ता हासिल कर ली। यहाँ पूर्व फुटबॉल खिलाड़ी एन बीरेन सिंह भाजपा नीत गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री हैं।

महाराष्ट्र में छोटी पार्टियों व निर्दलीय विधायकों की खींचातानी

महाराष्ट्र में भी देवेन्द्र फडणविस ने राज्यपाल के समक्ष बहुमत का दावा पेश करते हुए सरकार बनाने की पेशकश की, जिसके बाद राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने शनिवार सुबह राष्ट्रपति शासन हटने के साथ ही उन्हें मुख्यमंत्री और उनके समर्थक एनसीपी नेता अजित पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। फडणविस ने राज्यपाल के समक्ष जो बहुमत का दावा किया है, उसमें भाजपा के 105 विधायकों के अलावा एनसीपी के सभी 54 तथा छोटी पार्टियों और निर्दलीय समेत 11 अन्य विधायकों का समर्थन प्राप्त होने की बात कही है। इस प्रकार कुल 170 विधायकों के समर्थन का दावा पेश किया है। प्रदेश में कुल 288 सीटें हैं, जिनमें से भाजपा ने 105, शिवसेना ने 56, एनसीपी ने 54 और कांग्रेस ने 44 सीटें जीती हैं। अन्य 29 सीटें छोटी-छोटी पार्टियों तथा निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीती हैं। इनमें से ऑल इण्डिया मज़लिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी की पार्टी के दो विधायक चुने गये हैं, जो तटस्थ हैं। उन्होंने किसी भी दल के साथ न जाकर विपक्ष में बैठने का फैसला किया है। अन्य छोटे दलों में बहुजन विकास आघाड़ी के 3, सीपीआई (M)-1, निर्दलीय 13, जन सुराज्य शक्ति-1, क्रांतिकारी शेतकारी पार्टी-1, महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे)-1, पीडब्ल्यूपीआई-1, प्राहर जनशक्ति पार्टी-2, राष्ट्रीय समाज पक्ष-1, समाजवादी पार्टी-2 तथा स्वाभिमानी पक्ष-1 शामिल हैं। अब भाजपा के दावे के बाद महाराष्ट्र में सियासी हलचल मची हुई है और सभी दलों के समक्ष अपने-अपने विधायकों को अपने पाले में बनाये रखने की बड़ी चुनौती है।

शिवसेना और कांग्रेस ने अपने-अपने विधायकों को छुपा दिया है। सबसे बड़ी हलचल एनसीपी विधायकों को लेकर है। एक तरफ भाजपा और अजित पवार का दावा है कि एनसीपी के सभी विधायक उनके समर्थन में हैं, जिनके हस्ताक्षर वाली कॉपी उन्होंने राज्यपाल को भी दी है। वहीं एनसीपी दावा कर रही है कि 54 में से 49 विधायक अपनी पार्टी में वापसी कर चुके हैं। इसके अलावा छोटे दलों तथा निर्दलीय विधायकों की खींचातानी भी देखने को मिल रही है। भाजपा की कोशिश सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिये समर्थकों को एकजुट रखने की है, वहीं विपक्षी दल छोटे दलों के विधायकों तथा निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में खींचने की कोशिशों में जुटे हैं ताकि जब भाजपा सदन में फ्लोर टेस्ट के लिये उतरे तो बहुमत सिद्ध न कर पाये। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन अपनी कोशिशों में कामयाब होता है ?

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