संसद में ‘घुसपैठिये’ : कैसे होगी संसदीय मर्यादा की रक्षा ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 2 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है जिसमें सोमवार को ‘घुसपैठियों’ के मुद्दे पर सत्तादल और विपक्ष के बीच जमकर बहस हुई। विपक्षी नेता अधीर रंजन चौधरी ने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह को ‘घुसपैठिया’ कहा तो पहले संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने अधीर रंजन चौधरी के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे बिना शर्त माफी माँगने की माँग की, जिससे अधीर रंजन चौधरी ने इनकार कर दिया तो जवाब में सत्तारूढ़ दल ने भी कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए उन्हें ‘घुसपैठिया’ कह दिया। इस पर कांग्रेसी सदस्यों ने आपत्ति जताई। पक्ष-विपक्ष के इस मुद्दे पर लोकसभा में जमकर हंगामा हुआ।

ये मामला थमा नहीं था कि अधीर रंजन चौधरी ने केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ‘निर्बला सीतारमण’ कह कर नई बहस को जन्म दे दिया। इसके जवाब में निर्मला सीतारमण ने भी कांग्रेस को करारा जवाब देते हुए प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पर निशाना साधा और कहा कि संसद में कोई जीजा नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार की योजनाओं का लाभ आम आदमी को मिल रहा है, न कि किसी के जीजा या दामाद को। इस पर फिर कांग्रेस ने ही हंगामा मचाया तो निर्मला सीतारमण ने उसका भी जवाब दिया और कहा कि हमारी पार्टी में कोई जीजा नहीं है, सब कार्यकर्ता हैं।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रतीक संसद में जन प्रतिनिधियों के रूप में चुने गये नेताओं के इस प्रकार के बयानों ने संसदीय मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। संसद में देश के विकास और समस्याओं को लेकर पक्ष-विपक्ष के बीच बहस और प्रश्नोत्तरी होनी चाहिये, उसके स्थान पर एक-दूसरे के लिये अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। शब्दों की मर्यादा को और संसदीय मर्यादा को जैसे भुला दिया गया है। ऐसी घटनाएँ संसदीय की गरिमा को ठेस पहुँचा रही हैं और संसद के अंदर नेताओं की इस प्रकार की आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति देश के संसदीय मूल्यों को धूमिल कर रही है। देश की जनता जो इन नेताओं के बयान सुन रही है, वह इनके शब्दों को सुनकर शर्मिंदगी महसूस कर रही है, परंतु सवाल यह है कि क्या ये सम्माननीय नेता अपनी और सदन की गरिमा को बनाये रख पाएंगे, जिस सदन को भूतपूर्व सम्मानित नेताओं ने संबोधित किया है, उसी संसद में इस प्रकार के शब्द प्रयोग संसदीय प्रणाली के अपमान के समान है।

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