देश का सबसे बड़ा तख्तापलट : मोदी-शाह की जीत से कई गुना विराट है स्मृति की अमेठी विजय !

स्मृति ईरानी ने छीनी गांधी परिवार की 42 साल पुरानी विरासत

मोदी-शाह की जीत से भी बड़ी सफलता पाई स्मृति ईरानी ने

संजय गांधी के बाद गांधी परिवार से हारने वाले दूसरे नेता बने राहुल

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 23 मई, 2019। लोकसभा चुनाव 2019 में सबसे बड़ा तख्तापलट अमेठी में हुआ है। वैसे तो चुनावों में बड़े-बड़े दिग्गजों का हारना कोई नई बात नहीं है। किसी एक सीट पर हार का सामना तो देश की एक समय की सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उन जैसे ही लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भी करना पड़ा था, परंतु अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की हार लोकसभा चुनाव 2019 का सबसे बड़ा तख्तापलट के रूप में दर्ज होगी। वैसे चुनाव आयोग (EC) की ओर से अमेठी का चुनाव परिणाम अधिकृत रूप से घोषित नहीं किया है, परंतु राहुल गांधी ने आज देर शाम मीडिया के सामने अमेठी से हार की घोषणा से पहले ही हार स्वीकार कर ली और स्मृति ईरानी को शुभकामनाएँ दे दीं। स्मृति ने जो जीत हासिल की है, वह वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गांधीनगर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित भाजपा-एनडीए के सभी बड़े नेताओं की जीत से कई गुना बड़ी है, क्योंकि उन्होंने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को हराया है। स्मृति ने 1980 से यानी 39 वर्षों से अमेठी में अड्डा जमाए बैठी गांधी परिवार की विरासत को उखाड़े फेंका है। अमेठी में गांधी परिवार को हराने वाली स्मृति ईरानी दूसरी नेता बनी हैं। इससे पहले 1977 में संजय गांधी को अमेठी में जनता पार्टी (JP) के रवीन्द्र प्रताप सिंह से हार का सामना करना पड़ा था। 1980 के बाद अमेठी में गांधी परिवार का कोई सदस्य कभी नहीं हारा।

31 मार्च, 2019 को ही हार मान चुके थे राहुल

वैसे तो राहुल गांधी 13 मई, 2004 को अमेठी से पहली बार चुने गए जाने के बाद ठीक 15 साल और 10 दिन यानी आज 23 मई, 2019 तक सांसद रहे, परंतु हक़ीकत यह है कि राहुल गांधी 31 मार्च, 2019 को ही अमेठी के लिए सांसद नहीं रह गए थे, जब उन्होंने अमेठी के अलावा केरल की वायनाड लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। इसके साथ ही राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा की फायर ब्रांड नेता स्मृति ईरानी से मिली कड़ी टक्कर के बाद लोकसभा चुनाव 2019 में फिर से स्मृति का सामना कर पाने में स्वयं को असमर्थ घोषित कर दिया था। किसी भी नेता का दो सीटों पर चुनाव लड़ना कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, क्योंकि वह नेता किसी भी तरह संसद में पहुँचना चाहता है, परंतु जब कोई बड़ा नेता दो सीटों पर चुनाव लड़ता है, तो इसके पीछे भविष्य में हासिल होने वाला बड़ा पद होता है। जिस तरह 2014 में नरेन्द्र मोदी का लक्ष्य प्रधानमंत्री पद था और इसीलिए उन्होंने वाराणसी में जीत का भरोसा होने के बावजूद ख़तरा मोल न लेते हुए वडोदरा से भी चुनाव लड़ा, ताकि वे सांसद तो बन सकें, जिसके चलते वे प्रधानमंत्री का पद हासिल कर सकें।

राहुल गांधी को MP बने रहने का भी नैतिक अधिकार है ?

ऐसे में राहुल गांधी ने भी यदि अपने चुनावी सफर में पहली बार दो सीटों से चुनाव लड़ने का निर्णय किया, तो स्वाभाविक है कि उनका लक्ष्य भी प्रधानमंत्री पद यानी PM पद ही था। राहुल गांधी इस पूरे चुनाव में देश की जनता के सामने इस तरह पेश आ रहे थे, मानों वे ही नरेन्द्र मोदी का सबसे प्रबल विकल्प हैं। यदि चुनाव परिणाम वास्तव में विरोधी दलों की अपेक्षा के अनुसार आते और ग़लती से भी कांग्रेस 2004 और 2009 की तरह सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरती, तो निश्चित रूप से राहुल गांधी PM पद के सबसे अग्रणी दावेदार होते, परंतु अब जबकि ऐसा हुआ नहीं है, तब क्या PM पद का सपना देखने वाले और जनता की ओर से नकार दी गई एक राष्ट्रीय पार्टी का नेतृत्व करने वाले राहुल गांधी को MP बने रहने का भी नैतिक अधिकार है ? यदि नैतिकता और विचारधारा की इतनी ही साफगोई है, तो फिर राहुल को वायनाड से भी त्यागपत्र दे देना चाहिए।

हार राहुल की नहीं, जीत स्मृति की

अमेठी में जो लोकसभा चुनाव 2019 का सबसे बड़ा तख्तापलट हुआ है, उसका श्रेय केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी को जाता है। वास्तव में देखा जाए, तो अमेठी में राहुल की हार नहीं, अपितु स्मृति ईरानी की जीत हुई है। स्मृति ईरानी ने 2014 में अमेठी से पहली चुनाव मैदान उतर कर राहुल गांधी को कड़ी चुनौती दी थी। कांग्रेस का मजबूत गढ़ और गांधी परिवार की विरासत होने के बावजूद अमेठी में स्मृति ईरानी ने हार कर भी राहुल की जीत को फीका कर दिया था। इतना ही नहीं, अमेठी से लगातार तीसरी बार जीतने के बाद राहुल गांधी सांसद के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाह दिखाई दिए और राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी को हरा कर प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे, परंतु दूसरी तरफ हार कर भी स्मृति ईरानी ने अमेठी में अड्डा जमाए रखा। वे लगातार अमेठी का दौरा करती रहीं। स्मृति ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और केन्द्र की मोदी सरकार से सहायता से अमेठी में कई विकास कार्य करवाए और सांसद राहुल के मुकाबले पराजित प्रत्याशी स्मृति का कार्य अमेठी की जनता के सिर चढ़ कर बोला।

बहना भी पार न लगा सकी भैया की नैया

पूरे लोकसभा चुनाव 2019 में नरेन्द्र मोदी के नाम की रट लगाते हुए जगह-जगह घूमने वाले राहुल गांधी जहाँ एक तरफ अमेठी से पर्चा भरने और वायनाड जैसी सुरक्षित सीट से पर्चा भरने के बाद अमेठी और वायनाड दोनों को भूल गए, वहीं भैया राहुल की नैया पार लगाने का जिम्मा बहना प्रियंका गांधी वाड्रा ने उठाया। एक तरफ अमेठी में स्मृति ईरानी भारी दल-बल के साथ चुनाव प्रचार में जमी हुई थीं, तो भाई को जिताने के लिए बहन प्रियंका ने मोर्चा संभाला। एक बार के लिए तो अमेठी का मुकाबला स्मृति बनाम प्रियंका जैसा लगने लगा, परंतु अमेठी की जिस जनता ने 2014 में थोड़ी-सी अंगड़ाई ली थी, उस जनता ने 2019 में तख्तापलट कर दिया।

शिकार खुद शिकार हो गया

राहुल गांधी जहाँ पूरे देश में घूम कर यह प्रचार-प्रसार और स्थापित करने में लगे हुए थे कि देश के लोगों में नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर रोष, नाराजगी और गुस्सा है। देश में मोदी विरोधी लहर चल रही है, वहीं राहुल को अपने गढ़ अमेठी में चल रही सांसद विरोधी लहर नज़र नहीं आई। राहुल गांधी को अमेठी के लोगों ने 2014 में ही जीत का अंतर घटा कर चेतावनी दे दी थी, परंतु राहुल गांधी ने पाँच वर्षों में ऐसा कोई बड़ा काम नहीं किया, जिससे वे स्वयं को अमेठी की अपेक्षाओं खरा उतरा साबित कर सकें। यही कारण है कि अमेठी के लोगों ने इस बार गांधी परिवार का चोला उतार फेंका और स्मृति ईरानी और योगी तथा मोदी के प्रति विश्वास व्यक्त करने में ही अमेठी की भलाई समझी।

इस तरह सिंहनी सिद्ध हुई स्मृति ईरानी

अमेठी लोकसभा सीट 1967 में अस्तित्व में आई और कांग्रेस का गढ़ बन गई, परंतु 1977 में इंदिरा विरोधी लहर को देखते हुए कांग्रेस ने इस गढ़ को बचाए रखने के लिए पहली बार गांधी परिवार से संजय गांधी को चुनाव मैदान में उतारा। संजय गांधी के उतरने के बावजूद कांग्रेस पहली बार यह सीट हार गई। जनता पार्टी के रवीन्द्र प्रताप सिंह ने पहली बार चुनाव मैदान में उतरे गांधी परिवार को पहली ही बार इस सीट से हार का स्वाद चखाया था। हालाँकि उसके बाद 1980 में संजय गांधी ने अमेठी में गांधी परिवार की नींव डाली। उनके निधन के बाद 1981 के उप चुनाव में राजीव गांधी जीते। इसके बाद राजीव 1984, 1989 और 1991 में लगातार चार चुनाव अमेठी से जीते। यद्यपि 1991 में जब अमेठी में राजीव की जीत की घोषणा हुई, तब राजीव जीवित नहीं थे, क्योंकि उनकी आतंकवादी हमले में मृत्यु हो चुकी थी। राजीव के निधन के बाद 1991 में हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को उम्मीदवार बनाया। गांधी न होते हुए भी अमेठी ने शर्मा को ही जिताया। 1996 में भी शर्मा ही विजयी रहे, परंतु भाजपा ने अपनी स्थापना के 18 साल बाद अमेठी में पहली और ऐतिहासिक जीत हासिल की 1998 में। इस चुनाव में भाजपा के डॉ. संजय सिंह ने दो बार से सांसद रहे सतीश शर्मा को परास्त कर कांग्रेस से यह सीट छीन ली। हालाँकि संजय सिंह की इस उपलब्धि में एक कमी यह थी कि उन्होंने अमेठी का किला कांग्रेस से छीना अवश्य, परंतु उम्मीदवार गांधी परिवार का नहीं था। यही कारण था कि 1999 में सोनिया गांधी ने अमेठी में एंट्री की और भाजपा के संजय सिंह गांधी परिवार से यह सीट छीनने का इतिहास नहीं रच सके। काका संजय, पिता राजीव और माता सोनिया की विरासत अमेठी की जिम्मेदारी 2004 में राहुल ने संभाली। अमेठी ने राहुल को सरआँखों पर बैठाया और 66 प्रतिशत वोट दिए, तो 2009 में राहुल 71 प्रतिशत वोट लेकर जीते, परंतु 2014 में मोदी लहर, राहुल की सांसद के रूप में कथित विफलताओं और उन्हें जनता के बीच उजागर करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देने वाली भाजपा की स्मृति ईरानी के कारण अमेठी में राहुल की लहर की चूलें हिल गईं और वे तीसरी बार जीते तो सही, परंतु वोट मिले केवल 46 प्रतिशत। दूसरी तरफ जिस भाजपा को 2009 में केवल 5.81 प्रतिशत वोट मिले थे, उसे 2014 में 34.48 प्रतिशत वोट मिले। यही कारण है कि 2014 की बढ़त को बढ़ाते हुए स्मृति ईरानी रवीन्द्र प्रताप सिंह के बाद ऐसी दूसरी उम्मीदवार बनीं, जिन्होंने गांधी परिवार से अमेठी सीट छीनी और ऐसा करने वाली वह पहली महिला उम्मीदवार यानी सिंहनी बनी।

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