EXCLUSIVE : गिरगिट भी गच्चा खा जाए इस ‘मायावी महामाया’ के आगे…

सत्ता के लिए किसी को भी सीढ़ी बनाने में संकोच नहीं किया

अस्तित्व बचाने के लिए 25 साल पुरानी दुश्मनी भुलाई

पराजय मिलते ही चार महीने के भीतर ही तोड़ दी दोस्ती

पैंतरेबाजी से सनी हुई है पैंतीस वर्ष की राजनीतिक यात्रा

पहले मुलायम, फिर कल्याण और अब अखिलेश बने शिकार

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 4 जून, 2019। कहते हैं इस सृष्टि पर 84 लाख योनियाँ हैं और प्रत्येक योनि में जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी ईश्वर ने आत्म-रक्षा के लिए विशेष गुर दिए हैं। आज हम इन्हीं 84 लाख योनियों में समाविष्ट एक ऐसी योनि की बात करेंगे, जिसे ईश्वर ने आत्म-रक्षा के लिए सबसे बड़ा हथियार दिया है रंग बदलने का। सामान्यत: पेड़-पौधों पर रहने वाले गिरगिट पर साँप, नेवले से लेकर चील-कौए और बिल्ली जैसे प्राणियों से जान का ख़तरा रहता है और इसीलिए ईश्वर ने गिरगिट को यह गुर दिया है कि वह जिस पेड़ की, जिस टहनी-डाली या जिस पत्ते पर बैठा हो, वह उस पेड़, डाली-टहनी और पत्ते के रंग को धारण कर सकता है, जिससे शत्रु को वह चकमा देकर अपने प्राणों की रक्षा कर सके।

यह तो बात हुई प्रकृति प्रदत्त गिरगिट की, जो केवल प्रकृति के आधीन रहते हुए आत्म-रक्षा के लिए रंग बदलने पर विवश है, परंतु बुद्धि और विवेक के चलते सभी 84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली मनुष्य योनि में जब कोई स्वार्थ के लिए अपने स्वभाव रूपी रंग को बदलने लगता है, तो उसे गिरगिट की ही संज्ञा दी जाती है। उनकी रंग बदलती राजनीति का शिकार मुलायम सिंह यादव से लेकर कल्याण सिंह तक कई राजनीतिक धुरंधर बने और अखिलेश यादव ताजा शिकार हुए हैं।

आप सोच रहे होंगे कि हम आज अचानक गिरगिट की क्यों बात कर रहे हैं ? वास्तव में आज हमें गिरगिट का स्मरण करने के लिए विवश किया है मायावती ने, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में 25 साल पुरानी दुश्मनी भुला कर अभी चार महीने पहले ही समाजवादी पार्टी (सपा-एसपी-SP) के साथ किए गए गठबंधन को एक तरह से लगभग तोड़ दिया। बहुजन समाज पार्टी (बसपा-बीएसपी-BSP) की प्रमुख मायावती ने 12 जनवरी, 2019 को ही सपा के साथ गठबंधन किया था। मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, परंतु लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा के हाथों में हुई करारी हार के साथ ही मायावती ने अपना वही रूप दिखाया, जो पिछले 35 वर्षों के राजनीतिक सफर में वह दिखाती रही हैं।

1977 से सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वालीं मायावती कांशीराम के सम्पर्क में आईं और जब कांशीराम ने 1984 में बसपा की स्थापना की, तो मायावती को कोर मेम्बर बना दिया। इस पैंतीस वर्ष की राजनीतिक यात्रा में मायावती ने कदम-कदम पर संघर्ष किया और सत्ता के शिखर पर पहुँचने के लिए पैंतरेबाजी भी उतनी ही की। उनकी राजनीतिक पैंतरेबाजियों के चलते उन्हें राजनीति की सबसे बड़ी गिरगिट कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। इस बार भी मायावती ने वही किया, जो 25 वर्ष पूर्व मुलायम सिंह यादव के साथ किया था।

उत्तर प्रदेश में भाजपा और नरेन्द्र मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए मुलायम पुत्र अखिलेश की साइकिल पर सवारी करने वाला मायावती का हाथी बसपा की सीटें तो 0 से 10 पर पहुँचा गया, परंतु साइकिल बुरी तरह पंक्चर हो गई। मायावती की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को इस लोकसभा चुनाव 2019 में गंभीर झटका लगा, तो उन्होंने फिर एक बार गिरगिट से भी तेज गति से रंग बदलते हुए हार का ठीकरा अखिलेश और सपा पर फोड़ दिया। साथ ही एकतरफ घोषणा कर दी कि उत्तर प्रदेश विधानसभा की 11 सीटों के लिए होने वाले उप चुनावों में बसपा अकेले दम पर लड़ेगी, तो दूसरी तरफ अखिलेश ने भी कह दिया कि वे इसके लिए तैयार हैं।

अर्थ स्पष्ट है कि मोदी विरोध और जातिवाद की राजनीति पर बना गठबंधन चार महीने पूरे करने से 6 दिन पहले ही दम तोड़ गया, परंतु इस पूरे घटनाक्रम में मायावती ने जिस तरह रंग बदला, उसे देख कर तो गिरगिट भी एक बार लज्जित हो जाए। वैसे मायावती का राजनीतिक इतिहास ही गिरगिट को शर्मशार कर देने वाला रहा है।

मायावती ने 1989 में चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। वे बिजनौर विधानसभा सीट से पहली बार विधायक चुनी गईं। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पराभव, भाजपा और क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हो रहा था। इसी क्रम में कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बसपा का लगातार जनाधार बढ़ा और लोकसभा चुनाव 1989 में बसपा ने 80 में से 3 सीटें जीतीं। बसपा को 10 प्रतिशत वोट मिले। अब कांशीराम का भरोसा जीतने में मायावती पूरी तरह सफल हो गई थीं। इसी दौरान राम मंदिर आंदोलन के चलते हिन्दुत्व व ध्रुवीकरण के रंग में रंगे उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था, परंतु विधानसभा चुनाव 1993 में भाजपा को हराने के लिए कांशीराम ने तत्कालीन सपाध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से हाथ मिला लिया। सपा-बसपा गठबंधन को बहुमत मिला और मुलायम मुख्यमंत्री बन गए, तो कांशीराम ने मायावती को सपा-बसपा के बीच तालमेल की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी।

मायावती ने दिखाया रंग और मुलायम सरकार भंग

सपा-बसपा गठबंधन सरकार को दो साल ही हुए थे कि राज्य में दलित अत्याचार की घटनाएँ बढ़ने का आरोप लगाते हुए कांशीराम न केवल बीमार पड़ गए, परंतु उन्होंने भाजपा के साथ गुप्त समझौता कर लिया। 1 जून, 1995 को मुलायम को ख़बर मिली कि मायावती ने राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मुलाकात कर मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया है और भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं। यह ख़बर जान कर मुलायम दंग रह गए।

गेस्ट हाउस कांड से पड़ी सपा-बसपा की दुश्मनी की नींव

यद्यपि मायावती के पहली बार मुख्यमंत्री बनने से तीन दिन पूर्व ही 2 जून, 1995 को गेस्ट हाउस कांड हुआ। मायावती लखनउ स्थित गेस्ट हाउस के कमरा नं. 1 में पार्टी नेताओं के साथ नई सरकार के गठन की रणनीति पर चर्चा कर रही थीं कि दोपहर 3 बजे समर्थन वापसी से गुस्साए सपा कार्यकर्ताओं ने मायावती पर हमला कर दिया। मायावती ने अभी तक नए सीएम के रूप में शपथ नहीं ली थी, लिहाजा मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ही थे। ऐसे में घबराईं मायावती ने खुद को गेस्ट हाउस में घण्टों बंद कर लिया। इस घटना ने सपा-बसपा के बीच दुश्मनी की अविस्मरणीय नींव रख दी।

भाजपा का विरोध और भाजपा के ही समर्थन से बनीं CM

मायावती 5 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला और दलित मुख्यमंत्री बन गईं। जिस भाजपा के विरोध की राजनीति कर कांशीराम-मायावती और मुलायम ने बहुंमत हासिल किया था, मायावती उसी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं। उस समय वे महज 39 वर्ष की थीं। वे यूपी की सबसे युवा मुख्यमंत्री बनीं। हालाँकि यह सरकार चार महीने ही चली। इसके बाद मायावती ने 1997 और 2002 में मौका मिलते ही पुनः भाजपा का ही समर्थन लेने से न हिचकिचाते हुए मुख्यमंत्री पद संभाला। इस दौरान मायावती ने कल्याण सिंह के साथ छह-छह महीने मुख्यमंत्री बनने की व्यवस्था वाली सरकार भी चलाई, परंतु जब कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद देने की बारी आई, तब समर्थन वापस ले लिया।

कांशीराम ने बनाया राजनीतिक उत्तराधिकारी

इस बीच कांशीराम ने 6 अक्टूबर, 2006 को मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बना दिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2007 में मायावती का जादू सिर चढ़ कर बोला और बसपा ने अकेले दम पर सरकार बनाई। पहली बार मायावती पूरे पाँच वर्ष मुख्यमंत्री रहीं, परंतु इस दौरान कई विवादास्पद निर्णयों ने उनकी छवि बिगाड़ी और विधानसभा चुनाव 2012 में जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।

मोदी लहर ने रौंद डाला

मायावती का राजनीतिक सितारा 2007 तक बुलंदियों पर रहा, परंतु उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव 2012 में बसपा को हार मिली और सपा को बहुमत मिला। अखिलेश पहली बार सीएम बने। लोकसभा चुनाव 2014 में मोदी लहर ने मायावती और हाथी को पूरी तरह रौंद डाला। बसपा को 80 में से एक भी सीट नसीब नहीं हुई। लोकसभा चुनाव 2019 में मायावती ने राजनीतिक वर्चस्व और ज़मीन पुनः हासिल करने के लिए मुलायम के बेटे अखिलेश का हाथ थामा। 25 साल पुरानी दुश्मनी भुला दी, परंतु यह दोस्ती चुनावी हार मिलते ही 4 महीने भी पूरे टिक नहीं पाई।

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