मोदी को मिल गया किसानों को ऋण मुक्त करने का फॉर्मूला : जानिए किसने दिया ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 8 जुलाई 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। देश की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में सबसे ज्यादा योगदान किसानों का है, परंतु किसान महँगी होती जा रही खेती से परेशान होकर कर्ज के बोझ तले दबता चला जा रहा है और पिछले कुछ समय से तो यह कर्ज का भार इतना बढ़ गया है कि किसानों के लिये प्राणघातक बन गया है। कर्ज के कारण किसानों की आत्म हत्या के किस्से आये दिन प्रकाश में आते रहते हैं। सरकारें किसानों को कम ब्याज दर वाला कर्ज देने की घोषणाएँ करती हैं तो कुछ सरकारें कर्ज का ब्याज माफ करने और कुछ कर्ज माफ करने की भी राजनीति करती हैं।

मोदी सरकार ने उठाया किसानों को कर्ज मुक्त करने का बीड़ा

किसानों को कर्ज क्यों लेना पड़ता है और खेती करना किसानों के लिये महँगा क्यों होता जा रहा है, इस पर किसी सरकार ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है। दरअसल फसल उगाने के लिये किसानों को ट्रैक्टर किराए पर लेकर खेतों की गुड़ाई करनी पड़ती है, फिर महँगे बीज, कीटनाशक दवाइयाँ, रासायनिक खाद खरीदने पड़ते हैं। सिंचाई के लिये पानी के पैसे चुकाने पड़ते हैं, बिजली का बिल चुकाना पड़ता है। इसमें भी फसल भारी वर्षा या अन्य कारणों से नष्ट हो गई तो सारा किया हुआ खर्च व्यर्थ हो जाता है और हाथ में कुछ नहीं आता। हालाँकि राहत की बात यह है कि वर्तमान मोदी सरकार ने किसानों के लिये नहिंवत लागत वाली खेती का फॉर्मूला तलाश लिया है।

ZERO BALANCE FARMING का फॉर्मूला

मोदी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 जुलाई को जो केन्द्रीय बजट पेश किया, उसमें उन्होंने अन्नदाता किसानों को ऊर्जादाता बनाने की घोषणा के साथ ही ZERO BALANCE FARMING यानी बिना लागत वाली खेती के कॉन्सेप्ट को लागू करने की भी बात कही थी। वित्त मंत्री के कहने का तात्पर्य था कि नई मोदी सरकार ऐसा मिशन या अभियान चलाएगी जिससे खेती करने के लिये किसानों को महँगा बीज, कीटनाशक दवाइयाँ और रासायनिक खाद खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और इस कारण से किसानों को कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा। इस प्रकार किसान कर्ज मुक्त हो सकता है। दरअसल ज़ीरो बेलेंस फार्मिंग का कॉन्सेप्ट कोई नया नहीं है, बल्कि यह भारत की ही लुप्त हो चुकी वह प्राचीन खेती पद्धति है, जिसे मोदी सरकार फिर से अमल में लाने के लिये काम करेगी। यानी गोबर और गोमूत्र की जैविक खाद और कीटनाशक के प्रयोग को बढ़ावा देगी।

मोदी सरकार को कहाँ से मिला लागत रहित खेती का कॉन्सेप्ट

अब सवाल उठता है कि मोदी सरकार को बिना लागत वाली खेती का कॉन्सेप्ट मिला कहाँ से ? तो इसका जवाब है महाराष्ट्र के एक किसान से। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के एक किसान सुभाष पालेकर ने ज़ीरो बजट वाली खेती की शुरुआत की है। उन्होंने खेत में फसल उगाने के लिये बाजार से कोई वस्तु नहीं खरीदी और बिना लागत के फसल उगाकर मुनाफा कमाया। इस शानदार कॉन्सेप्ट के लिये वर्ष 2016 में केन्द्र सरकार ने सुभाष पालेकर को पद्मश्री से सम्मानित किया था। इतना ही नहीं, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सुभाष पालेकर को अपने राज्य में कृषि सलाहकार भी बनाया है। पालेकर के इस कॉन्सेप्ट को समझने के लिये देश के अलावा दुनिया भर से भी लोग सीखने के लिये आते हैं। सुभाष पालेकर के इस कॉन्सेप्ट से किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं और उन्हें फसल उगाने के लिये किसी सुविधा या सहायता की भी आवश्यकता नहीं होगी। किसानों को किसी फसल के लिये कोई कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा। कोई कीटनाशक दवाई और रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किये जाने से फसलें स्वास्थ्य के लिये भी हानिकारक नहीं होंगी।

दरअसल सुभाष पालेकर प्राकृतिक ढंग से खेती करने के लिये रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों के स्थान पर जानवरों के गोबर से तैयार हुई जैविक खाद का उपयोग करते हैं जो गाय-भैंस, बकरी आदि पालतू पशुओं के गोबर, मूत्र, बेसन, गुड़, मिट्टी तथा पानी से तैयार होती है और कीटनाशकों के स्थान पर वह नीम और गोमूत्र का उपयोग करते हैं। इससे फसलों में रोग नहीं लगते हैं और स्वास्थ्यवर्धक फसलें प्राप्त होती हैं।

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