नागरिकता कानून : किस प्रोटेस्ट में पेट्रोल बम का इस्तेमाल होता है, ये विरोध नहीं देशद्रोह है ?

विशेष टिप्पणी : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 20 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। केन्द्र सरकार की ओर से लागू किये गये नागरिकता संशोधन कानून यानी सिटीज़नशिप एमेंडमेंट एक्ट (CAA) में किसी भी धर्म, जाति या समुदाय के नागरिकों के लिये कुछ भी आपत्तिजनक प्रावधान नहीं किया गया है। फिर इस कानून को लेकर देश भर में विरोध के नाम पर हिंसा का भयावह तांडव क्यों हो रहा है ? और इसके पीछे कौन लोग हैं, जो समुदाय विशेष को गुमराह करके उसे हिंसा की आग में झौंक रहे हैं ? ये कैसा विरोध प्रदर्शन है, जिसके लिये सारे नियमों को ताक पर रख दिया गया है ? विरोध प्रदर्शन के लिये पहले से समय और स्थान सुनिश्चित किया जाता है और उसके लिये प्रशासन से अनुमति लेकर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शित किया जाता है। मगर अभी देश में जगह-जगह जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, क्या उन्हें विरोध प्रदर्शन की संज्ञा दी जा सकती है या इसे बगावत भी कहा जा सकता है ? बिल्कुल नहीं, बल्कि जिस तरह से जगह-जगह एक बेकाबू भीड़ जन सामान्य के लिये भय का माहौल तैयार कर रही है, सरकारी और व्यक्तिगत संपत्तियों को निशाना बना कर उनमें तोड़ फोड़ और आगजनी कर रही है, कानून-व्यवस्था की रखवाली करने वाले रक्षकों यानी पुलिस पर पथराव और संगीन हमले कर रही है, उसे तो देशद्रोह की ही संज्ञा दी जा सकती है।

किस विरोध प्रदर्शन में पेट्रोल बम का उपयोग होता है ?

क्योंकि किस विरोध प्रदर्शन में पेट्रोल बम का प्रयोग किया जाता है ? दिल्ली के सीलमपुर में जिस तरह से हिंसक भीड़ में शामिल एक युवक ने पुलिस पर फेंकने के लिये पेट्रोल बम बनाया और जब वह उसे पुलिस पर फेंकने जा रहा था, तब वह बम उसी के हाथों में ब्लास्ट हो गया, जिससे उसे अपना हाथ तो गँवाना ही पड़ा और गिरफ्तार करके अब उसके विरुद्ध कानूनी केस भी दर्ज किया गया है। दिल्ली में एक और कर्नाटक में दो नागरिकों की मृत्यु हुई तो दिल्ली, यूपी, पश्चिम बंगाल और गुजरात के अहमदाबाद और बनासकांठा में पुलिस पर हमले हुए, जिनमें अनगिनत पुलिस वाले घायल हुए। कौन से विरोध प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी मुँह को कपड़े से ढँक कर निकलते हैं और पुलिस पर पथराव करते हैं ? जैसा कि गुरुवार को भारत बंद के दौरान अहमदाबाद में हुआ। इस तरह की हिंसा को किसी भी रूप में विरोध प्रदर्शन की संज्ञा नहीं दी जा सकती। यदि इस हिंसा को पारिभाषित किया जा सकता है तो सिर्फ देशद्रोह के रूप में ही पारिभाषित किया जा सकता है।

हिंसक भीड़ में से अधिकांश लोग CAA से अनभिज्ञ

चिंता की बात तो यह है कि जो लोग इस हिंसक भीड़ का हिस्सा बन रहे हैं, उनमें से अधिकांश लोगों को तो नागरिकता कानून के बारे में पूरी जानकारी भी नहीं है। इतना ही नहीं, यूपी में समाजवादी पार्टी की ओर से नागरिकता कानून का विरोध करने वाले कुछ नेताओं से जब सीएए और एनआरसी का फुल फॉर्म पूछा गया, तो वे बगलें झाँकने लगे। इससे क्या साबित होता है ? इससे यही साबित हो रहा है कि विपक्षी दल केवल और केवल मोदी विरोध के ही एकमात्र एजेंडे पर काम कर रहे हैं। वास्तव में इन्हें नागरिकता कानून से कोई लेना देना नहीं है। विरोध के नाम पर ये राजनीतिक दल आम जनता को भड़का कर उसे हिंसक भीड़ का हिस्सा बना रहे हैं और समुदाय विशेष के लोग राजनीतिक षड़यंत्रों का शिकार बन कर अपने ही देश से द्रोह करने पर उतारू हो रहे हैं, जो कि उचित नहीं है, बल्कि चिंतनीय है।

नागरिकता कानून है अधिकारों-हितों की रक्षा करने वाला

दरअसल, नागरिकता बिल में देश के किसी भी जायज नागरिक के लिये कोई आपत्तिजनक प्रावधान है ही नहीं, तो फिर वही सवाल उठता है कि कौन है जो देश के नागरिकों को विशेष कर एक समुदाय विशेष को गुमराह कर रहा है ? और उसे हिंसक भीड़ का हिस्सा बना रहा है ? समाज को ही ऐसे षड़यंत्रकारियों की पहचान करनी होगी। वास्तव में इस कानून से धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर किसी भी व्यक्ति या समुदाय के साथ न कोई अन्याय होता है और न ही उनके अधिकारों या हितों को कोई क्षति पहुँचती है। बल्कि परोक्ष रूप से यह कानून अल्पसंख्यकों के लिये खुशहाली का द्वार खोलता है। इस कानून में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफग़ानिस्तान से भारत में आकर बसे वहाँ के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिये प्रावधान किये गये हैं, न कि भारत के किसी नागरिक की नागरिकता छीनने के लिये। इससे अवैध घुसपैठियों को उनके देश में वापस भेजने का रास्ता खुलेगा और देश के वास्तविक अल्पसंख्यकों को रोजगार तथा सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ मिल सकेगा। इसलिये किसी भी नागरिक को इससे भयभीत होने या इसका विरोध करने का तो कोई औचित्य ही नहीं है।

खुद कांग्रेस ने 2003 में की थी इस कानून की माँग

जो कांग्रेस इस कानून का विरोध करने के नाम पर अपने सहयोगी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को गुमराह करके या उन्हें भड़का कर हिंसक विरोध प्रदर्शनों की ज्वालाओं में झौंक रही है। दरअसल इस कानून की माँग उसी ने उठाई थी। कांग्रेस को अपने इतिहास पर नज़र डालने की आवश्यकता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 2003 में स्वयं राज्य सभा में तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के समक्ष पड़ोसी देशों से पीड़ित होकर भारत में आने वाले और शरणार्थी जीवन जीने वाले लोगों के मानवाधिकारों और हितों की रक्षा के लिये नागरिकता संशोधन कानून लाने की माँग उठाई थी, जिसका हाल ही में एक वीडियो भी जारी हुआ है। मोदी विरोध की अंधी दौड़ में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी तो और भी आगे निकल गईं, बल्कि उन्होंने तो सीमाएँ ही लाँघ दीं। वे तो देश के आंतरिक मामलों को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के बयान दे रही हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव हिंसक विरोध प्रदर्शनों की जाहिर में आलोचना करते हैं, जबकि दूसरी ओर उन्हीं की पार्टी विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करती है और उनकी पार्टी के नेता प्रदर्शनों में भाग लेते हैं। इस प्रकार नागरिकों को राजनीतिक पार्टियों के हथकंडों को समझना चाहिये और उनके षड़यंत्रों का शिकार बनने से बचना चाहिये।

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