छोटी-सी नाक, वो भी कटवा ली : मोदी की ‘मसूदी मात’ से सबक लेते, तो यूँ बेइज़्जत नहीं होते जिनपिंग

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 17 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के भारत के फ़ैसले से तिलमिलाए पाकिस्तान को हर ओर से मुँह की खानी पड़ रही है। अंतिम आशा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) से थी, परंतु शुक्रवार रात वहाँ से भी उसे करारा झटका लगा। यूएनएससी के स्थायी सदस्य और अपने परम् मित्र के सहारे पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को यूएनएससी में ले जाने में तो सफल रहा, परंतु हाथ आया केवल ठेंगा।

पाकिस्तान जैसे आतंकिस्तान देश के साथ यारी निभाने में तनिक भी अपने स्व-विवेक, वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा और वैश्विक महासत्ता बनने के सपने के बारे में नहीं सोच कर चीन के चिरायु राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी ही नाक कटवा ली। किसी भी देश को अपने द्विपक्षीय संबंधी देश के साथ संबंध निभाने चाहिए, परंतु उन संबंधों को निभाने के चक्कर में अपनी ही नाक कटवा लेने में शी जिनपिंग को क्या मज़ा आया ?

आज का भारत 1962 वाला नहीं

चीन की भारत के साथ रंजिश बहुत पुरानी है, परंतु उसे यह अच्छी तरह समझ लेना होगा कि आज का भारत 1962 वाला नेहरू का भारत नहीं है, जो युद्ध में हार कर पस्त हो गया था। शी जिनपिंग को भी अपने दिल-ओ-दिमाग में यह बात बैठा लेनी चाहिए कि भारत की बागडोर इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों में है, जो चीन की चालाकियों में फँसने वाला नहीं है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के भारत के फ़ैसले के बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर दोनों से मुलाक़ातें कीं। क़ुरैशी जहाँ न्यू पाकिस्तान के किसी प्रोजेक्ट के साथ नहीं, अपितु केवल कश्मीर की रुदाली सुनाने वांग यी से मिले, वहीं जयशंकर की वांग यी से मुलाक़ात व्यापक थी। चीनी विदेश मंत्री से मुलाक़ात के बाद जहाँ क़ुरैशी अति उत्साहित थे, वहीं जयशंकर सहित पूरा भारतीय नेतृत्व पहले ही जानता था कि चीन कश्मीर मुद्दे पर अंतत: उसी पाकिस्तान का साथ देगा, जहाँ उसने अरबों रुपए का निवेश कर रखा है। चीन ने बिना सोचे-समझे पाकिस्तान का साथ दे दिया, जबकि उसे ऐसा करने से पहले इसी यूएनएससी में कुछ महीनों पहले मसूद अज़हर पर मिली मात को याद कर लेना चाहिए था। मोदी की घातक कूटनीति को याद करना चाहिए था, जिसके बल पर भारत चीन के अनेक वीटो के बावजूद पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में सफल रहा था। इस लिहाज़ से भी देखा जाए, तो जिनपिंग की यूएनएससी में दूसरी बार नाक कटी है।

इमरान के चलते जिनपिंग का हुआ मुँह काला

चीन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान और विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी की बातों में आकर अपनी स्थायी सदस्यता का दुरुपयोग किया और यूएनएससी की अनौपचारिक बैठक बुलवाई। चीन स्थायी सदस्य है, इसीलिए बैठक बुलाना अनिवार्य हो गया, परंतु भारत ने पहले ही पूरी तैयारी कर ली थी। यूएनएससी की बैठक हुई और 48 साल बाद फिर एक बार पाकिस्तान को करारा तमाचा मिला। यूएनएससी की बंद कमरे में हुई बैठक में पाँच स्थायी सदस्यों में से चीन को छोड़ कर शेष चारों सदस्यों रूस, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने कश्मीर मसले को भारत का द्विपक्षीय मुद्दा करार दिया। यह पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तान को यूएनएससी में कश्मीर पर मुँह की खानी पड़ी हो। 48 साल पहले भी 1971 में यूएनएससी की अनौपचारिक बैठक कश्मीर मसले पर बुलाई गई थी, तब भी पाकिस्तान भारत का कुछ नहीं बिगाड़ पाया था। शुक्रवार को भी यूएनएससी में पाकिस्तान की कोई रुदाली नहीं सुनी गई और न ही चीन की बात को वज़न मिला। इमरान के चलते यूएनएससी में जिनपिंग का मुँह काला हो गया।

फिर रंग लाई मोदी की कूटनीति, रूस ने निभाई यारी

एक समय था, जब विश्व में भारत का एकमात्र और सबसे बड़ा साथी केवल रूस हुआ करता था और आज भी रूस भारत का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मित्र है। रूस ने शुक्रवार को हुई यूएनएससी की बैठक में फिर एक बार सिद्ध कर दिया कि रूस भारत के कंधे से कंधा मिला कर खड़ा था, है और रहेगा। यूएनएससी की बैठक में रूस ने कश्मीर मुद्दे को भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मुद्दा करार दिया। इतना ही नहीं, भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947, 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ खड़े रहने वाले अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान जैसे बड़े-बड़े देश आज भारत के साथ हैं और हर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार भारत का साथ देते रहते हैं। यह मोदी की विदेश नीति और कूटनीति का ही प्रभाव है कि पाकिस्तान पूरी दुनिया में अकेला है। चीन के अलावा उसके साथ कोई नहीं है।

यूएनएससी में जीत के बाद अकबरूद्दीन ने संभाला मोर्चा

यूएनएससी में कश्मीर मुद्दे पर भारत की हुई जीत के बाद संयुक्त राष्ट्र में भारतीय राजदूत सैयद अकबरूद्दीन ने भारत के पक्ष में मोर्चा संभाला। अक़बरूद्दीन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पाकिस्तान की जम कर ख़बर ले डाली। पूरी दुनिया के मीडिया के समक्ष उन्होंने एक सुर में स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया कि कश्मीर में जो धारा 370 हटाई गई है, वह पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद पाकिस्तानी पत्रकारों ने सवालों के जरिए भारत को घेरने की कोशिश की, परंतु अकबरूद्दीन ने धारदार कूटनीतिक कुशलता से तीन पाकिस्तानी पत्रकारों की बोलती बंद कर दी। उन्होंने बातों में ही बातों में पाकिस्तानी पत्रकारों को शिमला समझौते की याद दिलाई, जिसके मुताबिक 1972 के बाद कश्मीर मुद्दा केवल और केवल द्विपक्षीय मुद्दा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू होते ही अकबरूद्दीन ने सबसे पहले पाकिस्तान के तीन पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए, ‘आप लोगों के मन में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए, क्योंकि मैं तीनों पाक पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहा हूँ।’ जैसे ही पाकिस्तान के आखिरी पत्रकार ने उनसे सवाल पूछा कि नई दिल्ली, इस्लामाबाद से कब वार्ता करेगा, तो अकबरुद्दीन ने पोडियम से आगे कर बेहद आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘चलिए, मुझे इसकी शुरुआत सबसे पहले आपसे रू-ब-रू होकर करने दीजिए। हाथ मिलाने दीजिए।’ उन्होंने एक-एक कर तीनों पत्रकारों से हाथ मिलाया और इस दौरान वहाँ पत्रकारों की हँसी सुनाई दी। इसके बाद पोडियम पर जाकर उन्होंने कहा, ‘हमने दोस्ती का हाथ बढ़ाकर दिखा दिया कि हम (भारत) शिमला समझौते को लेकर प्रतिबद्ध हैं। अब पाकिस्तान की तरफ से जवाब का इंतजार करते हैं।’

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