‘वल्लभ’ ही नहीं, ‘विट्ठल’ की दहाड़ से भी थर्राता था अंग्रेजी साम्राज्य

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 22 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में एक युद्ध द्वापर युग में लड़ा गया, जो महाभारत का युद्ध कहलाया। पाँच हजार वर्ष पूर्व हुए उस भीषण युद्ध के बाद भारत ने अपने पुरातन-प्राचीन इतिहास में और भी कई युद्ध देखे, परंतु महाभारत के युद्ध के बाद सबसे बड़ा और निर्णायक युद्ध कोई लड़ा गया हो, तो वह था 200 वर्षों की अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए चलाया गया स्वतंत्रता संग्राम। महाभारत का नाम लेते ही भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन की छवि चित्त में उभर आती है, वहीं आधुनिक भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए स्वतंत्रता महासंग्राम की बात आते, ही हमारे मुख से सहसा ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे नाम निकल पड़ते हैं। इनमें भी सरदार वल्लभभाई पटेल को तो भारत अत्यंत कृतज्ञता से स्मरण करता है, क्योंकि आज जो भारत है, वह सरदार पटेल की ही देन है, परंतु स्वतंत्रता आंदोलन व अखंड भारत के निर्माण की बात करते हुए जब हम सरदार पटेल का स्मरण करते हैं, तब हमारे मन में कभी-भी और कहीं-भी उनके बड़े भाई वीर विट्ठलभाई पटेल की छवि नहीं उभरती। यदि आधुनिक महाभारत व अखंड भारत के निर्माण में सरदार पटेल ने कृष्ण जैसी भूमिका निभाई, तो विट्ठलभाई पटेल का योगदान भी दाऊ बलराम से कम नहीं था।

महाभारत के युद्ध में भले ही भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने हिस्सा नहीं लिया था, परंतु स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल ने भी बढ़-चढ़ कर इस महायुद्ध में भाग लिया था और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ी दहाड़ लगाई थी। इस बात पर कोई संदेह नहीं कि सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के पूर्व और उसके पश्चात भी कई ऐसे कार्य किए, जिससे वे लौह पुरुष कहलाए, परंतु उनके बड़े भाई के योगदान को भी कमतर आँका नहीं जा सकता। हम वीर विट्ठलभाई पटेल को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 86वीं पुण्यतिथि है। भारतीय स्वतंत्रता के लिए अत्यंत प्रभावशाली एवं ओजस्वी प्रचार के दौरान उनका स्वास्थ्य गिरता गया और बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते 22 अक्टूबर, 1933 को इस महान क्रांतिकारी ने दुनिया को अलविदा कह दिया था।

कानून की पढ़ाई में प्रथम स्थान प्राप्त किया

वीर विट्ठलभाई झवेरभाई पटेल का जन्म 27 सितम्बर, 1871 को गुजरात के करमसद गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल और माता का नाम लाडबा पटेल था। वे 5 भाई थे और सरदार बल्लभ भाई पटेल से 4 वर्ष बड़े थे। विट्ठलभाई पटेल की प्रारभिक शिक्षा गुजरात के करमसद और नडियाद में हुई। इसके बाद वे कानून की शिक्षा प्राप्त करने इंग्लैंड चले गए। वहाँ एक कॉलेज में उन्होंने दाखिला लिया और 36 महीने का कोर्स केलव 30 महीने में पूरा कर लिया। उन्होंने न केवल कानून की पढ़ाई उत्तीर्ण की, अपितु वे प्रथम भी आए। 1913 में बैरिस्टर बनने के बाद लंदन से भारत वापस लौट आए। भारत आने के बाद उन्होंने बंबई (अब मुंबई) की एक अदालत में प्रैक्टिस शुरू की। उसके बाद अहमदाबाद की अदालत में कार्य किया। आगे चलकर उन्होंने एक कार्यदक्ष वकील के तौर पर प्रसिद्धि प्राप्त की। उसी दौरन उनकी पत्नी दिवाळीबा का निधन हो गया। पत्नी की मृत्यु के बाद विट्ठलभाई के जीवन का मोड़ सिद्ध हुई। यहीं से उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया।

आक्रामक रवैये से घबराते थे अंग्रेज

सर्वप्रथम उन्होंने बंबई कॉरपोरेशन, बंबई धारासभा (Bombay Dhara Sabha) तथा कांग्रेस पार्टी के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। 24 अगस्त, 1925 को वे केन्द्रीय विधान परिषद् के अध्यक्ष चुने गए। यहीं से उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय प्रारम्भ हुआ। निष्पक्ष, निर्भीक विचारधारा से धरातल पर उनके व्यक्तित्व की अमिट छाप अंकित होने लगी। संसदीय विधि विधानों के वे प्रकाण्ड पंडित तो थे ही, साथ ही सदन में सभी दलों के आदर एवं श्रद्धा के पात्र भी बन गए थे। इतना ही नहीं, केंद्रीय धारा सभा के अध्यक्ष के रूप में वे विदेशों में भी विख्यात हुए। विधि विषयक और अपने सूक्ष्म ज्ञान से वे तत्कालीन सरकार को भी परेशानी में डाल दिया करते थे। विट्ठलभाई पटेल के आक्रामक रवैये से अंग्रेज सदैव घबराते थे। वीर विट्ठल भाई पटेल ने कभी भी ब्रिटिश अधिकारियों का सम्मान या उनकी जी हज़ूरी नहीं की, अपितु मौका मिलने पर उनके विरुद्ध बयानबाजी भी करते थे। उन्होंने अपनी निष्पक्षता से गहरी छाप छोड़ी। सदन में विभिन्न दलों के नेता भी उनकी बड़ा सम्मान करते थे। वीर विट्ठल पटेल ने बड़ी बुद्धिमत्ता से कई स्थानों में अंग्रेज़ समेत विपक्षियों को परास्त भी किया। विट्ठल भाई ने केंद्रीय विधान सभा की अध्यक्षता के दौरान जैसे उच्च आदर्श उपस्थित किए, जिसके आधार पर यह बात नि:संकोच कही जा सकती है वे इस मामले में अपने पूर्ववर्तियों से आगे थे। मेरठ षड्यंत्र केस के दौरान उन्होंने सरकार को यह राय दी कि ‘सुरक्षा बिल’ स्थगित रखा जाय या सरकार मेरठ षड्यंत्र केस बंद कर दे, परंतु जब सरकर ने यह बात नहीं मानी तो सुरक्षा बिल पेश होने पर उन्होंने अपने विशेषाधिकार यानी निर्णायक वोट का प्रयोग करते हुए इस बिल को अयोग्य करार दिया था।

‘स्वतंत्रता की लड़ाई में मेरा उचित स्थान रण क्षेत्र’

वीर विट्ठलभाई पटेल के हृदय में मातृभूमि को स्वतंत्र देखने की उत्कट अभिलाषा थी। इसी कारण उन्होंने अत्यंत सादगी एवं न्याय भावना से रह कर अपना जीवन बिताया। धारासभा से जो वेतन उन्हें मिलता था उसका एक बड़ा अंश वे महात्मा गांधी को दे दिया करते थे और कम खर्च में ही अपना काम चलाते थे। इस प्रकार उनके 40 हजार रुपए गांधीजी के पास एकत्र हो गया थे जिससे बालिकाओं के लिय एक स्कूल की स्थापना की गई, जिसका उद्घाटन 31 मई 1935 को उनके निधन के बाद महात्मा गांधी ने ही किया था। स्वतंत्रता उनका मुख्य लक्ष्य था, जिसके लिए उन्होंने भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने किसी से परामर्श किये बिना असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया, तब वीर विट्ठल भाई पटेल ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के सहयोग से उन्होंने ‘स्वराज’ पार्टी की स्थापना की। स्वराज पार्टी का मुख्य उद्देश्य था विधान परिषदों में प्रवेश कर सरकार के काम-काज को बाधित करना था, परंतु जब 1930 में कांग्रेस पार्टी ने विधान सभाओं का बहिष्कार करने का आह्वान किया, तो वीर विट्ठल भाई ने केन्द्रीय विधान सभा की अध्यक्षता से त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने कहा, “स्वतंत्रता की इस लड़ाई में मेरा उचित स्थान विधानसभा की कुर्सी पर, नहीं अपितु रण क्षेत्र में है।” कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा दिया, तब वीर विट्ठलभाई कांग्रेस में पुनः शामिल हो गए। 1930 में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। उन्हें 6 वर्ष का दंड दिया गया। जेल में उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया, जिसके कारण अवधि पूरी होने के पूर्व ही उन्हें 1931 में रिहा कर दिया गया।

उनकी ही संपत्ति से बना वीर विट्ठलभाई स्मारक

जेल से रिहा होने के बाद वीर विट्ठलभाई स्वास्थ्य उपचार के लिए ऑस्ट्रिया के शहर वियना चले गए। वहाँ उनकी भेंट नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से हुई, जो स्वयं भी स्वास्थ्य लाभ के लिए वहाँ गए हुए थे। नेताजी का स्वास्थ्य, तो सुधर रहा था, परंतु विट्ठलभाई का स्वास्थ्य गिरता ही गया और 22 अक्टूबर, 1933 को जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में उनकी मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार 10 नवम्बर, 1933 को बॉम्बे में किया गया। वीर विट्ठलभाई ने निधन से पूर्व अपनी वसीयत की और अपनी संपत्ति का 3 चौथाई भाग सुभाष चंद्र बोस के नाम कर दिया। इस वसीयत पर वल्लभभाई पटेल ने कई महतत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए। उन्होंने जब इस वसीयत को मानने से मना कर दिया, तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस अदालत पहुँचे, परंतु सुभाष केस हार गए और बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस बीजे वाडिया ने वल्लभभाई पटेल को उनके बड़े भाई की संपत्ति का कानूनी उत्तराधिकारी माना। वल्लभभाई ने घोषणा की कि ये संपत्ति गुजरात के आणंद में स्थित वीर वीर विट्ठलभाई मेमोरियल ट्रस्ट को दी जाएगी। सुभाष ने इसके खिलाफ अपील की, परंतु इस बार भी उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा। सितंबर -1939 में चीफ जस्टिस सर जॉन ब्यूमांट और जस्टिस एचजे कानिया ने पुराने फैसले को बहाल रखा। एक वर्ष यानी 1940 के बाद वल्लभभाई ने अपने बड़े भाई वीर विट्ठल भाई पटेल की संपत्ति को बेच दिया और उससे मिले 1 लाख 20 हजार रुपए ट्रस्ट को दे दिये।

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