जानिए महान क्रांतिकारी जतिन बाघा को, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा दी थी…

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 10 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। माँ भारती को अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए 72 वर्ष हो चुके हैं। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए न जाने कितने ही क्रांतिकारियों ने हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। देश पर मर-मिटने वाले क्रांतिकारियों को हम अक्सर उनके जन्म दिवस या किसी विशेष अवसरों पर ही याद करते हैं और उन्हें श्रृद्धांजलि देकर कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। आज की आपाधापी भरी जीवन शैली में विशेषकर युवा पीढ़ी शायद ही भारत माता के लिए अपने प्राणों की आहूति दे देने वाले वीर सपूतों की संघर्ष गाथा में झाँकने का प्रयास करते हैं, जिनके बारे में इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।

आज हम आपको एक माँ भारती के एक ऐसे वीर सपूत का परिचय कराने जा रहे हैं, जिसने आज़ादी के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। आज़ादी का वह ऐसे मतवाला था, जो बचपन से ही शेरों के साथ दो-दो हाथ किया करता था और उन्हें मार गिराता था, जिसने शहर में बेकाबू घूम रहे घोड़े को मात्र 11 वर्ष की आयु में काबू कर लिया था। उसका नाम है बाघा जतिन। आज इस क्रांतिकारी जतिन की 104वीं पुण्यतिथि है। 10 सितंबर, 1915 को जतिन बाघा माँ भारती के लिए शहीद हुए थे। बंगाल के विभाजन के विरुद्ध चल रही क्रांति के दौरान तत्कालीन बंगाल (अब ओडिशा) के बालासोर में अंग्रेज सैनिकों के साथ मुठभेड़ के दौरान 9 सितंबर, 1915 को गोली लगने से घायल जतिन ने 24 घण्टों तक मृत्यु से संघर्ष किया और अंतत: 10 सितंबर को वे शहीद हो गए थे।

वैसे इनका मूल नाम जतिन्द्रनाथ मुखर्जी है, परंतु वे बाघा जतिन के रूप में क्यों विख्यात हुए, इसके पीछे भी एक दिलचस्प कथा है। उनके अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध किए गए संघर्ष की कहानी बताने से पहले यह भी जान लीजिए कि जतिन्द्रनाथ मुखर्जी बाघा जतिन के रूप में क्यों विख्यात हुए ? दरअसल जतिन जब 25 वर्ष के थे, तब उनके गाँव में एक बाघ ने आतंक मचा रखा था। जतिन उस समय स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त थे और गांव से बाहर थे। जब उन्हें बाघ के आतंक का पता चला, तो वे गांव पहुँचे और बाघ को एक हंसिए से मार गिराया। उसी दिन से लोग उन्हें बाघा जतिन नाम से बुलाने लगे। अंग्रेजी के एक समाचार पत्र में उनकी इस बहादुरी के किस्से भी छपे। जतिन के क्रांतिकारी कारनामों से पहले ही परेशान अंग्रेजों को जतिन की यह बहादुरी भी चुभने लगी।

बाघा जतिन का जन्म 7 दिसंबर 1879 को तत्कालीन अखंड भारत में बंगाल (अब बांग्लादेश) के कुष्टिया जिला स्थित कायाग्राम गाँव में हुआ था। उनका बचपन का नाम जतिन्द्रनाथ मुखर्जी (जतिन्द्रनाथ मुखोपाध्याय) था। पांच वर्ष की अल्पायु में ही उनके सिर से पिता उमेशचंद्र मुखर्जी का साया उठ गया। माता ने बड़ी कठिनाइयों से जतिन का पालन-पोषण किया। घर की आर्थिक स्थिति पहले से ही ठीक नहीं थी, जिसके चलते मैट्रिक तक की पढ़ाई के तुरंत बाद ही उन्होंने स्टेनेग्राफी सीखी और परिवार के जीविकोपार्जन हेतु मात्र 18 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए। कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी भेंट तत्कालीन महान संत स्वामी विवेकानंद से हुई। जतिन उनसे इतना प्रभावित हुए कि वे हर दिन स्वामी विवेकानंद से मिलते। जतिन के मनो-मस्तिष्क पर स्वामी विवेकानंद के वचनों में से यह एक वाक्य ‘स्वस्थ फौलादी शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है’ छा गया। इसी वाक्य से प्रभावित होकर जतिन बंगाल में अखाड़ा संस्कृति के संस्थापक और भारतीय पहलवान अंबिका चरण गुहा उर्फ अम्बू गुहा के देसी जिम में जाने लगे और कुश्ती के दाव पेंच सीखने लगे। इसी दौरान जतिन वर्ष 1899 में मुज़फ्फरपुर पहुँचे और क्रांतिकारी तथा ग़दर पार्टी के सदस्य बैरिस्टर विष्णु गणेश पिंगले के सचिव के रूप में काम करने लगे। पिंगले एक इतिहासकार भी थे, जिनके साथ रहकर जतिन ने महसूस किया कि भारत की एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए। यह भारत की नेशनल आर्मी बनाने को लेकर पहला विचार था, जिसे बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस ने सशस्त्र सेना स्थापित की।

वर्ष 1905 में जब ग्रेट ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस ऑफ वेल्स कलकत्ता में दौरे पर आए, तो बंगाल के विभाजन के विरुद्ध मोर्चा खोले बैठे कई क्रांतिकारियों के सीने धधक उठे। जतिन ने प्रिंस के सामने ही उन्हें सबक सिखाने की ठानी। प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत में जुलूस निकला जा रहा था। उनकी गाड़ी की छत पर कुछ अंग्रेज बैठे थे और उनके जूते गाड़ी की खिड़की से अंदर बैठी महिलाओं के ठीक मुंह पर लटक रहे थे। महिलाओं का यूँ अपमान जतिन भड़क गए और जुलूस के बीच पहुँच कर अंग्रेजों से गाड़ी की छत से उतरने को कहा, लेकिन वो नहीं माने। फिर क्या था, जतिन ने गाड़ी पर चढ़ कर एक-एक करके सभी अंगेजों को पीटना शुरू किया और तब तक पीटते रहे, जब तक कि ले सारे नीचे नहीं गिर गए।

क्रांतिकारियों के भारी विरोध के बावजूद दूसरी तरफ अंग्रेज बंग भंग योजना को अंजाम देने जा रहे थे। वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न ने तर्क देते हुए तत्कालीन बंगाल प्रांत, जिसमें बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे, बहुत बड़ा है कह कर अलग करने की घोषणा कर दी। उसका कहना था कि एक लेफ्टिनेंट गवर्नर बंगाल प्रशासन को ठीक ढंग से नहीं चला सकता। फलस्वरूप पूर्वी बंगाल के जिलों की उपेक्षा होती है, जहाँ मुसलमान अधिक संख्या में हैं। अतः उत्तरी और पूर्वी बंगाल के राजशाही, ढाका तथा चटगाँव डिवीज़न में आने वाले 15 ज़िले असम में मिला दिए गए और पूर्वी बंगाल तथा असम नाम से दो नए प्रांत बनाए गए।

देश के लिए डकैती भी की

इधर बंग भंग विरोधी आंदोलन के अंतर्गत 1910 में एक क्रांतिकारी संगठन में काम करने वाले जतिन को ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें एक वर्ष की जेल काटनी पड़ी। जेल से मुक्त होने के बाद जतिन ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य बन गए और ‘युगांतर पार्टी’ का कार्य संभालने लगे। उन्हीं दिनों उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था, ‘पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है। देसी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का अवसर देना हमारी मांग है।’ क्रांतिकारियों के पास आंदोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती था। इन डकैतियों में ‘गार्डन रीच’ की डकैती बड़ी मशहूर मानी जाती है, जिसके नेता जतिन थे। प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हो चुका था। कलकत्ता में उन दिनों राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। इस कम्पनी की एक गाड़ी को क्रांतिकारियों ने रास्ते से ग़ायब कर लिया। उस गाड़ी में क्रांतिकारियों को 52 मौजर पिस्तौलें और 50 हजार गोलियाँ मिलीं।

अंग्रेज सरकार जतिन, अरविंदो घोष, रास बिहारी बोस जैसे कई बंगाली क्रांतिकारियों से तंग आ गई थी, जिसके चलते अंग्रेज सरकार को अब राजधानी के रूप में कलकत्ता सुरक्षित नहीं लग रहा था। अंग्रेजी हुक़ूमत ने अगर अपनी राजधानी 1912 में कलकत्ता से बदल कर दिल्ली को बनाया, तो इसकी बड़ी वजह ये क्रांतिकारी ही थे। उनमें शायद सबसे बड़ा नाम जतिन का था। तमाम सामाजिक कार्यों और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने की ख़ातिर जतिन ने भारत में एक नया तरीका ईज़ाद किया, जिसके बारे में अंग्रेजी इतिहासकारों ने लिखा है ‘बैंक रॉबरी ऑन ऑटोमोबाइल्स टैक्सी कैब्स’।

लगातार हो रही डकैतियों से परेशान ब्रिटिश सरकार की आँखों में अब जतिन नासूर की तरह चुभने लगे। अंग्रोजों को यक़ीन था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ की डकैतियों में जतिन का ही हाथ है। अंग्रेजों ने बाघा के खिलाफ कारवाई करते हुए 9 सितंबर 1915 को जतिन के गुप्त अड्डे ‘काली पोक्ष’ (कप्तिपोद) को ढूंढ़ निकाला। जतिन अपने साथियों के साथ यह अड्डा जगह छोड़ने ही वाले थे कि राज महन्ती नमक अंग्रेज अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें घेर लिया। जतिन ने गोली चलाई और अंग्रेज अधिकारी राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा, तो किल्वी दल-बल सहित वहाँ आ पहुँचा। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली, जिसमें जतिन का शरीर गोलियों से छलनी हो गया। वह ज़मीन पर गिर कर ‘पानी-पानी’ चिल्लाने लगे। उनका एक साथी मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की ओर ले जाने लगा। तभी किल्वी ने गोलीबारी बंद करवा कर जतिन को गिरफ्तार कर लिया, परंतु जतिन ने अगले दिन यानी 10 सितंबर 1915 को अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं।

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