एक थे ‘नेताजी’, जो अंग्रेजों के विरुद्ध दहाड़ते हुए अचानक लुप्त हो गए…

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 18 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपना पूरा जीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए खपा दिया, परंतु स्वतंत्र भारत में बनी सरकारों ने नेताजी को वह सम्मान कभी नहीं दिया, जिसके वे अधिकारी थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पूर्ववर्ती 13 प्रधानमंत्रियों से अलग हट कर नेताजी को सबसे बड़ा सम्मान तब दिया, जब उन्होंने उस लाल किले पर 21 अक्टूबर, 2018 को तिरंगा फहराया, जहाँ स्वतंत्र भारत के इतिहास में केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही तिरंगा फहराया जाता है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और इतिहास में 21 अक्टूबर, 1943 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही वह दिन था, जब अंग्रेजों ने नेताजी द्वारा बनाई गई आज़ाद हिन्द फौज सरकार को मान्यता दी थी। पिछले साल 21 अक्टूबर को आज़ाद हिन्द फौज सरकार को 75 वर्ष पूर्ण हुए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार लाल किले पर 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस या 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अलावा भी आज़ाद हिन्द फौज सरकार स्थापना दिवस समारोह आयोजित किया और लाल किले पर तिरंगा फहराया।

आज सुभाष चंद्र बोस का स्मरण इसलिए करना आवश्यक है, क्योंकि उनकी रहस्यमयी मृत्यु को पूरे 74 वर्ष हो गए हैं। 18 अगस्त, 1945 का ही वह मनहूस दिन था, जब सुभाष चंद्र बोस कथित रूप से विमान दुर्घटना में मारे गए। भारत को नेताजी की मौत का समाचार 5 दिन बाद 23 अगस्त, 1945 को जापान के टोकियो रेडियो से प्रसारित समाचार बुलेटिन से मिली। यद्यपि नेताजी के निधन को लेकर अनेक बातें सामने आईं। कई बार तो उनके जीवित होने की ख़बरें भी आईं, तो कई बार किसी व्यक्ति विशेष के नेताजी होने का दावा किया गया, परंतु टोकियो रेडियो द्वारा प्रसारित ख़बर के अनुसार जापान स्थित सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आ रहे थे कि 18 अगस्त को ताइहोकू हवाई अड्डे के पास विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में सवार नेताजी, जापानी जनरल शोदेई, पायलट और कुछ अन्य लोग मारे गए। नेताजी गंभीर रूप से झुलस गए थे। उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया। कर्नल हबीबुर्रहमान के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अंतिम संस्कार ताइहोकू में ही कर दिया गया। सितंबर के मध्य में उनकी अस्थियाँ जापान की राजधानी टोकियो के रैंकोजी मंदिर में रख दी गईं। भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के अनुसार नेताजी का निधन 18 अगस्त, 1945 को रात 9.00 बजे ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में हुआ।

‘तुम मुझे ख़ून दो-मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ और ‘जय हिन्द’ के जनक

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को तत्कालीन बंगाल रियासत में तत्कालीन उड़ीसा (अब ओडिशा) मंडल स्थित कटक में रात 12.10 बजे हुआ था। प्रभावती दत्त और वकील जानकीनाथ बोस के घर जन्मे सुभाष अपने माता-पिता की 14 संतानों में 9वीं संतान थे, परंतु सुभाष पर बचपन से ही आध्यात्मिक महापुरुषों स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद का बड़ा प्रभाव था और इसीलिए वे क्रांतिकारी विचार रखते थे। यही कारण है कि कांग्रेस नेता होने के बावजूद सुभाष चंद्र बोस का स्वतंत्रता आंदोलन महात्मा गांधी के अहिंसा और शांति जैसे सिद्धांतों से तालमेल नहीं बैठा पा रहा था। जून-1943 में सुभाष चंद्र बोस ने जापान पहुँच कर टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से आज़ादी की आशा करना व्यर्थ है। हमें संघर्ष करके ही आज़ादी लेनी होगी। नेताजी के इस भाषण से आज़ाद हिन्द फौज के तत्कालीन सेनापति रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई, 1943 को 46 वर्षीय नेताजी को आज़ाद हिन्द फौज का नेतृत्व सौंप दिया। आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना 29 अक्टूबर, 1915 को राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने अफग़ानिस्तान में की थी, परंतु अब नेताजी के इसके सेनापति बन चुके थे। 21 अक्टूबर, 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में जापान की सहायता से आरज़ी हुक़ूमत-ए-आज़ाद हिन्द (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की और वे स्वयं इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्ध मंत्री बने। इस सरकार को विश्व के 9 देशों ने मान्यता दी। इसके साथ ही नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के सेनापति भी बन गए। अंग्रेज सरकार ने भी सुभाष चंद्र बोस की अंतरिम सरकार को मान्यता दी। सरकार बनाने के बाद नेताजी ने पूर्वी एशिया में अनेक भाषण देकर वहाँ रहने वाले भारतीयों का आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने व आर्थिक सहायता का आह्वान किया। उन्होंने इसी दौरान पहली बार यह संदेश भी दिया, ‘तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।’ नेताजी ने ही बाद में ‘जय हिन्द’ का नारा भी दिया, जो वर्तमान भारत में सरकार से लेकर जनता तक हर व्यक्ति का जननारा बन चुका है।

विवेकानंद-अरविंद ने रोका अंग्रेजों की ग़ुलामी से

सुभाष चंद्र बोस ने प्रथामिक शिक्षा कटक स्थित प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में ली। 1909 में रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया। कॉलेज के प्राचार्य बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का सुभाष के मन पर अच्छा प्रभाव था। मात्र 15 वर्ष की आयु में सुभाष ने विवेकानंद साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया। कॉलेज काल से ही सुभाष तेजतर्रार विद्यार्थी थे। बाद में उन्होंने बंगाल रेजीमेंट में भर्ती होना चाहा, परंतु आँखों की खामी के कारण उन्हें सेना में शामिल नहीं किया गया, परंतु सुभाष का मन तो सेना में ही जाने का था। इसीलिए उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी की परीक्षा दी और फोर्ट विलियम सेनालय में रंगरूट के रूप में प्रवेश लिया। 1919 में कलकत्ता (अब कोलकाता) विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री हासिल की। इस बीच पिता जानकीनाथ बोस चाहते थे कि पुत्र सुभाष इंडियन सिविल सर्विस (ब्रिटिशकालीन) यानी ICS अधिकारी बनें। पढ़ाई के लिए वे 15 सितम्बर, 1919 को इंग्लैण्ड गए। आईसीएस परीक्षा पास भी की, परंतु सरकारी सेवा जॉइन करने को लेकर सुभाष असमंजस में थे। उन्होंने बड़े भाई शरत चंद्र बोस की राय लेने के लिए उन्हें पत्र लिखा, ‘मेरे दिलो-दिमाग में तो स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के आदर्शों ने कब्जा कर रखा है। ऐसे में आईसीएस अधिकारी बन कर मैं अंग्रेजों की ग़ुलामी कैसे कर पाऊँगा ?’ अंतत: 22 अप्रैल, 1921 को उन्होंने आईसीएस से त्यागपत्र दे दिया। पिता, परिवार के लोग और कई लोगों को नेताजी के निर्णय पर गर्व हुआ। सुभाष 1921 में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री लेकर स्वदेश लौट आए।

जब गांधीजी से मिले सुभाष

स्वदेश लौटते ही नेताजी कलकत्ता के स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करना चाहते थे। इसी दौरान रवीन्दरनाथ टैगोर की सलाह पर नेताजी मुंबई गए और 20 जुलाई, 1921 को पहली बार मणि निवास में महात्मा गांधी से मिले। गांधीजी ने उन्हें देशबंधुजी के साथ काम करने की सलाह दी। यह वह काल था, जब देश में गांधीजी द्वारा आहूत असहयोग आंदोलन चल रहा था। अपने क्रांतिकारी विचारों के चलते शीघ्र ही सुभाष देश के महत्वपूर्ण युवा नेता व स्वतंत्रता सेनानी बन गए। 1927 में साइमन कमीशन को काले झंडे दिखाने का नेतृत्व सुभाष ने किया। 26 जनवरी, 1931 को कलकत्ता में राष्ट्र ध्वज फहरा कर विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे सुभाष पर पुलिस ने लाठियाँ बरसाईं और जेल में डाल दिया। हालाँकि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता कर उन्हें रिहा करवा लिया।

भारत के लिए समर्थन जुटाने कई देशों की यात्रा की

भारत की आज़ादी के लिए सुभाष चंद्र बोस ने दुनिया के कई देशों की यात्रा की और समर्थन जुटाने का प्रयास किया। 1933 से 1936 तक वे यूरोप में रहे। वहाँ इटली के नेता मुसोलिनी से मिल कर सहायता मांगी। आयरलैण्ड के नेता डी. वलेरा सुभाष के अच्छे मित्र बन गए। 1934 में पिता के गंभीर होने की सूचना मिलते ही सुभाष कराची होते हुए कलकत्ता पहुँचे, परंतु तब तक पिता की मृत्यु हो चुकी थी। दूसरी तरफ अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर वापस यूरोप भेज दिया। 1934 में ऑस्ट्रिया में एक पुस्तक लिखने के लिए उन्हें अंग्रेजी टाइपिस्ट की आवश्यकता पड़ी। इसी आवश्यकता ने एमिली शेंकल से मुलाकात कराई। दोनों में प्रेम हुआ और 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू रीति-रिवाज से सुभाष-एमिली ने विवाह कर लिया। वियेना में एमिली ने पुत्री अनीता को जन्म दिया, परंतु स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त सुभाष ने जन्म के चार सप्ताह बाद अनीता का मुँह देखा। जब सुभाष का निधन हुआ, तब अनीता पौने तीन साल की थी। हालाँकि सुभाष की यात्रा जारी रही।

तानाशाह हिटलर के सामने भी नहीं घबराए नेताजी

1941 में सुभाष नज़रबंद कर दिए गए, परंतु सुभाष ने 116 जनवरी को पठान मोहम्मद ज़ियाउद्दीन के वेश धारण किया और कलकत्ता से दूर गोमोह पहुँचे। गोमोह से वे फ्रंटियर मेल पकड़ कर पेशावर पहुँचे, जहाँ उनकी मुलाकात फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी मियाँ अकबर शाह से हुई। शाह ने किसान नेता भगतराम तलवार से सुभाष को मिलाया। तलवार के साथ सुभाष अफग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के लिए निकले। इस सफर में भगतराम तलवार रहमत खान नाम के पाठन और सुभाष उनके गूँगे-बहरे चाचा के वेश में थे। पहाड़ियों में पैदल चलते हुए उन्होंने यह सफर पूरा किया था। सुभाष ने बर्लिन की यात्रा की। जर्मन सरकार के एक मंत्री एडम फॉन ट्रॉट सुभाष के मित्र बन गए। 29 मई, 1942 को सुभाष जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। अपने समय के क्रूर शासक हिटलर से मुलाक़ात के दौरान भी सुभाष ने अदम्य साहस का परिचय दिया और हिटलर के समक्ष इस बात के लिए नाराजगी जताई कि हिटलर ने कई साल पहले लिखी अपनी आत्मकथा में भारत और भारतीयों की बुराई की थी। सुभाष की नाराजगी पर हिटलर ने माफी मांगी और भारत विरोधी बातें आत्मकथा से हटवा दीं।

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