VIDEO-PHOTO : तीस साल पुरानी है ‘तीस हज़ारी’ की जड़, जिसका दुष्परिणाम आज तक भुगत रही पुलिस

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 5 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। राजधानी दिल्ली एक तरफ वायु प्रदूषण से परेशान है और दूसरी तरफ कानून के रखवाले पुलिस और वकीलों के बीच दंगल चल रहा है। इस दंगल का मैदान बना है दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट का परिसर। कहने को इस दंगल की शुरुआत 2 नवंबर-2019 शनिवार को हुई है, परंतु यदि तीस हज़ारी कोर्ट के इतिहास पर नज़र डाली जाये तो इस दंगल में पुलिस और वकीलों की भिड़ंत नई नहीं है। इससे पहले भी छोटी-बड़ी कई झड़पें हो चुकी हैं। और लंबा इतिहास खँगालने पर पता चलता है कि इस दंगल की जड़ें 31 साल पुरानी हैं और 1988 में पहली बार इसी कोर्ट परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच इसी तरह का गंभीर टकराव हुआ था। इस टकराव के बाद दिल्ली हाईकोर्ट का जो एक फैसला आया, उसे ही मौजूदा टकराव के पीछे का अहम कारण भी माना जा रहा है।

क्या है 31 साल पुराना मामला ?

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश शिव नारायण ढींगरा की मानें तो उन्हें 31 साल पहले 1988 में तीस हज़ारी कोर्ट में ही पहली बार हुई पुलिस और वकीलों की गंभीर झड़प का पूरा घटनाक्रम आज भी याद है। एक अखबार से बातचीत में सेवा निवृत्त न्यायाधीश ढींगरा ने अपनी यादों पर बल देते हुए बताया कि उस समय देश की प्रथम महिला आईपीएस किरण बेदी दिल्ली पुलिस में डीसीपी के पद पर कार्यरत् थीं। 17 फरवरी-1988 के दिन वकील कोई प्रस्तुति करने के लिये किरण बेदी के दफ्तर पहुँचे थे, जहाँ किसी बात को लेकर उनके बीच बात बिगड़ गई, जो पुलिस और वकीलों के बीच झड़प में बदल गई थी। उस समय भी बेकाबू हुई भीड़ के कारण ऐसे हालात बन गये थे कि किरण बेदी को भीड़ पर लाठीचार्ज करने का आदेश देना पड़ा था। इसका असर यह हुआ कि वकीलों ने दिल्ली की सभी अदालतों में कामकाज बंद करवा दिया था। इस दौरान पूर्व जस्टिस ढींगरा मेट्रोमोनियल कोर्ट में न्यायाधीश थे और वे एकमात्र ऐसे न्यायाधीश थे, जिन्होंने दिल्ली की सभी अदालतें बंद होने के बावजूद अपनी अदालत को खुला रखा था और फैसले भी सुनाये थे। उनके कथनानुसार उनकी अदालत को बंद कराने के लिये भी वकीलों का एक गुट आया था, परंतु उन्होंने उनसे साफ कह दिया था कि हड़ताल वकीलों की है, अदालतों की नहीं, इसलिये वे अदालत बंद नहीं करेंगे। इसके बाद वकील वहाँ से चले गये थे। पूर्व जस्टिस ढींगरा के अनुसार डीसीपी के दफ्तर में वकीलों के कारण हालात बेकाबू हो जाने से नौबत लाठीचार्ज तक पहुँची थी। जब तक हालात बेकाबू नहीं होते हैं, तब तक कोई पुलिस अधिकारी लाठीचार्ज का आदेश नहीं देता है। वह भी कानून के रखवाले वकीलों पर, भला बैठे-बिठाए मुसीबत को आमंत्रण कौन देना चाहेगा ? पूर्व जस्टिस ढींगरा के अनुसार बवाल इतना बढ़ा था कि दिल्ली हाईकोर्ट ने खुद संज्ञान लिया था। उस समय वकील किरण बेदी और उनके मातहत पुलिसकर्मियों से जम कर पिटे थे और उग्र होकर अदालतें बंद कराने जैसी अटपटी हरकतों पर उतर आये थे। उस समय भी ऑफिसों में तोड़फोड़, वाहनों में आगजनी और तोड़फोड़ जैसी हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया था। इसलिये हाईकोर्ट ने संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई की थी। इसमें 13-12 के अनुपात में जजों की पीठ सुनवाई करने बैठी थी। इसके बावजूद दोनों ही बेंच ने अपना फैसला वकीलों के पक्ष में सुनाया था। अदालत का कहना था कि पुलिस की ओर से वकीलों पर लगाये गये आरोपों को साबित करने के लिये पर्याप्त प्रमाण पेश नहीं किये जा सके हैं। अपने पक्ष में आये इस फैसले के बाद ही दिल्ली के वकील ऐसे बेकाबू हुए कि उनके इस मद के कारण ही दिल्ली के अदालत परिसरों में वकीलों और पुलिस की झड़प की छोटी-बड़ी घटनाएँ बार-बार सामने आती रही हैं। पूर्व जस्टिस ढींगरा के कहने का तात्पर्य यह है कि मौजूदा घटनाक्रम की जड़ भी कहीं न कहीं उसी 31 साल पुराने घटनाक्रम से जुड़ी है और कहीं न कहीं वकीलों का वही उन्माद वर्तमान घटनाक्रम के लिये भी जिम्मेदार है।

पुलिस को मिल रहा जन समर्थन


मतलब ये कि वह मामला भी दादागीरी और चौधराहट का था और यह मामला भी बिल्कुल वैसा ही है। क्योंकि कोर्ट परिसर में लगे सीसीटीवी में कैद हुए दृश्यों में खुलासा हुआ है कि एक वकील ने पुलिस वैन के बगल में अपनी कार खड़ी की थी, जिसको लेकर एक पुलिसकर्मी ने वकील के पास जाकर उससे अपनी गाड़ी हटाने को कहा था। इसी बात को लेकर पहले दोनों के बीच बहस हुई और फिर बात मारपीट तक पहुँच गई। इसमें वकीलों की भीड़ ने इकट्ठा होकर पुलिस टीम पर हमला कर दिया तो पुलिस को बचाव में हवाई फायर करना पड़ा। हवाई फायर किये जाने से वकील और उग्र हो गये तथा उन्होंने पुलिस टीम को पीटने के साथ-साथ कोर्ट परिसर में खड़ी पुलिस की एक जिप्सी और 13 बाइकों समेत लगभग 17 वाहनों में आग लगा दी। इस घटना में एक एडीसीपी, दो एसएचओ सहित 20 पुलिस कर्मियों के घायल होने की बात कही गई, जबकि दूसरी ओर वकीलों ने भी अपने आठ साथियों के घायल होने का दावा किया। इस घटना से साफ है कि पूर्व जस्टिस ढींगरा का कथन सत्य है और यह मामला भी दादागीरी और चौधराहट का ही प्रतीत हो रहा है। एक तरफ वकील धरना देकर फायरिंग करने वाले और वकीलों से मारपीट करने वाले पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की माँग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर एक वकील द्वारा एक पुलिसकर्मी पर हमला किये जाने का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिसकर्मियों में दहशत फैल गई है और कहा जा रहा है कि जहाँ भी वकीलों के गुट अकेले-दुकेले पुलिसकर्मियों को देखते हैं तो उन पर हमला कर रहे हैं, जिससे उनकी खुद की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। ऐसे में पुलिस कर्मियों ने मंगलवार को पुलिस हैडक्वार्टर के बाहर प्रदर्शन कर पुलिस पर हमला करने वाले वकीलों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की माँग की और उच्च पुलिस अधिकारियों को किरण बेदी के पोस्टर दिखा कर नारे भी लगाये और यह दर्शाने का प्रयास किया कि जिस तरह किरण बेदी ने पुलिसकर्मियों का साथ दिया था, वैसे ही वर्तमान उच्च पुलिस अधिकारियों को भी पुलिसकर्मियों का साथ देना चाहिये और पुलिस कर्मियों के ही विरुद्ध कदम नहीं उठाने चाहिये, बल्कि उनके साथ मारपीट और उन पर हमला करने वाले वकीलों के विरुद्ध केस दर्ज करके उन्हें सजा दिलवानी चाहिये। पुलिस का कहना है कि उसने क्राइम ब्रांच के अधिकारियों की विशेष जाँच टीम गठित करके इस मामले की जाँच सौंपी है। जाँच रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को सौंपी गई है और केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भी रिपोर्ट भेजी गई है। गृह मंत्रालय भी घटनाक्रम पर कड़ी नज़र रखे हुए है। इस बीच आईएएस अधिकारियों के संगठन का भी पुलिस को समर्थन प्राप्त हुआ है। कई आईएएस अधिकारियों ने पुलिस कर्मियों के पक्ष में ट्वीट किये हैं, वहीं दूसरी ओर वकीलों को उनके बार एसोसिएशन की ओर से चेतावनी मिली है कि जो भी वकील हिंसक घटनाओं में लिप्त पाये जाएँगे उनके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी। इस प्रकार ऐसा लगता है कि 31 साल बाद इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है, परंतु इस बार बाज़ी बदली हुई नज़र आ रही है। पुरानी घटना में पुलिस के लाठीचार्ज में वकीलों को पिटाई झेलनी पड़ी थी और उन्हें संवेदनाओं का लाभ मिला था। इस बार वकीलों के हाथों पुलिसकर्मियों की पिटाई होने से लोगों की संवेदनाएँ पुलिसकर्मियों के पक्ष में दिख रही हैं।

You may have missed