क्या सिर्फ कांग्रेस का ‘भोंपू’ बन कर नहीं रहना चाहती थीं प्रियंका चतुर्वेदी ? शिवसेना में पूरी होंगी महत्वाकांक्षाएँ ?

लगभग एक दशक तक कांग्रेस में रह कर प्रवक्ता पद तक ही पहुँच पाने वालीं प्रियंका चतुर्वेदी ने शुक्रवार को एक हाथ से कांग्रेस का हाथ छोड़ते ही दूसरे हाथ से शिवसेना का दामन थाम लिया। ऐसा करके प्रियंका चतुर्वेदी ने बहुत बड़ा राजनीतिक दाँव खेला है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि प्रियंका के इस कदम के पीछे उनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा छुपी है, जो कांग्रेस में रहते हुए पूरी नहीं हो रही थी और वह मात्र पार्टी की ‘भोंपू’ बनकर नहीं रहना चाहती थी। यह तो स्पष्ट है कि उन्होंने कांग्रेस में रहकर कर्मठ प्रवक्ता के रूप में अपनी पार्टी के पक्ष को दमदार तरीके से पेश किया। इतना ही नहीं, वह सोशल मीडिया पर युवाओं की फेवरिट थी।

एक ओर जहां कांग्रेस में उन्हें मुखर राजनेता के रूप में उभरने का मौका नहीं मिल रहा था, वहीं दूसरी ओर शिवसेना को दिल्ली में अपनी पार्टी के लिये दमदार मुखर नेता की तलाश थी। कांग्रेस की मानें तो दोनों की ही महत्वाकाँक्षाओं को अच्छी तरह से जानने वाले कुशल रणनीतिकार के रूप में प्रसिद्ध जनता दल यूनाइटेड (JDU) के नेता प्रशांत किशोर ने प्रियंका चतुर्वेदी को शिवसेना में प्रवेश दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यदि यह सच है तो शिवसेना को दिल्ली में प्रियंका के रूप में एक मुखर चेहरा तो मिल गया, परंतु बदले में प्रियंका को शिवसेना से क्या कुछ मिल सकता है। इसके बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस से लोकसभा का टिकट हासिल नहीं कर पाने वाली शिवसेना अगले वर्ष राज्य सभा के माध्यम से प्रियंका को संसद में प्रवेश दिला सकती है। 23 मई को आने वाले लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद यदि फिर से भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की केन्द्र में सरकार बनी तो शिवसेना उन्हें नई मोदी सरकार में मंत्री पद भी दिला सकती है। उससे पहले छह महीने के भीतर महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं, जिसमें शिवसेना की ओर से प्रियंका को बड़ी भूमिका सौंपी जा सकती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि कांग्रेस के हाथों की कठपुतली बनी रहने वाली प्रियंका चतुर्वेदी भविष्य में बड़ी राजनीतिक भूमिका में दिखाई दे सकती हैं। अब यह बड़ी भूमिका महाराष्ट्र में निभाएंगी या दिल्ली की राजनीति में उभरेंगी, यह देखना दिलचस्प रहेगा।

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