तो क्या सोनिया 2004 जैसे चमत्कार की आस लगाए बैठी हैं ? परंतु क्या सोनिया जानती हैं कि न वाजपेयी हारे थे और न मोदी ने हारना सीखा है ?

कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आज रायबरेली लोकसभा सीट से नामांकन पत्र दाखिल करते हुए लोकसभा चुनाव 2004 को याद किया। सोनिया ने उस चुनाव को याद करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह मानने की भूल न करें कि वे अजेय हैं।

सोनिया का इशारा स्पष्ट था कि 1999 से छह वर्ष तक सत्ता चलाने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सभी अनुकूल परिस्थितियाँ होने के बावजूद और सत्ता विरोधी कोई लहर नहीं होने के बावजूद लोकसभा चुनाव 2004 में सत्ता से बेदखल कर दिए गए थे। सोनिया ने आज रायबरेली से नामांकन भरते वक्त 2004 की वाजपेयी सरकार की हार को याद कर एक तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने की कोशिश की कि मोदी को भी 2004 की तरह इस चुनाव में सत्ता से बेदखल होना पड़ सकता है, परंतु ऐसा करते समय सोनिया ये भूल गईं कि वे 15 साल पुरानी बात कर रही हैं। लोकतंत्र में हार और जीत तो चलती रहती है, परंतु कोई राजनीतिक दल या नेता यदि परिश्रम और अपने कार्यों के बल पर नहीं, बल्कि पूर्व में हुए किसी ‘चमत्कार’ के बल पर सत्ता के सपने देखने लगे, तो फिर मतदान की आवश्यकता ही क्या है ?

सिपहसलारों ने डुबोया, शहरी मतदाताओं ने दिया धोखा

सोनिया गांधी कदाचित यह भूल रही हैं कि वाजपेयी सरकार की पराजय में सबसे महत्वपूर्ण कारण शहरी मतदाताओं की उदासीनता। वाजपेयी ने अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान एक समय शहरी मतदाताओं की ही कहलाने वाली भाजपा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया और यही कारण था कि 2004 में गाँव के लोगों ने तो भाजपा-एनडीए को झोली भर के वोट दिए, परंतु शहरी मतदाताओं ने धोखा दे दिया। निर्धारित समय के अनुसार 2004 के चुनाव सितम्बर-अक्टूबर की सर्दियों में होने वाले थे, परंतु वाजपेयी के तत्कालीन सिपहसलारों ने एक तरफ शाइनिंग इंडिया का न हजम होने वाला नारा दिया, तो दूसरी तरफ छह माह पूर्व ही चुनाव करवाने का निर्णय किया। परिणाम यह हुआ कि शाइनिंग सन के बीच यानी अप्रैल-मई की भीषण गर्मी में चुनाव हुए और आलसी शहरी मतदाता वोट करने निकला ही नहीं। शहरी मतदाताओं की उदासीनता ने कांग्रेस को फायदा पहुँचाया, क्योंकि कांग्रेस का परम्परागत वोटर तो धूप-छाँव, ठंड-गर्मी, बाढ़-आंधी-तूफान के बीच भी वोट डालता ही है और उसी के कारण कांग्रेस जीती और वाजपेयी सरकार को जाना पड़ा।

भूल दोहराएगा मतदाता ? भाजपा-भारत दोनों बदले

2004 और 2019 में बहुत फर्क है, जो शायद सोनिया गांधी की समझ में नहीं आ रहा। शहरी मतदाताओं की उदासीनता के कारण 2004 में कांग्रेस की झोली में सत्ता उस तरह आ गिरी, जैसे बिल्ली के मुँह में छींका आ गिरता है। इसके बाद देश ने दस वर्षों तक कांग्रेस का शासन देखा। देश चल रहा था, लेकिन चला कौन रहा था, यह किसी को समझ में नहीं आ रहा था। देश और दुनिया के सामने डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री के रूप में केवल एक चेहरा थे, जबकि सत्ता चलाने वाले मोहरे पर्दे के पीछे थे। इसी कारण ईमानदार मनमोहन के शासन में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा। जनता को समझ में आ गया कि वाजपेयी सरकार को हटा कर अनायास ही सत्तारूढ़ हुई यूपीए सरकार देश का भला नहीं कर रही।

2009 में वाजपेयी निष्क्रिय हो चुके थे और चेहरा आडवाणी बन चुके थे, जिन्हें जनता ने नकार दिया, परंतु 2014 में नरेन्द्र मोदी के रूप में विकल्प मिलते ही मतदाताओं ने ग़लती सुधार ली और कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि मोदी जैसा एक चेहरा होने के बावजूद अनेक चेहरों में बँटे विपक्ष के अनेक गठबंधनों पर जनता भरोसा करेगी ? दूसरी तरफ सोनिया को यदि 2004 की याद आ रही रही है, तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि 15 वर्षों में भाजपा और भारत दोनों बदल चुके हैं। भाजपा के पास आज नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे दमदार नेता, सूक्ष्म और मजबूत संगठन शक्ति, लाखों कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है, जो कदाचित 15 साल पहले इतना मजबूत नहीं था। तो भारत भी मोदी के नेतृत्व में यह देख चुका है कि एक मजबूत नेतृत्व हो, तो देश सफलताओं के किन-किन शिखरों को छू सकता है।

न वाजपेयी हारे, न मोदी हारेंगे

जहाँ तक चुनावी और राजनीतिक इतिहास की बात है, तो अटल बिहारी वाजपेयी पूरा जीवन अटल योद्धा रहे। उन्होंने तो जनसंघ से लेकर भाजपा तक कई बार चुनावी पराजयों का सामना किया, परंतु मन से उन्हें कोई नहीं हरा सका। यही कारण है कि 2004 की हार में भी लोगों को वाजपेयी की नहीं, बल्कि इंडिया शाइनिंग, गुजरात दंगे, शहरी मतदाताओं की उदासीनता जैसे कारण ही दिखाई दिए। किसी ने भी 2004 की हार के लिए वाजपेयी या उनकी सरकार के कामकाज को जिम्मेदार नहीं ठहराया। अब यदि मोदी की बात की जाए, तो 2001 से चुनावी राजनीति में कदम रखने वाले मोदी ने भी 18 वर्षों में कभी हार नहीं मानी। हाँ झटकों पर झटके लगते रहे, पर मोदी हर झटके के बाद अधिक मजबूती के साथ उभरे। ऐसे में सोनिया यदि 2004 की तरह किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठी हैं, तो कदाचित वे भूल कर रही हैं, क्योंकि मोदी और शाह के रहते ऐसा होना फिलहाल तो संभव नहीं लगता। फिर भी 23 मई की प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए, जब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed