मोदी का विरोध करते-करते संघीय भारत से खुला ‘विद्रोह’ करने पर उतर आईं ममता बैनर्जी ?

मोदी एक्सपायरी हो सकते हैं, पर क्या देश का PM एक्सपायरी हो सकता है ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

भारत का अर्थ है राज्यों का संघ। संविधान में भी भारत का यही अर्थ लिखा है। इसे हम संघीय भारत भी कहते हैं। इस संघीय भारत के लोकतंत्र में देश का प्रधानमंत्री और किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी राजनीतिक दल का ही होता है, परंतु भारत की संघीय भावना के अनुसार कोई व्यक्ति जब प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की भूमिका में होता है, तब वह पूरे देश-प्रदेश का नेता होता है, न कि किसी दल विशेष मात्र का नेता।

यह बात इसलिए कहने को विवश होना पड़ा है, क्योंकि देश में लोकसभा चुनाव 2019 का राजनीतिक महासंग्राम चल रहा है। इस महासंग्राम में प्रत्येक राजनीतिक दल को अपने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल का विरोध करने का पूरा-पूरा अधिकार है। यह काम सभी राजनीतिक दलों के नेता बख़ूबी कर भी रहे हैं, परंतु इन नेताओं में अलग-अलग राजनीतिक दलों के वे संवैधानिक पदाधिकारी भी शामिल हैं, जो देश के प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री हैं। ऐसा नहीं है कि देश का प्रधानमंत्री या विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री चुनाव में अपने राजनीतिक दल के लिए विरोधी राजनीतिक दल के विरुद्ध प्रचार नहीं कर सकते, परंतु बात जब देश पर या राज्य पर संकट की आए, तब संवैधानिक पदों पर बैठे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को कंधे से कंधा मिला कर काम करना होता है।

आप जानते ही हैं कि लोकसभा चुनावी महासंग्राम के बीच देश पर अचानक एक चक्रवाती संकट भी आया। फानी नामक यह चक्रवात देश के चार राज्यों पर कहर बरपा कर चला गया। संकट की इस घड़ी में जहाँ नरेन्द्र मोदी ने अपने दल-गठबंधन भाजपा और एनडीए के लिए चुनाव प्रचार की व्यस्तता के बीच प्रधानमंत्री की भूमिका निभाई, वहीं संकट का सामना कर रहे चार राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के मुख्यमंत्री भी मुस्तैद हो गए। इस संकट का सामना केन्द्र-प्रधानमंत्री और राज्य-मुख्यमंत्री को मिल कर करना था, जिसमें मोदी ने पूरी सतर्कता व तत्परता दिखाई, तो सर्वाधिक प्रभावित ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अपनी पार्टी बीजू जनता दल (BJD) के लिए प्रचार अभियान छोड़ आपदा प्रबंधन की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे देख कर पूरी दुनिया दंग रह गई। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने न केवल ओडिशा के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, अपितु राजनीतिक विरोधी होने के बावजूद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के आपदा प्रबंधन की प्रशंसा की।

अब बात करते हैं शीर्षक की। फानी चक्रवात सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में दूसरा नाम था पश्चिम बंगाल, जिसकी मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी हैं। पिछले तीन वर्षों से दिल्ली से लेकर बेंगलुरू और कोलकाता तक एकमात्र मोदी विरोध का एजेंडा लेकर चल रहीं ममता ने भी फानी चक्रवात के संकट के समय अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए प्रचार अभियान छोड़ संकट का सामना करने के लिए पूरी मुस्तैदी से मुख्यमंत्री की भूमिका निभाई, परंतु यहाँ बात ओडिशा से बिल्कुल विपरीत हुई। ममता ने पश्चिम बंगाल के लिए तो टीएमसी का चोला उतार लिया, परंतु मोदी विरोध की धधकती आग के बीच ममता यह भूल गईं कि मोदी नेता भले ही भाजपा के हैं, परंतु वे संघीय भारत के प्रधानमंत्री हैं और इस नाते वे ममता के भी प्रधानमंत्री हैं। मोदी यह नहीं भूले। उन्होंने ओडिशा की तरह ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को कई बार फोन किए, परंतु ममता ने एक भी बार बात नहीं की। संकट काल में भी ममता का यह व्यक्ति विरोध क्या भारत की संघीय भावना के मूलभूत ढाँचे पर प्रहार नहीं है ? एक संवैधानिक पद पर बैठी होने के बावजूद ममता ने मोदी से बात न करने के पीछे यह कारण दिया कि वे एक्सपायरी पीएम के साथ मंच साझा नहीं करना चाहतीं। क्या ममता यह भूल गईं कि नरेन्द्र मोदी एक्सपायरी हो सकते हैं, परंतु देश का पीएम एक्सपायरी कभी नहीं हो सकता ? यह तो एक संवैधानिक पद है और मोदी आज इस पद पर हैं, तो ममता की मेहरबानी से नहीं, अपितु देश के बहुमत ने उन्हें यहाँ बैठाया है। क्या ममता का देश के प्रधानमंत्री के साथ इस तरह का दुर्भावनापूर्ण व्यवहार संघीय भारत से खुला विद्रोह नहीं है ?

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