कद से वामन, दिल से पावन, पद से विशेष और हद से विराट : जानिए कौन थे वे ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 जून, 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। भारत की वर्तमान पीढ़ी वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश के सशक्त प्रधानमंत्री के रूप में देखती है, जिन्होंने तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए देशहित में नोटबंदी, जीएसटी और तीन तलाक को खत्म करने जैसे कड़े फैसले लिये, परंतु क्या आपको पता है कि कड़े फैसले लेने वाला देश का प्रथम प्रधानमंत्री कौन है ? आज से ठीक 55 साल पहले 9 जून-1964 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले वह व्यक्ति थे ‘लाल बहादुर शास्त्री।’

शास्त्री के आह्वान पर पूरे देश ने रखा था व्रत

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 27 मई-1964 को मृत्यु होने के बाद गुलज़ारीलाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया, परंतु वह 13 दिन ही कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद अगले प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री ने 9 जून-1964 को पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। शारीरिक कद काठी में छोटे परंतु विराट विचारधारा वाले लाल बहादुर शास्त्री को जब यह पद मिला था, उस समय देश की हालत ठीक नहीं थी। भारत 1962 में चीन से युद्ध हार चुका था। इसके बाद सूखे की ऐसी मार पड़ी कि देश को खाने के लिये अनाज अन्य देशों से आयात करना पड़ रहा था। तब लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों का आह्वान किया कि लोग एक वक्त का खाना छोड़कर व्रत करें और सूखे की मार झेल रहे किसानों में उम्मीद जगाए रखने के लिये और उनका जोश बनाये रखने के लिये ‘जय जवान जय किसान’ का अमर नारा दिया जो आज भी लोग नहीं भूले हैं।

1965 के युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाई

लाल बहादुर शास्त्री ज्यादा समय तक देश के प्रधानमंत्री नहीं रहे, वह 581 दिन यानी 9 जून-1964 से 11 जनवरी-1966 तक लगभग 18 महीने या डेढ़ साल ही देश के प्रधानमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में ही 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमला किया था, परंतु लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को ऐसा करारा जवाब दिया कि पाकिस्तान को आभास हो गया कि उसने भारत की आंतरिक खस्ता हालत देखकर उस पर हमला करने का जो फैसला किया था वह गलत था। भारत की सेना ने लाहौर तक पाकिस्तान में घुसकर उसकी मीलों जमीन पर कब्जा कर लिया था और पाकिस्तान को नाकों चने चबवा दिये थे। इस प्रकार वह एक कुशल शासक थे। कड़े फैसले लेने के लिये जाने जाते लालबहादुर शास्त्री बोलने में अत्यंत मृदुभाषी और सरल स्वभाव वाले व्यक्ति थे।

स्नातक की डिग्री लेकर श्रीवास्तव से बने ‘शास्त्री’

देखने में छोटे कद के लाल बहादुर शास्त्री फैसले लेने में बचपन से ही दृढ़ मनोबल वाले थे। 2 अक्टूबर 1904 को वाराणसी से लगभग 7 मील दूर स्थित मुगलसराय में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री भी अत्यंत गरीब परिवार से जुड़े थे जो राजनीति में आने के बाद देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचे थे। लाल बहादुर शास्त्री के पिता मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव स्कूल टीचर थे। लाल बहादुर शास्त्री के जन्म के डेढ़ साल बाद ही उनका निधन हो गया था। इसलिये उनकी माता रामदुलारी अपनी तीन संतानों को लेकर अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गई थी। कुछ समय के बाद उनके नाना का भी निधन हो गया। सबसे छोटे होने के कारण लाल बहादुर शास्त्री को सब ‘नन्हे’ कहकर बुलाते थे। उनके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उनकी माँ का संतानों को पालने में सहयोग किया। लाल बहादुर शास्त्री ने प्राथमिक शिक्षा ननिहाल में पूरी की। इसके बाद वह चाचा के यहाँ वाराणसी आ गये जहाँ वह काशी विद्यापीठ में पढ़े। यहीं से उन्हें स्नातक की डिग्री प्राप्त हुई। उस समय इस डिग्री को ‘शास्त्री’ की डिग्री कहा जाता था। तभी से उनके नाम के साथ शास्त्री शब्द जुड़ गया, अन्यथा वह कायस्थ परिवार में जन्मे थे। 1928 में मिर्जापुर निवासी गणेश प्रसाद की पुत्री ललिता से उनकी शादी हुई थी, जिनसे उनकी 6 संतानें हुईं। दो बेटियाँ कुसुम और सुमन तथा चार पुत्र हरिकृष्ण, अनिल, सुनील और अशोक। उनके दो पुत्रों हरिकृष्ण और अशोक का इंतकाल हो चुका है। शेष दो पुत्रों में से एक अनिल शास्त्री कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, जबकि सुनील शास्त्री भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये हैं।

कद में वामन लेकिन दृढ़ता में विराट थे शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री बचपन से ही दृढ़ निश्चयी थे। वह 11 वर्ष की उम्र से ही महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित होकर उनके आंदोलन से जुड़ गये थे। परिवार वालों के विरोध की परवाह किये बिना उन्होंने यह फैसला किया था, जिसकी बदौलत उन्हें मात्र 16 साल की उम्र में जेल भी जाना पड़ा था। वह 1921, 1930, 1940, 1941 और 1946 में 7 बार जेल गये और उनके जीवन के 9 साल जेल में गुजरे।

अपनी शादी के समय उन्होंने दृढ़ता दिखाई थी और उस काल में जब दहेज प्रथा चरम पर थी, तब उन्होंने दहेज लेने से साफ इनकार कर दिया था। बहुत आग्रह पर उन्होंने मात्र एक चरखा और उससे बने हुए कुछ मीटर कपड़े स्वीकार किये थे। 1946 में वह उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव नियुक्त हुए बाद में वह गृहमंत्री बन गये थे। 1951 में कांग्रेस महासचिव बनने के कारण वह दिल्ली आ गये थे। बाद में जवाहरलाल नेहरू की सरकार में वह रेलमंत्री और गृहमंत्री बने। इससे पहले उत्तर प्रदेश में गोबिंद वल्लभ पंत की सरकार में वह परिवहन मंत्री बने तब पहली बार उन्होंने ही महिला सशक्तिकरण की भी पहल की थी। उन्होंने पहली बार रोडवेज की बसों में महिला कंडक्टरों की भर्ती करने को मंजूरी दी थी। उन्होंने ही लाठीचार्ज के स्थान पर आंदोलनकारियों के विरुद्ध पानी की बौछार करने की भी शुरुआत की थी। रेलमंत्री के पद पर रहते हुए एक रेल दुर्घटना के बाद हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए रेलमंत्री के पद से इस्तीफा देने की पहल भी उन्होंने ही की थी।

शास्त्री की मृत्यु रहस्य बनकर रह गई

1965 में जब उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर धाबा बोला तब कुछ अमेरिकी और रशियन नागरिक पाकिस्तान में थे, जिन्हें वहाँ से सुरक्षित निकालने के लिये अमेरिका और रशिया ने कुछ समय के लिये युद्धविराम की मांग की, जिसे लाल बहादुर शास्त्री ने सख्ती से मना कर दिया। इसके बाद रशिया की राजधानी ताशकंद में भारत और पाकिस्तान को ताशकंद समझौते के लिये बुलाया गया। 10 जनवरी-1966 की रात ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर के बाद 11 जनवरी-1966 की रात 1.30 बजे उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। हमेशा लाल बहादुर शास्त्री के साथ रहने वाली उनकी पत्नी ललिता देवी को आजीवन इस बात का अफसोस रहा कि इस दौरे में वह अपने पति के साथ नहीं गईं जिसके लिये उन्हें जबरन रोका गया था और मनाया गया था कि वह उनके साथ न जाएँ। यदि वह साथ गई होती तो कदाचित वह अपने पति को साथ लेकर लौटती। कहा जाता है कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हुई, परन्तु ललिता देवी आजीवन आरोप लगाती रही कि उन्हें जहर देकर मारा गया, क्योंकि वह लाहौर तक कब्जा की गई पाकिस्तान की जमीन छोड़ने के लिये तैयार नहीं थे, वहीं कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा कब्जा की गई जमीन वापस लेने पर आमादा थे। उन्होंने इस बैठक में साफ कह दिया था कि इस समझौते पर वह हस्ताक्षर नहीं करेंगे। फिर कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये और इसके तुरंत बाद कुछ ही घण्टों में वह मृत पाये गये, यह रहस्य अब तक बना हुआ है कि उनकी मृत्यु कैसे हुई। दूसरी तरफ कश्मीर का हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहुँच गया। उन्हें मृत्योपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

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