EXCLUSIVE : ठाकरे ने जिन्हें ‘दुष्ट’ कहा, वे उद्धव के लिए ‘इष्ट’ कैसे बन गए ?

* क्या नैतिक पतन की पराकाष्ठा कर पिता-दादा को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकेंगे उद्धव-आदित्य ?

* शिवसेना की तुलना आतंकवादियों से करने वाली कांग्रेस क्या मुँह लेकर जनता के बीच जाएगी ?

* क्या सोनिया के विदेशी मूल के विरुद्ध एनसीपी बनाने वाले पवार का कांग्रेस से गठबंधन ही सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न नहीं ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 16 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। साधारण जगत में प्रेम, स्नेह और मोह को एक ही तुला पर रख कर देखा जाता है, परंतु वास्तव में ये तीनों शब्द जितने अलग हैं, उतने ही उनके अर्थ भी अलग हैं। ये तीनों शब्द उल्टी दिशा में गति करें यानी मोह स्नेह में और स्नेह प्रेम में बदले, तो मनुष्य ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है, परंतु अनादिकाल से अच्छे-अच्छे विवेकी पुरुष भी इन तीनों शब्दों के भेद को परखने में धोखा खा जाते हैं। उदाहरण के लिए महाभारत ग्रंथ सर्वश्रेष्ठ है, जिसमें राधा-कृष्ण का संबंध निष्काम, नि:स्वार्थ और निरपेक्ष प्रेम का प्रतीक है, तो दुर्योधन को हस्तिनापुर का सिंहासन सौंपने को ही पुत्र प्रेम समझने वाला धृतराष्ट्र कभी नहीं समझ सका कि यह पुत्र के प्रति उसका प्रेम नहीं, अपितु मोह है और यही मोह उसे भीषण युद्ध की ओर ले गया।

जी नहीं ! हमारा लक्ष्य आपको द्वापर की महाभारत की कथा सुनाने का नहीं, अपितु उससे मिलती-जुलती महाराष्ट्र की महाभारत की कथा सुनाने का है। कल यानी 17 नवंबर महाराष्ट्र विशेषकर शिवसेना के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है, क्योंकि उसके संस्थापक अध्यक्ष बाळा साहेब ठाकरे की 7वीं पुण्यतिथि है। इस पूरे आलेख में हम ठाकरे शब्द प्रयोग बाळा साहेब ठाकरे के लिए ही करेंगे, जबकि उनके वंशज उद्धव ठाकरे के लिए उद्धव व आदित्य ठाकरे के लिए आदित्य शब्द प्रयोग करेंगे। तो चलिए बात बाळा साहेब ठाकरे यानी ठाकरे की करते हैं, जिनकी पुण्यतिथि को शिवसेना और ठाकरे के वंशज उद्धव व आदित्य अविस्मरणीय बनाना चाहते हैं, परंतु ये पिता-पुत्र (उद्धव-आदित्य) कदाचित 20 वर्ष पूर्व अपने पिता-दादा (बाळा साहेब) ठाकरे की ओर से कही गई वह बात भूल जाना चाहते हैं, क्योंकि इन दोनों के सिर पर वही ‘सत्ता मोह’ सवार है, जो धृतराष्ट्र के सिर पर सवार था। सोशल मीडिया पर किया गया यह ट्वीट भी मोह से पतन की कुछ कहानियों की ओर इंगित करता है।

ऐसा नहीं है कि उद्धव-आदित्य को ठाकरे की 20 वर्ष पुरानी बात याद नहीं होगी, परंतु सत्ता का मोह और अपने पुराने साथी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) के समक्ष स्वयं को ‘बड़ा’ सिद्ध करने का दुराग्रह उद्धव-आदित्य को ठाकरे के उस कथन की अवगणना करने पर विवश कर रहे हैं, जिसमें बाळा साहेब ठाकरे ने अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए ‘दुष्ट’ जैसा शब्द प्रयोग किया था। उद्धव महाराष्ट्र में एक शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनवा कर 17 नवंबर को अपने पिता ठाकरे को उनकी पुण्यतिथि पर सत्तांजलि देना चाहते हैं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि ठाकरे ने जिन राजनीतिक विरोधियों के लिए ‘दुष्ट’ शब्द प्रयोग किया था, उद्धव का उन्हें ही ‘इष्ट’ बना कर पिता ठाकरे को श्रद्धांजलि देना सच्ची श्रद्धांजलि कहला सकती है ?

क्या कहा था बाळा साहेब ठाकरे ने ?

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के लिए 21 अक्टूबर को मतदान और 24 अक्टूबर को परिणाम आने के बाद जब शिवसेना ने राजहठ का मार्ग अपनाया, तो भाजपा ने शिवसेना के साथ किए गए गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद सरकार बनाने से पीछे हट जाना उचित समझा, परंतु शिवसेना ने हार नहीं मानी और उसने सत्ता के सिंहासन को हासिल करने के लिए अपने सभी नैतिक-वैचारिक सिद्धांतों को ताक पर रखने का मार्ग अपनाया। शिवसेना ने जैसे ही सत्ता के लिए अपने धुर-विरोधी राजनीतिक दलों कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP-राकांपा) से समर्थन की कवायद आरंभ की, सोशल मीडिया पर बाळा साहेब ठाकरे का वर्ष 1999 में एक मीडिया को दिया गया इंटरव्यू वाला वीडियो वायरल हो गया। यह इंटरव्यू उस समय लिया गया था, जब केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 24 दलों के गठबंधन वाली एनडीए सरकार थी और एनडीए विरोधी दल वाजपेयी सरकार को गिराने की कवायद में जुटे हुए थे। इस इंटरव्यू में ठाकरे से जब पूछा गया, ‘राजनीति में संभावना बनी रहती है, क्या आप शरद पवार के साथ गठबंधन करेंगे ?’ उत्तर में ठाकरे ने आश्चर्य के साथ कहा था, ‘संभावना ? यदि यह कहा गया होता कि राजनीति दुर्जनों का खेल है, आप दुर्जन के साथ रहेंगे या सज्जन के साथ ? मैं बता देता हूँ कि मैं दुर्जन के साथ नहीं जाऊँगा, दुष्ट के साथ गठबंधन संभव नहीं है।’ प्रश्न शरद पवार को लेकर था। अत: ठाकरे के उत्तर से स्पष्ट है कि वे पवार व एनसीपी को दुष्टों की श्रेणी में रख रहे थे। ठाकरे यहीं नहीं रुके थे। उन्होंने आगे कहा था, ‘जो इंसान अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अस्थिर करने के प्रयास में लगा हो, उससे हम हाथ कैसे मिला सकते हैं ? कम से कम मैं यह कभी नहीं कर सकता हूँ।’ प्रश्न पवार को लेकर था, अत: स्पष्ट है कि ठाकरे अपने उत्तर में जिस इंसान की बात कर रहे हैं, वह इंसान शरद पवार थे। बाल ठाकरे ने पवार को उद्धृत करते हुए कहा था, ‘जो इंसान (पवार) मीडिया के सामने यह कह रहा है कि यह मेरा कर्तव्य है कि मैं सरकार को अस्थिर करूँ और मैंने यह काम किया।’ साथ ही ठाकरे ने कहा था, ‘मैं जानता हूँ पवार को इस काम में पारंगत हासिल है। आप जनता और मतदाता के बारे में सोचिए, वो कैसे हमारे गठबंधन को स्वीकार करेगी ?’

कांग्रेस और एनसीपी भी नैतिक पतन की राह पर ?

सत्ता मोह अच्छे-अच्छों की मति हर लेता है। उद्धव का सत्ता मोह पुत्र मोह से अत्यंत निकट है। उद्धव के मुख्यमंत्री बनने का सीधा अर्थ होगा कि आदित्य को विरासत में मुख्यमंत्री पद मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। उद्धव पुत्र मोह के वश वह कार्य करने जा रहे हैं, जो उनके पिता ठाकरे उनके लिए कभी नहीं कर सके। यहाँ कहने का यह तात्पर्य नहीं है कि शिवसेना या ठाकरे ने अपने जीते-जी कभी भी कांग्रेस का समर्थन किया, परंतु ठाकरे ने सैद्धांतिक मूल्यों को इस तरह कभी ताक पर नहीं रखा, जैसा कि आज उद्धव रखने को आतुर हैं।

जहाँ तक उद्धव का प्रश्न है, तो वे तो यह सब सत्ता मोह, विरासत मोह, पुत्र मोह के चक्कर में कर रहे हैं, परंतु स्वतंत्रता आंदोलन की महान भागीदार कांग्रेस किस तरह उस शिवसेना को समर्थन देने को सज्ज हो गई, जिसकी तुलना कभी उसने आतंकवादियों के साथ की थी। अधिक पुरानी बात नहीं है। अभी चार वर्ष पहले ही कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से 19 अगस्त, 2015 को एक ट्वीट किया गया था, जिसमें कहा गया था, ‘क्या शिव सेना और आतंकवादियों में कोई अंतर है ?’ कांग्रेस ने यह ट्वीट शिवसेना के उस कथन पर किया था, जिसमें शिवसेना ने आह्वान किया था, ‘हिन्दुओं को पाकिस्तान पर आक्रमण करने के लिए मानव बम बनना ही होगा।’ यदि शिवसेना के इस कथन पर कांग्रेस उसकी तुलना आतंकवादियों से कर चुकी है और इसके बावजूद उसे समर्थन देकर महाराष्ट्र में एक नापाक सरकार बनवाने की भागीदारी कर रही है, तो फिर एक राष्ट्रीय स्तर की सबसे पुरानी पार्टी के नैतिक पतन का इससे बड़ा आधार क्या हो सकता है ? रही बात एनसीपी की, तो शरद पवार ने एनसीपी का गठन ही कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने के कारण किया था। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न तो तब लगना चाहिए था, जब वही पवार उसी सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करते आ रहे हैं। पवार जिस विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हुए, वह मूल तो अब भी बना हुआ है। ऐसे में पवार की राजनीतिक नैतिकता तो उसी दिन समाप्त मान लेनी चाहिए, जिस दिन उन्होंने कांग्रेस से अलग होने के बावजूद उसी कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन किया और अब वही पवार-एनसीपी कांग्रेस के साथ मिल कर शिवसेना की सरकार बनवा रहे हैं, जो नैतिक पतन की पराकाष्ठा से तनिक भी कम नहीं है।

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