घाटे के साथ मोदी नहीं : दिशा भटके ‘पवन हंस’ से सरकारी पंख छीनने की हो गई तैयारी !

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 11 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। जहाँ घाटा, वहाँ मोदी नहीं हो सकते। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं घाटा कर रहे सरकारी उपक्रमों की। हाल ही में यह ख़बर भी आई थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार घाटा कर रहे अनेक सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू-PSU) को बंद करने जा रही है। इसी कड़ी में अब यह समाचार आया है कि मोदी सरकार ने हेलीकॉप्टर सेवा प्रदाता कंपनी पवन हंस लिमिटेड से सरकारी पंख छीनने की तैयारी शुरू कर दी है, क्योंकि पवन हंस दिशा भटक चुका है।

सूत्रों के अनुसार मोदी सरकार ने बड़ा निर्णय करते हुए 34 वर्ष पुरानी पवन हंस लिमिटेड (PHL) कंपनी को बेचने का निर्णय किया है। इसके लिए निविदा जारी कर दी गई है। 22 अगस्त, 2019 तक निविदाएँ भरी जा सकेंगी। 34 वर्ष पूर्व 15 अक्टूबर, 1985 को भारतीय हेलीकॉप्टर निगम (एचसीआई-HCI) के नाम से स्थापित हुई पवन हंस लिमिटेड में उस समय 78.5 प्रतिशत सरकार की हिस्सेदारी थी, जबकि तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) की हिस्सेदारी 21.5 प्रतिशत थी। हाल में पीएचएल में सरकार की हिस्सेदारी 51 व ओएनजीसी की हिस्सेदारी 49 प्रतिशत है। देश की राष्ट्रीय हेलीकॉप्टर कंपनी के रूप में स्थापित पीएचएल का उद्देश्य रिमोट एरियाज़, विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों और ओएनजीसी के खनन-वहन कार्यों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा प्रदान करना था, परंतु अब यह पवन हंस लिमिटेड यानी पीएचएल मोदी सरकार के लिए सफेद हाथी बन गई है, क्योंकि यह लगातार घाटा कर रही है। इसीलिए मोदी सरकार ने पीएचएल में अपनी 51 प्रतिशत भागीदारी बेचने का निर्णय किया है। ओएनजीसी बोर्ड ने भी अपनी 49 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का निर्णय कर लिया है। ऐसे में अब पवन हंस लिमिटेड का पूर्णत: निजीकरण होना सुनिश्चित हो गया है।

जनवरी-2017 से ही मोदी की नज़र में थी पीएचएल

The Prime Minister, Shri Narendra Modi flagging off the Pawan Hans Helicopter services from Daman to Diu through video link, at a function, in Daman on February 24, 2018.

पीएचएल की सरकारी हिस्सेदारी बेचने का निर्णय जल्दबाज़ी में या अचानक नहीं किया गया है। वास्तव में लगातार घाटा कर रही पीएचएल पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पिछले ढाई वर्षों से नज़र थी। इसीलिए मोदी सरकार ने 12 जनवरी, 2017 को ही पवन हंस का निजीकरण करने का निर्णय कर लिया था। इस निर्णय के पीछे मोदी सरकार का स्पष्ट रुख था कि घाटा करने वाले उपक्रमों को वह सहन नहीं करेगी। यदि पीएचएलके घाटे पर नज़र डालें, तो 2018-19 में कंपनी को 89 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। इतना ही नहीं, पीएचएल पर 230 करोड़ रुपए का ऋण भी है। भारत की सबसे बड़ी हेलीकॉप्टर सेवा प्रदाता कंपनी पीएचएल के पास 50 हेलीकॉप्टर हैं। कंपनी हेलीपोर्ट और हेलीपैड भी बना रही है, तो सी प्लेन व छोटे हवाई जहाज चलाने की भी तैयारी कर रही है। कंपनी को 34 वर्षों में 10 लाख घण्टों की उड़ान का अनुभव है। ओएनजीसी के अलावा हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) के छह ध्रुव हेलीकॉप्टर भी पवन हंस ही संचालित करता है।

मुनाफे के बावजूद कैसे घाटे में आ गई पवन हंस ?

वर्ष 2017 में पवन हंस लिमिटेड मुनाफे में थी और यह 38.8 करोड़ रुपए था, परंतु कंपनी के हेलीकॉप्टरों के निरंतर दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण प्रतिष्ठा को हानि पहुँची। 2014-16 के बीच 38 हेलीकॉप्टरों के साथ छोटी-बड़ी दुर्घटनाएँ हुईं, तो कई हेलीकॉप्टर क्रैश भी हुए। 2011 में अरुणाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दोरजी खांडू जिस हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए, वह हेलीकॉप्टर पवन हंस का ही था। सुरक्षा मानकों पर ख़रा नहीं उतरने के कारण पवन हंस को मिलने वाले ऑर्डर्स में लगातार कमी आती गई और निजी कंपनियाँ बाज़ी मारने लगीं। इसके साथ ही पवन हंस के दिन पल्टे और वह मुनाफे की बजाए आज 89 करोड़ के घाटे में आ गई।

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