भारत के सांस्कृतिक जगत को सूना कर गया यह कलाकार : राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ने दी श्रद्धांजलि

  • प्रख्यात लेखक, नाटककार, अभिनेता और फिल्म निर्देशक गिरीश कर्नाड का निधन
  • लंबी बीमारी के बाद 81 वर्ष की उम्र में ली अंतिम साँस

अहमदाबाद, 10 जून, 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित पद्मश्री और पद्मभूषण लेखक, नाटककार, अभिनेता और फिल्म निर्देशक गिरीश कर्नाड का सोमवार को निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थे और कई बार अस्पताल में भर्ती हो चुके थे। सोमवार सुबह उन्होंने बंगलुरू स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम साँस ली। वह 81 वर्ष के थे। उनके निधन से कला, साहित्य जगत और बॉलीवुड में शोक व्याप्त हो गया है।

गिरीश कर्नाड देश के साहित्य, नाटक और फिल्म जगत की जानी-मानी हस्ती थे। उनके लिखे हयवदन, तुगलक, तलेदंड, नागमंडल और ययाति जैसे नाटक बहुत लोकप्रिय हुए और देश की कई भाषाओं में उनका अनुवाद तथा मंचन हुआ। नाट्यकला के क्षेत्र में इब्राहिम अलकाजी, अरविंद गौड़ और प्रसन्ना आदि बड़े-बड़े निर्देशकों ने उनके नाटकों का निर्देशन किया है। उनके निधन से संपूर्ण कला जगत गहरे शोक में है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके निधन पर शोक प्रकट करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। राष्ट्रपति ने ट्वीट करके कर्नाड को श्रद्धांजलि दी और लिखा कि कर्नाड के निधन से देश का सांस्कृतिक जगत सूना हो गया है। लेखक, अभिनेता और भारतीय रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर गिरीश कर्नाड के देहावसान के समाचार सुनकर दुःख हुआ। पीएम मोदी ने कहा कि गिरीश कर्नाड प्रत्येक माध्यम में अपनी बहुमुखी अभिनय प्रतिभा के लिये याद किये जाएँगे और आने वाले सालों में भी उनकी लोकप्रियता बनी रहेगी। उनके निधन से दुःखी हूँ।

गिरीश कर्नाड कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित कलाकार थे। उन्हें 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1974 में पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण तथा कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा कालीदास सम्मान, टाटा लिटरेचर लाइव लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार और सिनेमा क्षेत्र के ढेर सारे पुरस्कार तथा सम्मान मिल चुके थे।

महाराष्ट्र के माथेरान में 19 मई-1938 को जन्मे गिरीश कर्नाड का जन्म एक कोंकणी भाषी परिवार में हुआ था। उन्होंने धारवाड़ में स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से 1958 में स्नातक (ग्रेज्युएट) की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद इंग्लैंड गये, जहाँ उन्होंने ऑक्सफोर्ड के लिंकॉन तथा मेगडेलन महाविद्यालयों से दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेज्युएशन) की पढ़ाई की। अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में वह विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। इसके बाद लेखन, नाटक और फिल्म के क्षेत्र में आ गये थे।

कर्नाटक के कॉलेज में प्रचलन था कि वहाँ सब छात्र कविताएँ, लघुकथाएँ और लोककथाएँ लिखते थे। इसलिये कर्नाड भी इस दिशा में कार्यरत् हुए और उन्हें जिसने सबसे अधिक प्रभावित किया वह थे कीर्तिनाथ कुर्तकोटि। जिनके माध्यम से उन्हें मनोहर ग्रंथमाला में प्रवेश मिला और उसी ने उन्हें लेखक बनाया।

कर्नाड की माँ का बाल विवाह हुआ था, जिससे उनका एक बेटा था। इसके बाद उनकी माँ कम उम्र में ही विधवा हो गई थी। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई की और नर्स बनी। उसी दौरान उनका परिचय गिरीश कर्नाड के पिता से हुआ और उन्होंने शादी कर ली। इस शादी से गिरीश और उनकी एक छोटी बहन का जन्म हुआ था। इस प्रकार गिरीश सौतेले बड़े भाई और बहन के साथ माता-पिता संग खुशहाल परिवार में पले-बढ़े। वह अपनी माँ से सर्वाधिक प्रभावित रहे, जिनका जीवन संघर्षमय रहा।

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