‘अपनों’ की घृणा को पीछे छोड़ ‘चट्टान’ बन गईं ये अम्माएँ चीते की तरह ‘चलती’ हैं…

रिपोर्ट : तुहिना चौबे

अहमदाबाद 21 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। कहते हैं कि इंसान को सबसे बड़ा और घातक पीड़ा तब होती है, जब उसे उसके अपने ठुकरा देते हैं। इंसानों के साथ अक्सर ऐसी घटना उनकी ढलती आयु में होती है, जब बड़े ही लाड़-प्यार से पाली गईं उनकी संतानें उन्हें इस हद तक घृणा और हिकारत देती हैं कि उनमें इन तथाकथित ‘अपनों’ को याद करने तक का साहस नहीं रह जाता।

आगामी 1 अक्टूबर को विश्व वयोवृद्ध दिवस है। इसी उपलक्ष्य में कर्नाटक सरकार ने वयोवृद्धों के लिए एक स्पोर्ट्स मीट का आयोजन किया। बेंगलुरू के कांतिवारा स्टेडियम में आयोजित इस स्पोर्स्ट मीट में 250 वयोवृद्ध महिलाओं ने भाग लिया। कर्नाटक में सामान्यत: वयोवृद्ध महिलाओं को अम्मा के संबोधन से पुकारा जाता है। इस स्पोर्ट्स मीट में भाग लेने वाली 250 वयोवृद्ध महिलाओं में से तीन महिलाओं ने शानदार प्रदर्शन किया और सबका दिल जीत लिया, परंतु आप सोच भी नहीं सकते होंगे कि सबका दिल जीतने वाली इन अम्माओं के दिल में कितनी पीड़ा भरी हुई है। इन तीन अम्माओं की कहानी सुन कर किसी भी हृदय भर आ सकता है। ये तीनों अम्माएँ ऐसी हैं, जिन्हें उनके अपनों से न केवल घृणा मिली, अपितु उन्हें उनके अपनों ने ही जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनका साथ छोड़ दिया, परंतु ये हारी नहीं। अपनों की घृणा को पीछे छोड़ ये अम्माएँ चट्टान बन गईं और स्पोर्ट्स मीट में चीते की तरह चलती नज़र आईं।

स्पोर्ट्स् मीट में सबसे बड़ा कारनामा कर दिखाया 72 वर्षीय ललितम्मा ने। उन्होंने 200 मीटर की दौड़ जीती, तो 81 साल की सरोजम्मा 100 मीटर दौड़ स्पर्धा में पहले स्थान पर रहीं। ललितम्मा ने हर किसी को तब आश्चर्य में डाल दिया, जब उन्होंने कुछ ही मिनटों में 200 मीटर की वॉक पूरी कर ली। सीनियर सिटिज़न की यह मीट 1 अक्टूबर को मनाए जाने वाले वर्ल्ड एल्डर्स डे के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी। 200 मीटर की वॉक जीतने वाली ललितम्मा ने बताया कि वह खुद को फिट रखने के लिए रोज वॉक करती हैं। ललितम्मा 71 से 80 वर्ष की उम्र वाली सीनियर सिटिजन वॉक में सबसे आगे रहीं। यहाँ तक की ललिता के फिनिश लाइन पार करने के बाद दूसरे नंबर पर रहीं प्रतिभागी उनसे 50 मीटर दूर रहीं। ललितम्मा ने बताया कि वह एक कॉलेज में प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुई हैं। वह जब युवा थीं, तब उन्होंने लॉङ्ग रेस में कई मेडल्स और अवॉर्ड जीते हैं। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन कम से कम एक घंटे पैदल चलती हैं। उनकी इसी पैदल चलने की आदत ने उन्हें इस मीट का विजेता बनाया।

ललितम्मा याद नहीं करना चाहतीं परिवार को

ललितम्मा से जब उनके परिवार के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘मुझे जब कोई अज्जी कहता है, तो अच्छा नहीं लगता, विशेषकर जिसे मैं नहीं जानती।’ अज्जी का अर्थ होता है दादी। अब वो किसी की भी दादी नहीं कहलाना चाहतीं। परिवार के साथ उन्हें इतने कड़वे अनुभव हुए हैं कि उन्हें अज्जी शब्द से ही नफ़रत हो गई है। ललितम्मा वैसे तो अपने और अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं कहना चाहतीं, लेकिन कुछ नहीं कहते हुए भी वो बहुत कुछ कह जाती हैं। परिवार के बारे में बात करने से इनकार करने के बावजूद ललितम्मा ने अपने भावों से इतना अवश्य बता दिया की उन्हें परिवार ने कितनी तकलीफ़ें दी होंगी, परंतु अब वे अकेले रह कर बहुत खुश हैं। लोग उनसे कहते हैं कि इस उम्र में वह इतनी मेहनत क्यों करती हैं, तो उन्हें लगता है कि लोग उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं। वे काम से कभी थकती नहीं हैं। अब वे काम में इतनी व्यस्त रहना चाहतीं हैं कि न तो उन्हें परिवार याद रहे और न ही उनके दिए कष्ट।

बहू के ज़ुल्मों ने सरोजम्मा को बनाया योद्धा

ललितम्मा की तरह की 81 वर्षीय सरोजम्मा ने 100 की वॉक में विजय हासिल की। उनसे जब वॉक जीतने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपने घुटने में बंधी पट्टी दिखाकर कहा की ‘मेरी बहू से पूछो, जिसने मेरे पैर तोड़कर मुझे लावारिसों की तरह सड़क पर छोड़ दिया और मेरी सारी संपत्ति हड़प ली।’ सरोजम्मा ने अपने घुटने में पट्टी बांध कर इस वॉक में हिस्सा लिया। उनके इस जज़्बे को देख कर सभी हैरान रह गए। उन्होंने बताया की उनके परिवार वाले उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार करते थे, लेकिन अब वे इन सब बातों से ऊपर उठ कर अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हैं। इतनी कठिनाइयों के बावज़ूद खुश रहने की कोशिश करती हैं। इस स्पोर्ट्स् मीट में भाग लेने वाली एक अन्य महिला 65 वर्षीय रतनम्मा की भी इसी तरह की कहानी है। रतनम्मा के बच्चों ने उन्हें छोड़ दिया। इस इवेंट में भाग लेने को लेकर उन्होंने कहा कि ये इवेंट उन्हें दु:ख से थोड़ी राहत देने वाली सिद्ध हुई है। रतनम्मा को अपने बच्चों के बारे में कुछ भी नहीं पता है। वो कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं। न कभी रतनम्मा को वो अपने साथ ले गए और न ही रतनम्मा से मिलने आए। रतनम्मा अपनी आजीविका चलाने के लिए कुली का काम करतीं हैं। जीवन की ऐसी कठोर वास्तविकता जान कर दु:ख और गुस्सा दोनों आता है।

‘मातृ-पितृ देवो भव:’ के देश में वयोवृद्धों की दुर्दशा

मातृ देवो भव: और पितृ देवो भव: की अवधारणा को मानने वाले भारत देश में अपने सर्जक माता-पिता की संतानों द्वारा की जाने वाली दुर्दशा वास्तव में पीड़ादायक है। एक अशासकीय संगठन (NGO) हेल्प एज इंडिया के सर्वे के अनुसार 23 प्रतिशत वयोवृद्ध अत्याचार के शिकार हैं। अधिकांश मामलों में वयोवृद्धों को उनकी बहूएँ सताती हैं। 39 प्रतिशत मामलों में बुज़ुर्गो ने अपनी बदहाली के लिए बहुओं को ज़िम्मेदार माना है। हेल्प एज इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सताने के मामले में बेटे भी पीछे नहीं है। 38 प्रतिशत मामलों में बेटों को दोषी पाया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि माँ-बाप को तंग करने के मामले में बेटियाँ भी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार छोटे शहरों में 17 प्रतिशत बेटियाँ अपने मां बाप पर अत्याचार करती पाई गईं।

झकझोर देता है यह कटु और पीड़ाकारी सत्य

अध्ययन में सामने आयी कुछ सच्चाई काफी कड़वी है। परिस्थितियाँ इस कदर बदल रही हैं कि बुज़ुर्गों की दर्द भरी दास्तान सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बुजुर्ग अपने ही घर के भीतर असुरक्षित हैं। ताने मारना, उलाहने देना या गाली देना.. यहाँ तक तो ठीक है, परंतु इंतेहा तब हो जाती है जब संतानें माता-पिता के साथ मारपीट तक करने लगते हैं। हेल्पेज इंडिया के सर्वे में शामिल 39 प्रतिशत बुज़ुर्गों को परिवार वालों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है। अत्याचार का शिकार होने वाले बुज़ुर्गों में 35 प्रतिशत ऐसे हैं, जो लगभग हर दिन परिजनों से मार खाते हैं। अत्याचार का शिकार होने वालों में से 79 प्रतिशत के मुताबिक उन्हें लगातार अपमानित किया जाता है। 76 प्रतिशत को अक्सर बिना बात के गालियाँ और उलाहने सुनने को मिलते हैं। सर्वे में शामिल 69 प्रतिशत बुज़ुर्गों का कहना है कि उनकी अवहेलना की जाती है। उनकी ज़रूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। बुज़ुर्गों के प्रति बढती असंवेदना के लिए सिर्फ देश के बड़े महानगर ही ज़िम्मेदार नहीं हैं। यह कुप्रवृति छोटे शहरों में भी दिखाई देने लगी है। बुज़ुर्गो पर अत्याचार के लिहाज से देश के 24 शहरों में तमिलनाडु का मदुरै सबसे ऊपर है, जबकि उत्तर प्रदेश का कानपुर नंबर दो पर है। मदुरै में 63 प्रतिशत और कानपुर में 60 प्रतिशत बुज़ुर्ग अत्याचार का शिकार हो रहे हैं। बड़े महानगरों में हैदराबाद इस लज्जापूर्ण सूची में पहले स्थान पर है, जहाँ 37.5 प्रतिशत बुजुर्गों को अपने बच्चों से शिकायत है। 28 प्रतिशत के साथ कोलकाता दूसरे, 20 प्रतिशत के साथ दिल्ली तीसरे स्थान पर है। मुंबई का स्थान चौथा है, जहाँ 11.43 प्रतिशत बुज़ुर्गों ने अत्याचार होने की बात स्वीकार की है, जबकि चेन्नई में सबसे कम 9.64 प्रतिशत बुजुर्गों को यह शिकायत है।

क्या है माता-पिता संरक्षण के लिए कानून ?

माता-पिता के संरक्षण के लिए कानून भी बने हुए हैं। ऐसा ही एक कानून है, ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का रख-रखाव व कल्याण अधिनियम-2007’ है। इस कानून में बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल के प्रावधान हैं। वृद्धावस्था से संबंधित चुनौतियों से निपटने के लिए यह एक ऐतिहासिक कानून बनाया गया है, परंतु जानकारी के अभाव और परिवार की बदनामी के डर के चलते कई बुज़ुर्ग खुद ही कानून का सहारा लेने से हिचकिचाते हैं। कई मामलों में बुज़ुर्ग अपने बच्चों के मोहजाल में इस कदर फँसे हुए होते हैं कि उनकी प्रताड़ना भी ख़ामोशी से सह लेते हैं। हमारी नई पीढ़ी को बचपन से ही बुज़ुर्गो के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है। साथ ही बुज़ुर्गो को आर्थिक रूप से सबल बनाने के विकल्पों पर भी ध्यान देना होगा. तभी हम वृद्धा आश्रम मुक्त भारत बना सकते हैं।

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