कैसे अंग्रेजी शब्द AGREEMENT बन गया ‘गिरमिट’ और फिजी में फैल गई हिन्दी ?

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 14, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। भारत की स्वतंत्रता के 2 वर्ष बाद यानी 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी, इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस मनाया जाने लगा, परिणामस्वरूप हिन्दी और इसकी अनेक बोलियाँ भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी बोली, लिखी और समझी जाने लगीं। मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में बड़ी संख्या में लोग हिन्दी बोलते हैं। फरवरी-2019 में अबू धाबी में भी हिन्दी को न्यायालय की तीसरी भाषा के रूप में मान्यता दी गई।

2001 की भारतीय जनगणना के अनुसार भारत में 42 करोड़ 20 लाख लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा बताया, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में 8 लाख से अधिक लोग हिन्दी बोलते हैं। मॉरीशस में भी 6 लाख से अधिक हिन्दी भाषी हैं। दक्षिण अफ्रीका में 8 लाख 90 हजार, यमन में 2 लाख 32 हजार, युगांडा में 1 लाख, सिंगापुर में 5 हजार, नेपाल में 8 लाख, जर्मनी में 30 हजार लोग हिन्दी भाषा का प्रयोग करते है। इन सबके बीच आज हिन्दी दिवस पर हम आपको एक अत्यंत दिलचस्प बात यह बताने जा रहे हैं कि दुनिया के मानचित्र पर एक छोटे-से द्वीप समूह के रूप में दिखने वाले देश फिजी में हिन्दी को वह सम्मान प्राप्त है, जो भारत में भी नहीं है। भारत में हिन्दी केवल राजभाषा है, परंतु फिजी एक ऐसा देश है, जिसने अपनी अधिकृत भाषाओं में हिन्दी को भी शामिल किया है। फिजी में जो हिन्दी बोली जाती है उसे ‘फिजी हिन्दी’ कहते हैं, इसे फिजियन हिन्दी या फिजियन हिन्दुस्तानी भी कहते हैं। फिजी हिन्दी अधिकांशतः भारतीय मूल के फिजी लोगों द्वारा बोली जाती है। फिजी हिन्दी देवनागरी लिपि और

रोमन लिपि दोनों में लिखी जाती है। अब प्रश्न यह उठता है कि फिजी में हिन्दी भाषा का उदय कैसे हुआ ? इसका उत्तर देने से पहले आइए पहले जानते हैं फिजी के बारे में। कैप्टन कुक ने खोजा देश और दिया फिजी नामफ़िजी एक द्वीप समूह गणराज्य ( Matanitu Tu-Vaka-i-koya ko Viti) है, जो दक्षिण प्रशान्त महासागर के मेलानेशिया में स्थित है। 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान डच एवं अंग्रेजी खोजकर्तओं ने फिजी की खोज की थी। फिजी में प्रचुर मात्रा मे वन, खनिज और जलीय स्रोतों होने के कारण यह प्रशान्त महासागर के द्वीपों मे सबसे उन्नत है। वर्तमान में पर्यटन और चीनी का निर्यात फिजी के विदेशी मुद्रा के सबसे बड़े स्रोत हैं। फिजी द्वीप का मुख्य द्वीप विती लेवु है। फिजी के पड़ोसी द्वीप टोंगा के निवासी इसे ” फिसी ” नाम से पुकारते हैं। यूरोपीय लोगों को फिजीवासियों के बारे मे सर्वप्रथम कैप्टन कुक के महासागरीय अभियानों के दौरान उनके दल के लेखक सदस्यों द्वारा लिखे गए लेखों से मिला। फिजी के मूल निवासी पोलिनेशियाई और मेलाशियाई लोग हैं, जो सदियों पहले दक्षिण प्रशांत के मूल स्थान से यहाँ आये थे। कैप्टन कुक ने ही टोंगा के लोगों द्वारा फिसी कह कर पुकारे जाने वाले इस देश को फिजी नाम दिया था।

जब भारतीय गिरमिटिया मजदूर पहुँचे फिजी

वर्ष 1874 में ब्रिटेन ने फिजी द्वीप को अपने नियंत्रण में लेकर इसे अपना एक उपनिवेश बनाया। उस समय ब्रिटेन का विश्व के अधिकांशदेशों पर नियंत्रण था, जिसमें भारत भी शामिल था। ब्रिटेन ने 1834 से भारत के कई मजदूरों को ग़ुलामों के रूप में विभिन्न देशों में भेजना शुरू किया था। इसके लिए ब्रिटिश सरकार मजदूरों से एक AGREEMENT पर हस्ताक्षर करवाती थी, जिसके अंतर्गत वे पाँच वर्ष बाद ही मजदूरी से मुक्त हो सकते थे। अंग्रेजी के इस शब्द एग्रीमेंट का ही अपभ्रंश होकर गिरमिट हो गया और इस एग्रीमेंट के तहत विभिन्न देशों में भेजे जाने वाले मजदूर गिरमिटिया कहलाने लगे। एग्रीमेंट के तहत मजदूर को 5 साल काम करना होता था, परंतु ये मजदूर धन के अभाव में स्वदेश नहीं लौट पाते थे और जिस देश में मजदूरी करने जाते थे, वहीं बस जाते थे। इसी एग्रीमेंट के तहत वर्ष 1879 में ब्रिटिश भारत के 61,000 मजदूरों को फिजी भेजा गया। इसके बाद तो वर्ष 1916 तक हज़ारों प्रवासी भारतीय श्रमिक फिजी लाए गए, पर वाप नहीं लौट गए। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा इस एग्रीमेंट के तहत भारतीय मजदूरों को दूसरे देशों में भेजने का सिलसिला 1834 से 1917 तक चला और यही गिरमिट काल कहलाया।

तोताराम सनाढ्य बने गिरमिटिया मुक्ति के संवाहक

गिरमिट काल में साहित्य रचना नगण्य ही रही है। चालीस वर्षों के इस अंतराल में रामायण, महाभारत, आल्हखंड जैसे महाकाव्यों से संबंधित कथाएँ कही-सुनी जाती रहीं, साथ ही अन्य प्रेरक एवं मनोरंजक किस्सा-कहानी भी समय काटने का माध्यम रहीं। पूरे गिरमिट काल में अव्यवस्थित ढंग से हिन्दी साँस लेती रही, परंतु जीवित रही। इन दिनों पारंपरिक एवं तत्कालीन परिस्थितियों पर आधारित लोकगीतों का ही बोल-बाला था, जो विशेषतः लोक रीतियों को पुष्ट करता रहा, उनका संरक्षण और संवर्धन करता रहा, जिसमें तोताराम सनाढ्य का नाम बहुत महत्वपूर्ण है। तोताराम सनाढ्य का जन्म 1876 में हिरनगी (फिरोज़ाबाद-उत्तर प्रदेश) में हुआ था। पिता की असामयिक मृत्यु के कारण उनका बचपन बहुत ग़रीबी में बीता। तोताराम सनाढ्य 1904 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में फिजी गए थे। वहाँ उन्होंने भारतीय मजदूरो की जो दशा देखी, उससे वे बहुत विचलित हुए और उनके कल्याण के लिए काम करने लगे। फिजी में भारतीयों की दुर्दशा को 21 वर्षों तक देखने वाले तोताराम सनाढ्य ने ‘फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष’ शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी। तोताराम सनाढ्य के संघर्ष के चलते अंग्रेजी हुक़ूमत को फिजी द्वीप में गिरमिटिया प्रथा 1 जनवरी 1920 को समाप्त करनी पड़ी।

इस तरह हुआ हिन्दी का उदय

1920 और 1930 के दशक में हजारों भारतीय स्वेच्छा से यहाँ आकर बसने लगे। इन भारतीयों ने ही फिजी में हिन्दी भाषा की नींव रखी। आज के फिजी में भी यही भारतीय अर्थ व्यवस्था की रीढ़ हैं। भारतीय मूल के फिजी नागरिक दोनों प्रमुख द्वीपों Matanitu Tu-Vaka-i-koya ko Viti के शहरी क्षेत्रों और गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के आस-पास रहते हैं। फिजी की वर्तमान जनसंख्या 9 लाख 15 हजार है, जिनमें भारतीयों की संख्या लगभग 4 लाख है। फिजी मूल के लगभग 5 लाख लोग ईसाई हैं, जिनमें दो तिहाई मेथोडिस्ट हैं, जबकि भारतीय मूल के लोगों 77 प्रतिशत हिन्दू, 16 प्रतिशत मुस्लिम, 6 प्रतिशत ईसाई और कुछ सिख समुदाय के भी लोग हैं। ‘द इकोनोमिस्ट’ के अनुसार 1977 में 2,55,000 की संख्या के साथ फिजी मूल के नागरिक अल्पसंख्यक हो गये थे। उस समय 6,00,000 की कुल जनसंख्या में से लगभग आधे नागरिक भारतीय मूल के थे, जबकि शेष चीनी, यूरोपीय और मिश्रित वंश के थे। लगभग आधी आबादी भारतीय मूल के लोगों की होने के कारण फिजी में हिन्दी का धीरे-धीरे उदय होने लगा और आज फिजी में बोली जाने वाली हिन्दी अवधी भाषा का स्वरूप है। अवध में प्रयुक्त शब्दावली आज भी यहाँ प्रचलित है, जैसे सब्जी पेठा/सीताफल को कोहंडा कहा जाता है, पूड़ी को सोहारी, पैर को गोड़ कहा जाता है। इसका मूल कारण यहाँ गिरमिटिया के रूप में पहुँचे भारतीय थे, जिनकी जड़ें भारतीय अवध क्षेत्र से थीं। इसी कारण फिजी की भाषा अवधी के रूप में विकसित हुई। भारतीयों की पहली पीढी़, जिसने इस भाषा को बोलचाल के रूप में अपनाया, उसे ‘फिजी बात’ कहा गया।

हिन्दी ने इस तरह पकड़ी गति

1920 के बाद अनेक परिवर्तन हुए लोगों के जीने की व्यवस्था में सुधार हुआ, लोग अपनी संतान के भविष्य को सँवारने-सुधारने के उपाय सोचे लगे। पाठशालाओं की स्थापना का प्रबंध किया गया, औपचारिक रूप से हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने के प्रति भी प्रबुद्ध-समुदाय का ध्यान गया और सभी भारतीय पाठशालाओं में पढ़ाने का माध्यम हिन्दी ही बन गई। वर्षों तक चौथी कक्षा तक इन पाठशालाओं में हिन्दी ही शिक्षण का माध्यम रही। हिन्दी की स्थापना में बहुत से लोगों ने हाथ दिया। कई पढ़े-लिखे हिन्दी-प्रेमी अपनी रचनाएँ भी हिन्दी में करने लगे और धीरे धीरे उनका प्रकाशन भी व्यवस्था होने लगा। हिन्दी भाषा के इस प्रवाह को सुनियोजित एवं व्यवस्थित करने के लिए तथा स्थानीय लोगों के उत्साहवर्धन के लिए हिन्दी-प्रेस और हिन्दी समाचार पत्रों को बढ़ावा दिया गया। जागृति, फिजी समाचार, शांतिदूत, प्रशांत समाचार सामने आए, इन समाचार पत्रों के सहारे पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होने लगीं।

स्वतंत्र फिजी ने हिन्दी को अधिकृत भाषा बनाया

फिजी 10 अक्टूबर, 1970 को ब्रिटिश शासनाधिकार से स्वतंत्र हो गया। उस दिन दशहरा था। फिजी में रहने वाले हिन्दुओं ने पूरे देश के साथ मिल कर विजया दशमी के साथ-साथ स्वतंत्रता का भी उत्सव मनाया। फिजी में स्वतंत्रता के बाद अब हिन्दी को पनपने का अच्छा अवसर मिला। स्वतंत्र फिजी में 4 भाषाओं को अधिकृत/क्षेत्रीय भाषाओं का दर्जा दिया गया, जिसमें अंग्रेजी, फिजियन, फिजियन हिन्दी और रोटुमैन शामिल हैं। इसी दौरान हिन्दी महापरिषद-फीजी की स्थापना हुई, जिसके प्रमुख संरक्षक नवोदित राष्ट्र फिजी के प्रथम प्रधानमंत्री रातू सर कमिरोसे मारा बने। फिजी के प्रतिपक्षी दल के नेता जनाब सद्दीक कोया संरक्षक तथा हिन्दी के विद्वान पं. विवेकानंद शर्मा संस्थापक अध्यक्ष बने।

फिजी-मॉरीशस के कारण यूनेस्को में हिन्दी को मिला सम्मान

10 से 14 जनवरी, 1975 के दौरान भारत में महाराष्ट्र के नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें मॉरिशस के साथ-साथ फिजी के हिन्दी भाषियों ने भी प्रतिनिधित्व किया। इसी महा सम्मेलन में मॉरिशस तथा फिजी के ज़ोरदार प्रस्ताव के फलस्वरूप हिन्दी यूनेस्को की एक औपचारिक भाषा स्वीकार कर ली गई। इसका अच्छा प्रभाव फिजी के प्रवासी भारतीयों पर भी पड़ा और फिजी में अनेक समाचार पत्र और पत्रिकाएँ उभर कर सामने आईं। इन्हीं दिनों जय फिजी, प्रशांत समाचार, सनातन संदेश और उदयाचल आदि का प्रकाशन आरंभ हुआ। अनेक विद्यालयों में हिन्दी एक प्रमुख विषय के रूप में पाठयक्रम में लाई गई। हिन्दी की अनेक रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं और राष्ट्र कवि पं. कमला प्रसाद मिश्र के साथ-साथ जोगिंन्दर सिंह कँवल, बाबू हरनाम सिंह, ईश्वरी प्रसाद चौधरी तथा अन्य कई हिन्दी रचनाकार उभरकर सामने आए। इन्हीं दिनों पं. विवेकानंद शर्मा जी की भी अनेक रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें जब मानवता कराह उठी, प्रशांत की लहरें, प्रधानमंत्री रातू मारा, गुलाब के फूल, फिजी में सनातन धर्म के सौ साल का इतिहास, आदि उल्लेखनीय हैं।

फिजी में चहुँओर गूंज रही है हिन्दी

कभी फिजी में रेडियो फिजी एकमात्र रेडियो स्टेशन था, परंतु आज फिजी में नवतरंग, रेडियो फीजी टू और बूला एफ.एम. 98 हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। अब तो चौबीसों घंटे हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित होने लगे हैं। फीजी वन दूरदर्शन भी दिन में एक बार हिन्दी में समाचार प्रस्तुत करता है। भारत से 12,000 मील दूर होते हुए भी तीसरी और चौथी पीढ़ी के भारतीयों ने फिजी में अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और धर्म को सुरक्षित रखा। फिजी में आर्य समाज, सनातन धर्म, मुसलिम लीग, कबीर पंथ सभा, सिख गुरुद्वारा समिति आदि धार्मिक संस्थाएँ अपना-अपना कार्य आनंद-पूर्वक कर रही हैं। दीपावली, होली, रामनवमी, ईद इत्यादि त्यौहार आज उसी तरह मनाए जाते हैं जैसे वे पचास वर्ष पहले मनाए जाते थे। अंग्रेजी शिक्षा प्रचलित होते हुए भी 95% भारतीय अपने घरों में हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं। फिजी की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है, किंतु मूल निवासियों की भाषा तथा हिन्दी को भी मान्यता प्राप्त है। वैश्वीकरण और भारत के बढ़ते रूतबे के साथ पिछले कुछ सालों में हिन्दी के प्रति विश्व के लोगों की रूचि खासी बढ़ी है। देश का दूसरे देशों के साथ बढ़ता व्यापार भी इसका एक कारण है। हिन्दी के प्रति दुनिया की बढ़ती चाहत का एक नमूना यही है कि आज विश्व के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। विभिन्न देशों के 91 विश्वविद्यालयों में ‘हिन्दी चेयर’ है। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है।

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