हिन्दी का दुर्भाग्य : 15 वर्षों की प्रतीक्षा कैसे बन गई सदियों की प्रतीक्षा ? मोदी दिलाएँगे ‘राष्ट्रभाषा’ का सम्मान ?

* वर्तमान भारत में हिन्दी के सबसे बड़े प्रचारक हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

* हिन्दी ने ही मोदी को देश के सर्वोच्च प्रधानमंत्री पद तक पहुँचाया

* अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हिन्दी में ही बोलते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

* सब कुछ ‘साधने’ में सक्षम मोदी दक्षिण भारतीयों को बना सकेंगे हिन्दी का हिस्सा ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 14 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत आज हिन्दी दिवस मना रहा है। सामान्यत: किसी दिवस को मनाने का भावार्थ होता है उस दिवस के साथ जुड़ी विषय-वस्तु का उत्सव मनाना या उसे बढ़ावा देने के लिए प्रयास करना, परंतु एक भारतीय होने के नाते मुझे हर वर्ष 14 सितंबर का दिन असहज कर देता है। मैं भी इस हिन्दी दिवस को उत्साह से मनाता हूँ, परंतु यह मनाते हुए मेरे मन में हर्ष नहीं, अपितु शोक और पीड़ा के भाव होते हैं। व्यक्तिगत रूप से कहूँ, तो मैं इसे दुर्भाग्य मानता हूँ कि मुझे और मेरे देश को हिन्दी दिवस मनाना पड़ता है, क्योंकि जन-जन की भाषा होने के बावजूद राजनीति के दल-दल में कुछ ऐसे राजनीतिक दल और नेता आज भी विद्यमान हैं, जिनके वोट बैंक में हिन्दी का विरोध भी एक बहुत बड़ा ब्रह्मास्त्र है। यदि ऐसा न होता, तो हिन्दी को 54 वर्ष पहले यानी 26 जनवरी, 1965 को ही भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल जाता।

भारत आज 67वाँ हिन्दी दिवस मना रहा है। पहला हिन्दी दिवस 14 सितंबर, 1953 को मनाया गया था। भारत जब स्वतंत्र हुआ, तब महात्मा गांधी से लेकर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक की इच्छा थी कि हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाए। गांधी-नेहरू दोनों ने पूरे देश में इसके लिए अभियान तक छेड़ रखा था, परंतु दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया और अंग्रेजी को ही अपने राज्य की भाषा बनाने की ज़िद की। स्वतंत्रता के बाद गठित भारतीय संविधान सभा ने श्री गोपाल प्रसाद आयंगर और श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (क. मा. मुंशी) समझौते पर पहुँची, जिसके अंतर्गत 14 सितंबर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति मिली। संविधान में भारत की केवल दो अधिकृत भाषाओं का उल्लेख था, जिसमें किसी भी राष्ट्रीय भाषा का उल्लेख नहीं था। मुंशी-आयंगर समझौते के अनुसार अंग्रेजी का भारत की अधिकृत भाषा के रूप में 15 वर्षों तक प्रयोग किया जाना था। इन 15 वर्षों की गिनती 26 जनवरी, 1950 से की गई, जो 26 जनवरी, 1965 को समाप्त हो गई। इससे पहले राजभाषा प्रचार समिति-वर्धा के अनुरोध पर 14 सितंब, 1953 से हर वर्ष हिन्दी दिवस मनाने का निर्णय किया गया, ताकि दक्षिण भारतीय राज्यों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर वहाँ के लोगों को हिन्दी को स्वीकार करने पर सहमत किया जा सके।

कैसे 15 वर्षों की प्रतीक्षा बन गई सदियों की प्रतीक्षा ?

हिन्दी राष्ट्रभाषा का सम्मान पाने के लिए 26 जनवरी, 1950 से अब उस दिन की प्रतीक्षा करने लगी, जब 15 वर्ष बाद यानी 26 जनवरी, 1965 को उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलने वाला था। इन 15 वर्षों के दौरान कई अशासकीय हिन्दी समर्थकों ने हिन्दी को विस्तार देने का प्रयास किया। हिन्दी समर्थक राजनेता बालकृष्ण शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन ने तो शासकीय भाषा में अंग्रेजी को अधिकृत भाषा के रूप में अपनाए जाने का भारी विरोध किया और इस कदम को साम्राज्वाद का अवशेष बताया। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने के लिए धरना-प्रदर्शन भी किए, कई प्रस्ताव भी रखे, परंतु उनके सारे प्रयास विफल रहे, क्योंकि दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों के लोग अब भी हिन्दी से अनजान थे। इसी दौरान 15 वर्षों की अवधि समाप्त हुई और 26 जनवरी, 1965 का दिन आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की सरकार ने 26 जनवरी, 1965 के बाद पूरे देश में सभी शासकीय कार्यों में हिन्दी का प्रयोग आवश्यक बना दिया और तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी हिंसक आंदोलन भड़क उठे। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी इन आंदोलनों से घबरा गई और कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने निश्चय किया कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष बाद भी यदि हिन्दी को हर स्थान पर लागू किए जाने को लेकर सभी राज्य सहमत नहीं हैं, तो हिन्दी को एकमात्र अधिकृत भाषा नहीं बनाया जा सकता। यदि सीडब्ल्यूसी ने यह निश्चय न किया होता, तो कदाचित आज हिन्दी राष्ट्रभाषा होती, परंतु तमिलनाडु सहित अहिन्दी भाषी राज्यों में हिंसक राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों के बाद सीडब्ल्यूसी के निश्चय पर शास्त्री सरकार ने राजभाषा अधिनियम 1963 में 1967 में संशोधन किया, जिसके अंतर्गत भारत ने एक द्विभाषीय पद्धति को अपना लिया। ये दोनों भाषाएँ अंग्रेजी और हिन्दी थीं। 14 सितंबर, 1949 को तो यह निर्णय किया गया था कि 26 जनवरी, 1950 से 15 वर्षों के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिया जाएगा, परंतु 1967 में राजभाषा अधिनियम 1963 में किए गए संशोधन में ऐसी कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई कि हिन्दी को कब राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाएगा। आज इस बात को 52 वर्ष हो चुके हैं और दूर-दूर तक कोई ऐसा संकेत नहीं मिल रहा है कि हिन्दी को निकट भविष्य में राष्ट्रभाषा का सम्मान या दर्जा मिलने वाला है। इस तरह हिन्दी की राष्ट्रभाषा का सम्मान पाने की 15 वर्षों की प्रतीक्षा अब मानों सदियों में परिवर्तित हो चुकी है।

जब मोदी ने थामी हिन्दी की डोर और पहुँचे प्रधानमंत्री पद पर

अब बात करते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की। नरेन्द्र मोदी मूलत: गुजरात के हैं और इसीलिए उनकी मातृभाषा गुजराती है, परंतु वे हिन्दी का प्रयोग तब से करते हैं, जब से वे आपातकाल विरोधी आंदोलन का हिस्सा थे। इसके बाद जब भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) ने उन्हें गुजरात से बाहर कई राज्यों में सांगठनिक उत्तरदायित्व सौंपे, तब भी मोदी स्वाभाविक रूप से हिन्दी का ही प्रयोग करते थे, परंतु 7 अक्टूबर, 2001 को गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने गुजरात को अपनी कर्मभूमि बनाया और 11 वर्षों तक उनकी भाषा गुजराती बनी रही। विधानसभा चुनाव 2002, 2007 और 2012 के दौरान भी मोदी ने अपने अधिकांश चुनावी भाषण गुजराती में ही दिए, परंतु तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद जब देश में मोदी लोकप्रिय होने लगे और राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य माना जाने लगा, तो मोदी पुन: हिन्दी की ओर लौटे। मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 जीतने के बाद हिन्दी की डोर थाम ली। मोदी जानते थे कि देश का दिल जीतना है, तो हिन्दी ही काम आएगी। नि:संकोच एक राजनेता के रूप में नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने के लिए हिन्दी का उपयोग करना तनिक भी अस्वाभाविक नहीं था। मोदी ने लोकसभा चुनाव 2014 में पूरे देश में घूम कर हिन्दी में चुनावी भाषण दिए। यहाँ तक कि अहिन्दी भाषी भारतीय राज्यों में भी मोदी ने दुभाषियों की सहायता लेकर भाषण हिन्दी में ही दिए। हिन्दी ने ही मोदी को देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचाया।

नरेन्द्र मोदी हैं इस समय हिन्दी के सबसे बड़े प्रचारक

नरेन्द्र मोदी ने 26 मई, 2014 को पहली बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। इस शपथ की विशेषता यह थी कि लगभग 5 वर्षों के बाद किसी प्रधानमंत्री ने हिन्दी भाषा में ली थी। मोदी से पहले डॉ. मनमोहन सिंह, एच. डी. देवेगौड़ा और आई. के. गुजराल ने प्रधानमंत्री पद की शपथ अंग्रेजी में ली थी। मोदी से पहले अंतिम बार 199 में हिन्दी में शपथ ग्रहण की थी अटल बिहारी वाजपेयी ने। अटलजी ने 1996 और 1998 में भी हिन्दी में ही शपथ ली थी। और पीछे न जाते हुए, आगे की बात करें, तो नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बने आज 5 वर्ष, 3 महीने और 19 दिन हो गए। मोदी ने अपने इस प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार हिन्दी में शपथ लेने, दूसरी बार भी हिन्दी में शपथ लेने से लेकर हाल ही में रूस के व्लादिवोस्तोक में आयोजित रूसी सुदूर पूर्व राज्यों के पूर्वी आर्थिक मंच (EEF) में दिए भाषण तक हिन्दी का ही प्रयोग किया। यह पहला अवसर नहीं था कि मोदी ने किसी विदेशी मंच पर हिन्दी में भाषण दिया हो। मोदी ने अमेरिका-ब्रिटेन से लेकर जर्मनी, जापान, चीन, फ्रांस सहित लगभग सभी देशों में अपनी बात हिन्दी में ही रखी। विशेषकर उन देशों में मोदी ने हिन्दी को ही अपनी वाणी बनाया, जिन देशों पर अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा में ही बात करने का ज़ुनून है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिन्दी में भाषण देने का श्रेय यदि अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है, तो उनके बाद भारत सरकार के किसी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण दिया है, तो वे मोदी ही हैं। इतना ही नहीं, जब मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा में नहीं गए, तो विदेश मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज ने भी हर वर्ष और हर बार दुनिया के इस सबसे बड़े मंच पर हिन्दी में ही भाषण दिया।

‘मोदी है, तो मुमकिन है हिन्दी का राष्ट्रभाषा बनना ?’

नरेन्द्र मोदी अक्सर बड़े, साहसी और ऐतिहासिक निर्णय करने के बाद यह कहते सुने जाते हैं, ‘यह काम भी मेरे ही हाथों होना लिखा था।’ लोकसभा चुनाव 2019 में तो ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ का नारा बहुत गूंजा और दूसरी बार शपथ लेने के बाद मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटा कर यह सिद्ध भी कर दिया, ‘मोदी है, तो मुमकिन है’, क्योंकि इतना बड़ा साहसी निर्णय देश के पूर्ववर्ती 13 प्रधानमंत्रियों में से कोई नहीं कर सका था। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने का साहसी निर्णय भी मोदी के हाथों ही होगा ? क्या ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ का नारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिला पाएगा ? मोदी की विशेषता है कि वे सब कुछ साधने का सामर्थ्य रखते हैं। धारा 370 हटाने का अत्यंत ऐतिहासिक और कठोर व साहसिक निर्णय करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाद में जिस तरह कश्मीर के लोगों को साधने में लगभग सफलता पाई है, क्या उसी तरह वे दक्षिण और पूर्वी-पूर्वोत्तर भारत के अहिन्दी भाषी राज्यों, वहाँ के राजनीतिक दलों और लोगों को भी हिन्दी पर सहमत करने में सफल होंगे ?

वैसे एक बात भी निश्चित है कि हिन्दी की राष्ट्रभाषा का सम्मान पाने की 15 वर्षों की जो प्रतीक्षा अनेक वर्षों में बदल गई, उसे समाप्त करने का महान कार्य यदि कोई कर सकता है, तो वह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही कर सकते हैं, क्योंकि वे न केवल हिन्दी प्रेमी हैं, अपितु उनकी राष्ट्रवाद से लबरेज विचारधारा का सबसे बड़ा सेतु भी हिन्दी ही है। मोदी के कार्यकाल में स्वयं उन्होंने जिस तरह हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बार-बार सम्मानित किया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब हिन्दी की यह प्रतीक्षा समाप्त होगी और मोदी ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाएँगे, वह भी सर्वसम्मति से।

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