इस ख़बर ने लगा दी अंतिम मुहर : मंच का जमघट मैदान पर टुकड़े-टुकड़े : मोदी की राह हुई आसान ?

लोकसभा चुनाव 2019 में नरेन्द्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए समय-समय पर और विभिन्न मंचों पर एकजुटता का प्रदर्शन करने वाले मोदी विरोधी नेता। (फाइल चित्र)

दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के प्रबल दावेदार निवर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं, तो उनका विकल्प बनने की होड़ में इतने चेहरे हैं कि उनमें से कई चेहरों और उनके राजनीतिक दल का एक से अधिक राज्य में कोई नामलेवा भी नहीं है। इसके बावजूद पिछले दो-तीन वर्षों में एकमात्र मोदी विरोधी एजेंडा लेकर दिल्ली से लेकर बेंगलुरू-कोलकाता तक मंच पर लगा मोदी विरोधियों का जमघट और महागठबंधन के सुनहरे सपनों के टुकड़े-टुकड़े होने पर आज दिल्ली से ही आई एक अंतिम ख़बर ने अंतिम मुहर भी लगा दी।

दिल्ली से शुरू हुआ मोदी विरोध का ग़ुबार वैसे तो चुनाव आते-आते कई राज्यों में छँटता चला गया, परंतु दिल्ली में आज आम आदमी पार्टी (आआपा-AAP) और कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं हो सकने की ख़बर पर जो मुहर लगी, उसने मोदी विरोधी मंच के जमघट के मैदान पर टुकड़े-टुकड़े होने की बात पर अपनी आख़िरी मुहर भी लगा दी। जो नेता मोदी विरोधी मंच पर नज़र आए, आज उनमें से कई नेता और उनके राजनीतिक दलों ने राज्यों में अंतर्विरोधों के चलते जहाँ एक तरफ तथाकथित मोदी विरोधियों के सहारे सत्ता वापसी के कांग्रेस के सपने तथा उसके अध्यक्ष राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया, वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) के सत्ता में बने रहने की राह आसान कर दी।

कांग्रेस का साथ दिया, पर हाथ नहीं पकड़ा

मोदी विरोधी मंचों-बैठकों में कांग्रेस और अध्यक्ष राहुल गांधी का साथ सबने दिया, परंतु जब हाथ थामने की बात आई, तो किसी ने भी कांग्रेस का हाथ नहीं पकड़ा। यही कारण है कि दिल्ली की सत्ता के सपने देखने वाला मोदी विरोधी मोर्चा राज्यों में जाकर बिखर गया और कई राज्यों में विपक्ष के इस बिखराव ने मोदी के लिए आसान बना दिया।

विपक्षी बिखराव से हो सकता है भाजपा-एनडीए को फायदा ?

दिल्ली में मोदी विरोध के नाम पर एकजुटता दिखाने वाले ज्यादातर नेता क्षेत्रीय दलों के थे और यही कारण है कि कांग्रेस न तो इनका सफल नेतृत्व कर सकी और न ही राज्यों में इन क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को भाव दिया। मोदी विरोध को केवल सत्ता पाने का हथियार बनाने वाले कई मोदी विरोधी नेताओं के साथ राज्यों में कांग्रेस ही नहीं, अपितु मोदी विरोधी मंच पर दिखाई देने वाले कई क्षेत्रीय नेताओं के आपसी अंतर्विरोधों ने भी मोदी विरोध की दिखावे की मजबूत नींव को खोखला कर दिया। यदि सभी मोदी विरोधियों का एक ही एजेंडा था, तो इस चुनाव के मैदान पर हर जगह भाजपा-एनडीए के विरुद्ध एक ही विपक्षी प्रत्याशी होना चाहिए था, परंतु ऐसा हुआ नहीं है। कई राज्यों में मोदी विरोधियों के अंतर्विरोधों ने मुकाबले को त्रिकोणीय-चतुष्कोणीय बना दिया है, जिससे निश्चित रूप से मोदी विरोधी वोट बँटेंगे और कहा जा सकता है कि इसका सीधा फायदा भाजपा उम्मीदवार यानी मोदी को ही होगा।

उत्तर प्रदेश

सबसे पहले बात करते हैं उत्तर प्रदेश (UP) की, जहाँ सर्वाधिक 80 सीटें हैं। मोदी विरोधी मंच पर राहुल गांधी के साथ यूपी के तीन नेता नज़र आए और वे थे समाजवादी पार्टी (सपा-SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा-BSP) की अध्यक्ष मायावती और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद-RLD) के अध्यक्ष अजित सिंह, परंतु बात जब उत्तर प्रदेश में गठबंधन की आई, तो विधानसभा चुनाव 2017 में राहुल-कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले अखिलेश पर मायावती की माया ऐसी छाई कि वे राहुल-कांग्रेस दोनों को भूल गए या यूँ कहे कि मायावती ने उन्हें मजबूर कर दिया। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-आरएलडी ने राहुल-कांग्रेस को ठेंगा दिखाते गठबंधन कर लिया और राहुल देखते ही रह गए। यह मोदी विरोधियों की सबसे बड़ी दरार थी।

राहुल ने चौड़ी की दरार

इस दरार को और चौड़ी करने का काम राहुल गांधी ने कर दिया। राहुल ने बहन प्रियंका को यूपी की राजनीति में प्रवेश करा कर यह समझा कि वे प्रियंका के सहारे भाजपा को कड़ी टक्कर देंगे और सपा-बसपा को साथ आने को विवश कर देंगे, परंतु राहुल का यह दाँव भी विफल रहा। आज यूपी में भाजपा के विरुद्ध सीधा मुकाबला न होकर त्रिकोणीय मुकाबला हो गया है। एक तरफ भाजपा है, तो दूसरी तरफ सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन व कांग्रेस है। ऐसे में यदि प्रियंका का मतदाताओं पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा, तो मोदी विरोधी मत सपा-बसपा-आरएलडी और कांग्रेस के बीच बँटेंगे और फायदा भाजपा को ही होगा।

पश्चिम बंगाल

मोदी विरोध के नाम पर दिल्ली के बाद कोलकाता में बड़ा जमघट एकत्र करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) मुखिया ममता बैनर्जी भाजपा के बढ़ते प्रभाव से परेशान थीं और इसीलिए वे मोदी विरोधी हर मंच पर नज़र आईं, परंतु आश्चर्य और अंतर्विरोध की बात यह थी कि इस मंच पर वे वामपंथी नेता भी दिखाई दिए, जिनके विरुद्ध पश्चिम बंगाल में ममता को लड़ाई लड़नी थी। दिल्ली-बेंगलुरू-कोलकाता में ममता ने राहुल और राष्ट्रीय वामपंथी चेहरा सीताराम येचुरी के साथ मंच तो साझा किया, परंतु चुनाव के मैदान में ममता ने न तो कांग्रेस से गठबंधन किया और न ही वामपंथियों से। इस तरह ममता और टीएमसी पश्चिम बंगाल में चतुष्कोणीय मुकाबले में फँस गईं। पश्चिम बंगाल में हर सीट पर भाजपा के विरुद्ध केवल टीएमसी नहीं, बल्कि वामपंथी और कांग्रेस भी लड़ रहे हैं। ऐसे में मोदी विरोधी मत टीएमसी, कांग्रेस और वामपंथी दलों में बँटेंगे, जिसका सीधा फायदा भाजपा को हो सकता है और भाजपा ने जो 22 सीटों का लक्ष्य रखा है, उससे अधिक सीटें भी हासिल हो सकती हैं।

आंध्र-तेलंगाना

मोदी विरोधी टोली में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री व तेलुगु देशम् पार्टी (TDP) के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव (KCR) भी राहुल के साथ नज़र आए, परंतु आश्चर्य की बात यह है कि दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के साथ टीडीपी और टीआरएस ने गठबंधन नहीं किया है। दोनों ही राज्यों में हर सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय रहेगा। ऐसे में मोदी विरोधी वोट बँटेंगे। भले ही दोनों राज्यों में भाजपा का ज्यादा जनाधार न हो, परंतु संभव है कि विपक्षी फूट के चलते भाजपा इन राज्यों से भी कुछ सीटें निकाल ले जाए। यहाँ एक बात और ध्यान में रखने जैसी है कि टीडीपी-टीआरएस को कड़ी टक्कर देने के लिए जगन मोहन रेड्डी की वायएसआर कांग्रेस भी मैदान में है। रेड्डी कभी मोदी विरोधी मंच पर नज़र नहीं आए। ऐसे में भाजपा को एक आशा यह भी है कि यदि रेड्डी कुछ सीटें निकाल लाते हैं, तो भविष्य में जरूरत पड़ने पर उनका सहयोग मिल सकता है।

ओडिशा

जगन मोहन रेड्डी की ही तरह ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल (BJD) के अध्यक्ष नवीन पटनायक भी कभी मोदी विरोधी मंच पर नहीं दिखाई दिए। ओडिशा में उनका मुख्य भले ही कांग्रेस से माना जा रहा हो, परंतु भाजपा की इस बार ओडिशा में दमदार उपस्थिति है। ऐसे में ओडिशा में भी हर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला है। ऐसे में मोदी विरोधी और नवीन विरोधी वोट बँटने का फायदा सीधा भाजपा को होने की संभावना है। भाजपा ने भी ओडिशा से काफी उम्मीदें लगा रखी हैं।

केरल

वामपंथियों के गढ़ केरल में अक्सर मुकाबला कांग्रेस और वामपंथियों के बीच रहता आया है, परंतु मोदी विरोधी मंच पर वामपंथियों की अगुवाई करने वाले सीताराम येचुरी राहुल के साथ हर मंच पर दिखाई दिए, परंतु केरल में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस-वामपंथी एकजुट नहीं हो सके। स्थिति इस हद तक विरोधाभासी है कि स्वयं राहुल गांधी जिस वायनाड सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, वहाँ भी वामपंथियों ने अपना उम्मीदवार उतारने से गुरेज़ नहीं किया। परिणामस्वरूप यहाँ भी मुकाबला त्रिकोणीय है और इससे होने वाले फायदे को देखते हुए भाजपा ने केरल के गढ़ में इस बार मजबूत सेंध लगाने की कोशिश की है।

दिल्ली

अब बात कर लेते हैं दिल्ली की। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में 70 में से 67 सीटें जीतने वाले मुख्यमंत्री और AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल भी मोदी के धुर विरोधी रहे हैं और हर मोदी विरोधी मंच पर राहुल का हाथ थामे नजर आए, परंतु राहुल ने केजरीवाल का हाथ थामने से इनकार कर दिया। केजरीवाल 2015 की जीत को आधार बना कर गठबंधन करना चाहते थे, जो कांग्रेस को मंजूर नहीं था और दिल्ली में यह गठबंधन नहीं हो सका। अब दिल्ली में भी हर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होगा। मोदी विरोधी वोट कांग्रेस और AAP में बँटेंगे। ऐसे में संभव है कि भाजपा 2014 की तरह दिल्ली की सभी 7 सीटों पर कब्जा कर ले।

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