मोदी की तासीर बताने से पहले ‘56 इंच की सच्चाई’ से तो सामना कर लेते आतिश !

दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मैगज़ीन TIME भी बहक गई व्यक्तिगत द्वेष में और साख पर लगवा लिया बट्टा

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 14 मई, 2019। विश्वविख्यात अमेरिकी सामयिक TIME प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपरिचित नहीं है और न ही मोदी इस मैगज़ीन से अपरिचित हैं। बस, फर्क इतना है कि तीन बार नरेन्द्र मोदी का गुणगान कर चुकी टाइम मैगज़ीन चौथी बार एक नादान पत्रकार की ग़ैरजिम्मेदाराना हरक़त की शिकार हो गई। अपने 96 वर्षों के इतिहास में इस मैगज़ीन में करोड़ों लेखकों ने अपने विचार रखे होंगे, परंतु इसके LATEST EDITION में सिर्फ 38 वर्ष की आयु के कम तज़ुर्बेकार पत्रकार आतिश तासीर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में जो अपने अधकचरे और पक्षपातपूर्ण विचार व्यक्त किए, उसने टाइम मैगज़ीन की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा और वर्तमान प्रबंधन पर आश्चर्यजनक और बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। समझ में ये नहीं आता कि दुनिया की सबसे मशहूर पत्रिका किसी नादान और संकीर्ण सोच से प्रभावित पत्रकार की ओर से अधूरी जानकारी तथा व्यक्तिगत द्वेष के साथ लिखे गए लेख को प्रकाशित करने की अनुमति कैसे दे सकती है ? क्या टाइम प्रबंधन को इस बात का भी अनुमान नहीं था कि एक व्यक्ति विशेष के एक व्यक्ति विशेष के विरुद्ध व्यक्त किए गए विचारों को टाइम मैगज़ीन की ओर से कही गई बात माना जाएगा ? वास्तव में एक अर्धज्ञानी के व्यक्तिगत अहंकार को पुष्ट कर टाइम ने स्वयं ही अपनी साख पर बट्टा लगाने का काम किया है, जो उसे आने वाले भविष्य में ही समझ में आएगा।

ख़ैर, अब तो यह लेख प्रकाशित हो चुका है और आतिश तासीर ने टाइम मैगज़ीन के हवाले से उसी नरेन्द्र मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ घोषित कर दिया है, जिस टाइम मैगज़ीन ने 2014, 2015 और 2017 में नरेन्द्र मोदी को विश्व के 100 सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था। वैसे आतिश तासीर का यह लेख केवल उनकी व्यक्तिगत सोच ही नहीं, अपितु टाइम मैगज़ीन की मानसिकता का भी पर्दाफाश करता है, क्योंकि आतिश ने अपने लेख को लिखते समय मोदी की तासीर समझने में वही मूर्खता और नादानी की, जो वर्तमान भारतीय राजनीति में मोदी विरोधी राजनीति करने वाले नेता कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके विरोधी उन्हें उस मापपट्टी से मापते हैं, जिसके दायरे में वे (नरेन्द्र मोदी) आते ही नहीं हैं। वास्तव में मोदी की तासीर समझने के लिए 56 इंच की सच्चाई का सामना करने का साहस चाहिए, जो कदाचित व्यक्तिगत द्वेष से झुलस रहे आतिश तासीर में नहीं था। यदि आतिश ने लेख लिखने से पहले मोदी की तासीर और मोदी सरकार के कामकाज तथा बोलते आँकड़ों पर नज़र डालने का प्रयास किया होता, तो वे इस तरह मोदी को डिवाइडर इन चीफ यानी विभाजनकारियों के मुखिया कहने से पहले सौ बार सोचते।

‘सबका साथ-सबका विकास’ सबसे बड़ा तमाचा

अक्सर मोदी कहते हैं और ऐसा होता भी है कि विरोधी उनके बारे में बोलने से पहले पूरा अध्ययन नहीं करते। आतिश तासीर ने भी वही ग़लती की। आतिश ने यदि मोदी की तासीर समझने के लिए 7 अक्टूबर, 2001 से टाइम मैगज़ीन में ताज़ा लेख के प्रकाशन की तारीख 9/10 मई, 2019 तक यानी 17 वर्ष और 7 महीनों के मोदी के कामकाज, शैली और भारतीय-वैश्विक सफलताओं, परिणामों के आँकड़ों का अध्ययन किया होता, तो तासीर यह ग़लती करने से बच जाते। मोदी से व्यक्तिगत विरोध स्वाभाविक हो सकता है, परंतु गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री पद तक किए गए उनके कामकाज से द्वैष कैसे रखा जा सकता है ? आतिश ने यदि मोदी को विघटनकारी व्यक्ति ठहराया है, तो मोदी का ‘सबका साथ-सबका विकास’ आतिश के मुँह पर सबसे बड़ा तमाचा है। आतिश को यह लेख लिखने से पहले मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए गठित सच्चर समिति के समक्ष दिए गए बयान को भी पढ़ना चाहिए था, जिसमें मोदी ने कहा था, ‘मैंने न मुस्लिमों के लिए कुछ किया है और न ही हिन्दुओं के लिए। मैं जब कोई योजना या कोई लाभ आम जनता तक पहुँचाता हूँ, तो वह सबके लिए होती है। अगर किसी गाँव-शहर में सड़क-बिजली-पानी जैसी कोई सरकारी सुविधा पहुँचती है, तो वह सुविधा धर्म-जाति देख कर लोगों को फ़ायदा नहीं पहुँचाती। वह सुविधा सबको पहुँचती है।’ आतिश के डिवाइडर इन चीफ का इससे बड़ा और कोई जवाब नहीं हो सकता। क्या आतिश तासीर भारत के करोड़ों लोगों को यह बात समझा सकते हैं कि यदि मोदी डिवाइन इन चीफ हैं, तो फिर जन-धन, मुद्रा, किसान सम्मान निधि से लेकर आयुष्मान भारत योजनाय़ओं के जरिए जो करोड़ों भारतीय लाभान्वित हो रहे हैं, वे क्या सिर्फ हिन्दू हैं ? क्या इन योजनाओं का लाभ धर्म या जाति देख कर दिया जा रहा है ?

मोदी का काम आतिश के मुँह पर दूसरा बड़ा तमाचा

आतिश तासीर ने अपने लेख की शुरुआत ही ग़लत तरीके से की। उन्होंने न केवल मोदी को डिवाइडर इन चीफ ठहराया, बल्कि उनकी सरकार को नाकाम बताया। यदि मोदी डिवाइडर इन चीफ होते, तो देश में अव्यवस्था नहीं होती ? यदि देश में अव्यवस्था होती, तो क्या 60 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेस (FDI) भारत में आता। क्या आतिश उन लाखों विदेशी निवेशकों से अधिक बुद्धिशाली हैं ? आतिश ने कदाचित यह भी अध्ययन नहीं किया होगा कि 2015 में एफडीआई 45 अरब रुपए था, जो मोदी के शासन काल में डेढ़ गुना बढ़ा। एक डिवाइडर इन चीफ के शासन में कोई विदेशी कैसे अपना धन लगा सकता है ? आतिश के लेख के अनुसार भारत में सिर्फ असहिष्णुता और अराजकता है, परंतु इसे दुनिया में बसे करोड़ों भारतीय (NRI) भी सिरे से ख़ारिज करते हैं, जिन्होंने वर्ष 2018 में 80 अरब रुपए भारत भेजे, जो 2017 में भेजे गय़ए 69 अरब रुपए से अधिक है। एनआरआई भी मोदी के शासन वाले भारत में जम कर निवेश कर रहे हैं। क्या आतिश इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि उन्हें दुनिया के सात महत्वपूर्ण देशों ने अपने सर्वोच्चन नागरिक पुरस्कारों से सम्मानित किया है। दुनिया में भारत को शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित करने में मोदी की कूटनीतिक सफलता का तो उनके राजनीतिक विरोधी भी विरोध करने से पहले दस बार सोचते हैं। हर मोर्चे पर मोदी की मुस्तैदी और 18 घण्टों तक निरंतर काम करने जैसी मोदी की अच्छाई कदाचित आतिश तासीर के मस्तिष्क की सोच से बहुत ऊँची है। जिसका न कोई परिवार है, न कोई वंश, उस नरेन्द्र मोदी को गाली देने वालों की कोई कमी नहीं है, परंतु आतिश ने जो किया, वह एक बार में यही लगता है कि यह मोदी के विरुद्ध किसी अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र से कम नहीं है। मोदी को गालियों से वैसे भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वे अब तक 90 से अधिक गालियाँ खा चुके हैं। इसमें आतिश की गाली कहाँ विलुप्त हो जाएगी, स्वयं आतिश को भी नहीं पता चलेगा।

दंगों और नरसंहार का फर्क भी नहीं समझते आतिश ?

आतिश तासीर ने अपने लेख में 1984 के सिख विरोधी हिंसा और 2002 के गुजरात दंगों का उल्लेख किया है, परंतु यहाँ आतिश की समझदारी पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। क्या आतिश दंगों और नरसंहार में फर्क़ भी नहीं समझते ? 1984 में जो हुआ, उसे तो भारत की अदालत तक सुनियोजित नरसंहार करार दे चुकी है और यही वास्तविकता भी है कि सिख विरोधी हिंसा केवल कांग्रेस के नेताओं की ओर से संचालित सामूहिक नरसंहार था, जबकि 2002 का गुजरात दंगा वास्तव में उस क्रिया की प्रतिक्रिया थी, जो सामान्यतः आम जनता के बीच होती ही है। भारत में जब किसी एक धर्म के व्यक्ति के साथ छोटी-सी अनुचित घटना दंगे का स्वरूप ले लेती है, तो 27 फरवरी, 2002 को तो अयोध्या से लौट रहे 59 हिन्दू कारसेवकों को जला डालने की प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। यहाँ हम इस प्रतिक्रिया को उचित ठहराने का प्रयास नहीं कर रहे, परंतु 2002 में गुजरात में जो हुआ वह साम्प्रदायिक दंगा था, जबकि 1984 में जो हुआ वह सुनियोजित नरसंहार था। यह बात समझने के लिए सीने में सच्चा भारतीय हृदय चाहिए, जो कदाचित आतिश के सीने में नहीं है।

तुष्टीकरण में व्यस्त नेताओं की भीड़ में ‘अकेले’ खड़े मोदी को भी न पहचान सके आतिश ?

भारत की राजनीति में कांग्रेस की ओर से बोया गया तुष्टीकरण का बीज आज वटवृक्ष बन चुका है। देश के अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम समुदाय को महज़ एक वोट बैंक मानने वाले राजनीतिक दलों की कतार में पूर्व में कई राजनीतिक दल जुड़े, तो वर्तमान राजनीति में कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस (TMC)-ममता बैनर्जी, समाजवादी पार्टी (सपा-SP)-अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा-BSP)-मायावती, तेलुगू देशम् पार्टी (TDP)-चंद्रबाबू नायडू, तेलंगना राष्ट्र समिति (TRS)-के. चंद्रशेखर राव सहित कई राजनीतिक दल और उनके नेता भी मुस्लिम वोट पाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं। क्या आतिश तासीर को तुष्टीकरण में व्यस्त नेताओं के बीच अकेले खड़े वह नरेन्द्र मोदी समझ में नहीं आए, जो मुस्लिम समाज की कुरीति ट्रिपल तलाक को ख़त्म करने की कोशिश करते रहे ? यदि हिन्दू समाज ने समय-समय पर अपनी कई सामाजिक बुराइयों-कुरीतियों को त्याग दिया, तो किसी भी राजनीतिक दल ने मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों-बुराइयों को उखाड़ फेंकने की चिंता क्यों नहीं की ? क्यों ये सभी राजनीतिक दल केवल मुस्लिमों का वोट पाने तक ही सीमित रहे ? दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी जिस भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) से ताल्लुक रखते हैं, उस पार्टी को देश का 1 प्रतिशत मुस्लिम वोट भी नहीं मिलता। इसके बावजूद मोदी देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की आधी आबादी को न्याय दिलाना चाहते हैं, तो यह बात आतिश तासीर की समझ में क्यों नहीं आती ?

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