महाराष्ट्र की महाभारत : एक राजहठ के लिए शिव, सेना और सिंह तीनों को दाँव पर लगा दिया उद्धव ने…

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 13 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में अंतत: राष्ट्रपति शासन लग गया। करोड़ों रुपए का चुनावी खर्च करने के बाद भी 9 करोड़ जनता को नई सरकार नहीं मिली और यह सब हुआ केवल एक पार्टी शिवसेना (SS) के राजहठ के कारण। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने वाली शिवसेना ने भाजपा की शक्ति में थोड़ी कमी क्या आई, अपनी भौंहें तान लीं और 50-50 फॉर्मूला पर अड़ गई, जिसके चलते गठबंधन टूट गया। भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ना और जोड़ना शिवसेना का पुराना इतिहास रहा है, परंतु उद्धव ठाकरे ने गठबंधन टूटने के बाद भी अपना राजहठ पूरा करने के लिए जो मार्ग अपनाया, उसने शिव, सेना और सिंह तीनों की प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा दिया है।

देश के सभी प्रकार के न्यूज़ मीडिया और यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की महत्वाकांक्षा की घोर आलोचना हो रही है। यद्यपि इन सबके बीच कुछ नेता और लोग ऐसे भी सामने आ रहे हैं, जो शिवसेना के आलोचकों की यह कह कर आलोचना कर रहे हैं कि परस्पर विरोधी विचारधारा वाले दलों के बीच सत्ता के लिए गठबंधन महाराष्ट्र से पहले और भी कई राज्यों में हुए हैं, फिर शिवसेना को क्यों दोषी ठहराया जा रहा है ? ऐसे आलोचकों से सीधा प्रश्न यह है कि क्या किसी बुरी परम्परा को जारी रखना ही किसी राजनीतिक दल का राजनीतिक संस्कार हो सकता है ? वह भी शिवसेना जैसी कट्टर हिन्दुत्व विचारधारा वाली पार्टी के लिए ? उद्धव कम से कम एक बार शिवसेना शब्द और उसके प्रतीक चिह्न सिंह (शेर) का अर्थ ही समझ लेते, तो आज वे महाराष्ट्र की राजनीति में फुटबॉल बनने से बच जाते। वास्तव में उद्धव ने राजनीति में राज को चरम पर ला दिया और नीति की नींव पर करारी चोट की है। शिवसेना की आधारशिला ही महाराष्ट्र की अस्मिता, मराठी मानुस और उससे एक कदम आगे राष्ट्रीय स्तर पर कट्टर हिन्दुत्व की विचारधारा के स्तंभों पर रखी गई थी। बाळा साहेब ठाकरे ने भले ही समय-समय पर राजनीतिक विवशताओं के कारण कांग्रेस का समर्थन किया होगा, परंतु उन्होंने अपनी और पार्टी की विचारधारा के साथ कभी समझौता नहीं किया। दूसरी ओर उनके पुत्र उद्धव ठाकरे ने एक राजहठ के लिए शिवसेना की आधारशिला तक को बिकाऊ बना दिया है। उद्धव के इस कदम से न शिव को हर्ष होगा, न सेना को और यह कदम एक सिंह को तो कभी नहीं सुहाएगा कि वह बकरी की तरह जिए।

शिवसेना अपने अस्तित्व के मूलाधार को पहचाने

शिवसेना और उद्धव ठाकरे की ओर से कांग्रेस-एनसीपी का समर्थन लेकर भी राजहठ को संतुष्ट करने के किए जा रहे प्रयासों से नि:संकोच उन हजारों शिवसैनिकों को निराशा हो रही होगी। वास्तव में शिवसेना राजनीति में पुरानी घिसी-पिटी परंपरा को आगे बढ़ा रही है, जहाँ सत्ता के लिए ‘कुछ भी करेगा’ का सिद्धांत ही सर्वोपरि होता है, मूल सिद्धांत किनारे कर दिए जाते हैं। मीडिया में चल रही चर्चाओं में कई विश्लेषक और राजनीतिक दलों के नेता यह कहते सुने जा रहे हैं कि यदि भाजपा अपने जम्मू-कश्मीर में पीपल्स डैमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी-PDP) के साथ सरकार बना सकती हैं, भाजपा के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) का समर्थन ले सकते हैं, भाजपा को तृणमूल कांग्रेस (TMC) और ममता बनर्जी समर्थन दे सकती हैं, तो शिवसेना का एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाना किस तरह अनुचित हो सकता है ? परंतु प्रश्न यह उठता है कि भाजपा ने या उससे पूर्व कांग्रेस ने भी अनैतिक गठजोड़ किए थे, उन्हें आगे बढ़ाने से शिवसेना महाराष्ट्र की जनता के बीच किस नैतिकता के साथ जाएगी ? शिवसेना सदैव महाराष्ट्र की अस्मिता और मराठी मानुस की राजनीति करती रही है। यहाँ तक कि शिवसेना को कांग्रेस की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता में घोर मुस्लिम तुष्टीकरण नीति फूटी आँख नहीं सुहाती और शिवसेना स्वयं को हिन्दू समर्थक तथा मुस्लिम विरोधी बताने से भी नहीं हिचकिचाती। ऐसे में शिवसेना का कांग्रेस से समर्थन लेने का क्या नैतिक आधार हो सकता है ? बात यदि कांग्रेस की ही जड़ से फूटी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) की करें, तो यह भी शिवसेना के लिए अछूत रही है। एनसीपी का इतिहास क्या है ? एनसीपी का उदय क्यों हुआ ? शरद पवार की महत्वाकांक्षा ही तो एनसीपी के जन्म का कारण है न। ये वही शरद पवार हैं, जो सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा कर कांग्रेस से अलग हुए थे और शिवसेना भी इस बात से सहमत है कि देश का प्रधानमंत्री कोई विदेशी मूल का नहीं हो सकता। 2004 में जब सोनिया गांधी के लिए प्रधानमंत्री बनने का मार्ग खुला हुआ था, तब विरोध करने वालों में भाजपा अकेली नहीं थी, शिवसेना ने भी पुरज़ोर विरोध किया था और शरद पवार ने तो विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से नाता ही तोड़ लिया था। फिर शिवसेना इतने सारे राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद किस तरह एनसीपी-कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने की सोच भी सकती है ?

9 करोड़ लोगों के साथ किसने किया विश्वासघात ?

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि महाराष्ट्र के जिन 9 करोड़ लोगों ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन के पक्ष में स्पष्ट जनादेश दिया, उन 9 करोड़ लोगों के साथ विश्वासघात का दोषी कौन है ? क्या भाजपा को दोषी ठहराया जा सकता है ? उत्तर आपको इस बात से समझ लेना चाहिए कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के पूरे चुनाव प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने खुलेआम कहा कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिला, तो देवेन्द्र फडणवीस ही पाँच वर्ष के लिए मुख्यमंत्री होंगे। जनता को यह बात समझ में आई और उसने गठबंधन को बहुमत भी दिया, परंतु शिवसेना या उद्धव ठाकरे ने प्रचार अभियान के दौरान यह क्यों नहीं कहा कि ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री पद की बात हुई है ? यदि वास्तव में ठाकरे की अमित शाह से ऐसी कोई बात हुई थी, तो उन्हें मोदी-शाह के वक्तव्य पर तभी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी, जब वे जनता के बीच खुलेआम फडणवीस को 5 साल के लिए मुख्यमंत्री घोषित कर रहे थे। शिवसेना को यह बात चुनाव परिणामों के बाद ही क्यों याद आई ? वास्तव में शिवसेना ठाकरे-शाह के बीच हुई मुलाक़ात में कथित रूप से निर्धारित हुए 50-50 फॉर्मूला की बात कर रही है, तो इसकी शुरुआत तो सीटों के बँटवारे के साथ ही हो जानी चाहिए थी। जब सीटों का बँटवारा ही 50-50 फॉर्मूला के आधार पर नहीं हुआ, तो सत्ता के बँटवारे को लेकर 50-50 फॉर्मूला निर्धारित हुआ होगा, ऐसा कैसे मान लिया जाए ? सच्चाई यह है कि शिवसेना ने चुनाव परिणामों में भाजपा की शक्ति घटने को अपने अवसरवाद के पनपने का अवसर बना लिया और यही कारण है कि वह 9 करोड़ लोगों द्वारा दिए गए स्पष्ट बहुमत के साथ विश्वासघात करने पर उतारू है।

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