हर बेटी की मृत्यु और उसकी दर्द भरी दास्ताँ कर रही व्यवस्था परिवर्तन की चीत्कार…

टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 7 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘मैं तो बच जाऊँगी न ? मैं मरना नहीं चाहती। मैं जीना चाहती हूँ। दोषियों को सख़्त से सख़्त सजा दी जानी चाहिए।’ 40 घण्टों तक जीवन के लिए संघर्ष करने के बाद और दम तोड़ने से पहले उन्नाव की बेटी ने अपने भाई से यही अंतिम शब्द कहे थे। चंद लोगों की वासना की शिकार बनी इस बेटी ने अंतत: दम तोड़ दिया। यह कोई पहली बेटी नहीं है, जिसने अपने साथ दुष्कर्म और दरिंदगी के बाद कष्ट-पीड़ा के साथ दम तोड़ा। चंद दिनों पहले हैदराबाद की बेटी को दरिंदों ने अंतिम शब्द कहने तक का अवसर नहीं दिया था। उससे पहले भी देश में निर्भया सहित अनेक बेटियों को पहले हवस का शिकार बनाया गया और फिर अपने पाप के साक्ष्यों को नष्ट करने के लिए उन्हें मौत के घाट उतार दिया। हैदराबाद की बेटी के साथ दरिंदगी करने के आरोपियों को पुलिस ने शुक्रवार तड़के मौत की नींद सुला दिया, परंतु आरोपियों की मौत के बाद उनके निर्दोष परिजनों की व्यथा भी नज़रअंदाज़ करने लायक नहीं है, क्योंकि परिजन भी अपने दरिंदे बेटों को सजा दिलवाने के पक्ष में थे, परंतु उन्होंने यह नहीं सोचा था कि वे अब उन्हें कभी जीवित नहीं देख पाएँगे।

निर्भया से लेकर हैदराबाद और उन्नाव की बेटी तथा उनके साथ दरिंदगी करने वाले आरोपियों-अपराधियों के परिजन सभी इस तरह की घटनाओं से दु:खी और व्यथित हैं। दर्द का कोई पैमाना नहीं होता। हर मृत्यु के पीछे दर्द की कराहती दास्ताँ होती है, फिर चाहे वह मौत सज्जन की हो या दुर्जन की। देश में पिछले 10 दिनों के चर्चित घटनाक्रम पर यदि दृष्टि डालें, तो स्पष्ट है कि इन 10 दिनों में कुल 6 लोगों की मृत्यु हुई। हैदराबाद की बेटी, फिर उसके साथ दरिंदगी करने वाले 4 आरोपियों और अब उन्नाव की बेटी ने दम तोड़ दिया, परंतु हर मृत्यु अपने पीछे एक दर्द भरी दास्ताँ छोड़े जा रही है, जो देश के नीति-निर्माता-निर्धारकों का ‘व्यवस्था में परिवर्तन’ लाने का आह्वान कर रही है। यह आह्वान कोई नया नहीं है। जब 2012 में दिल्ली की निर्भया ने असह्य कष्ट और पीड़ाओं के साथ दम तोड़ा था, तब उसकी टूटती साँसों ने भी देश की सरकार, न्यायपालिका, संसद और सरकारों के समक्ष परिवर्तन का यही चीत्कार किया था और आज हैदराबाद की बेटी से लेकर उन्नाव की बेटी तक हुई 6 मौतें भी महान राष्ट्र भारत का आह्वान कर रही हैं, ‘अब व्यवस्था परिवर्तन ही इस देश का उद्धार कर सकता है।’

हमारे देश में विधि-व्यवस्था का ढाँचा विकेन्द्रित है। संघीय भावना के अनुरूप विधि व्यवस्था यानी क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्यों के अधीन है। ऐसे में किसी भी राज्य में अपराध की घटनाएँ होना, संबंधित राज्य की क़ानून-व्यवस्था की स्थिति का मापदंड निर्धारित करता है। क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व संबंधित राज्य सरकार के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री के अधीन पुलिस बल पर होता है और इसीलिए किसी भी आपराधिक घटना के बाद संबंधित राज्य में सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दलों के बीच राजनीति शुरू हो जाती है। विपक्ष ताक में ही बैठा होता है। दिल्ली से लेकर कठुआ तक और हैदराबाद से लेकर उन्नाव तक यही खेल खेला गया और जा रहा है। 2012 में जब निर्भया कांड हुआ, तब तत्कालीन विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना ही नहीं, वयोवृद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हज़ारे के नेतृत्व में तत्कालीन सामाजिक कार्यकर्ता और आज दिल्ली के मुख्यमंत्री बन चुके अरविंद केजरीवाल सहित अनेक लोगों ने दिल्ली में निर्भया कांड के विरुद्ध बड़ा आंदोलन छेड़ा, परंतु परिणाम क्या मिला ? कुछ नहीं। लंबी न्याय प्रक्रिया के कारण निर्भया के दोषी अब तक जीवित हैं और दंड में देरी के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं, जिसका परिमाम यह है कि निर्भया से पहले और निर्भया के बाद भी बलात्कार की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रहीं।

आज राजनीतिक हालात बदल गए हैं। 2012 में जो भाजपा निर्भया कांड व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर यूपीए सरकार को घेर रही थी, वह सत्ता में है। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। राजनीतिक और शासकीय परिवर्तन हो गया, परंतु सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में क्या हुआ ? कुछ नहीं, क्योंकि आज भी बेटियाँ दुष्कर्म का शिकार बनाई जा रही हैं, मारी जा रही हैं, जलाई जा रही हैं और दम तोड़ रही हैं। हर दम तोड़ती बेटी चीख-चीख कर अपने देश, अपने समाज और अपनी सरकार से प्रश्न पूछ रही है कि क्या इस देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जो बेटियों को सुरक्षित भविष्य दे सके ? क्या इस देश में संस्कारों का सिंचन करने वालों का अकाल पड़ गया है, जो एक इंसान को हैवान बनाने से रोक सके ? आख़िर बेटियों के साथ हो रही इस दरिंदगी के लिए कौन उत्तरदायी है ? ऐसा नहीं है कि यह चीत्कार केवल दुष्कर्म और हत्या का शिकार हुई बेटियों की है, बल्कि उन माता-पिताओं की भी है, जिन्होंने इस तरह की दरिंदगी करने वाली संतानों को जन्म दिया ? हर माता-पिता अपनी संतानों को अच्छे संस्कार ही देते हैं, परंतु जब संतान बाह्य जगत में कुसंगति में पड़ जाती है, तो ऐसे माता-पिताओं का हृदय भी यही चीत्कार करता है कि सरकार और समाज देश में ऐसा वातावरण क्यों नहीं बनाते कि युवा पीढ़ी गुमराह होने से बच सके ? हैदराबाद की बेटी ने जिस तरह दम तोड़ा, उसके आरोपियों की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु और उसके बाद उन्नाव की बेटी का साँसों को थामे न रख पाना, हर मृत्यु के पीछे की दर्द भरी दास्ताँ इस देश, सरकार और समाज को यही संदेश और आह्वान कर रही है कि व्यवस्था में परिवर्तन लाया जाए।

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