यदि पश्चिमोत्तर ने पछाड़ा, तो भाजपा का यह ‘MASTER PLAN’ कराएगा मोदी की वापसी : जानिए पूरा गणित

लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा की विजय और नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पश्चिमोत्तर राज्यों में क्या लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी लहर बेअसर हो चली है ? यद्यपि भाजपा ने इन पश्चिमोत्तर राज्यों में 2014 वाली जीत का डंका बजाने के प्रयासों कोई कसर नहीं छोड़ी है, परंतु भाजपा पिछले दो वर्षों से पश्चिमोत्तर में नुकसान की आशंका को भाँपते हुए एक ऐसे मास्टर प्लान के साथ काम कर रही है, जिसके अंतर्गत वह इस संभावित 25-50 सीटों के नुकसान की भरपाई ऐसे राज्यों से करेगी, जहाँ उसका इतिहास में कोई नामलेवा नहीं था।

क्यों बनाना पड़ा मास्टर प्लान ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल चित्र)।

भाजपा का मास्टर प्लान क्या है, यह आपको बाद में बताते हैं। पहले ये बताते हैं कि भाजपा को इस मास्टर प्लान को क्यों बनाना पड़ा ? नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी और राफेल डील जैसे मुद्दों पर जब कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी अत्यंत मुखर हो गए, तब भाजपा को लगा कि 2019 में 2014 वाली जीत दोहराने के लिए कुछ और भी करना पड़ेगा। जब उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में उप चुनावों में भाजपा को हार मिली और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गढ़-गृह गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में भाजपा को अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तब भाजपा को ऐसे किसी मास्टर प्लान को बनाने की आवश्यकता की अनुभूति हुई। जब कर्नाटक में हाथ आई सत्ता सरक गई और जब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के गढ़ों में कांग्रेस ने सेंध लगा दी, तब भाजपा ने इस मास्टर प्लान पर एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाते हुए काम करना शुरू किया। इन सभी घटनाओं ने भाजपा के मन में यह आशंका पैदा कर दी कि 2014 में जिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने झोली भर-भरके भाजपा को वोट दिए थे, कहीं न कहीं यह जनाधार खिसक रहा है। भाजपा को एहसास हो गया कि इन राज्यों में 2019 में उसे 25 से 50 सीटों का नुकसान हो सकता है। इसीलिए उसने यह मास्टर प्लान बनाया।

क्या है मास्टर प्लान ?

दक्षिण-पूर्वोत्तर में चलेगी मोदी लहर ?

भाजपा का मास्टर प्लान 2014 में जिताने वाले पश्चिमोत्तर राज्यों में संभावित नुकसान की आशंका के बीच 2019 में भी विजय यात्रा जारी रखने का खाक़ा है। इस मास्टर प्लान के रणनीतिकार नरेन्द्र मोदी और चाणक्य अमित शाह हैं। मास्टर प्लान के तहत भाजपा ने दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों का रुख किया और वहाँ पार्टी की जीत की संभावनाएँ टटोलना शुरू किया। इन राज्यों में महत्वपूर्ण हैं पश्चिम बंगाल (42), ओडिशा (21), केरल (20) और कर्नाटक (28)। इसके उपरांत पूर्वोत्तर के 8 राज्य असम, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नगालैण्ड, सिक्किम एवं त्रिपुरा शामिल हैं, जहाँ कुल 25 सीटें हैं। इस तरह भाजपा ने पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्व भारत के तीन महत्वपूर्ण राज्यों पश्चिम बंगाल, ओडिशा, केरल एवं कर्नाटक की कुल 136 सीटों टार्गेट बनाया। भाजपा के इस मास्टर प्लान का उद्देश्य यही है कि 136 सीटों में से अधिकतम् सीटें जीत कर पश्चिमोत्तर में होने वाली हानि की भरपाई की जाए।

पश्चिम बंगाल : दीदी से होगा द्रोह ?

अमित शाह, ममता बैनर्जी और नरेन्द्र मोदी (फाइल चित्र)।

पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं और यहाँ 2 चरणों में भारी मतदान हुआ है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पिछले दो वर्षों से पश्चिम बंगाल के अनेक दौरे कर चुके हैं। परिणाम यह हुआ है कि आज बंगाल की बाघिन कही जाने वाली ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विरुद्ध मुख्य विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस या वापमंथी नहीं, अपितु भाजपा है। 2014 में पहली बार लोकसभा की 2 सीटें जीतने वाली भाजपा का आज पश्चिम बंगाल में व्यापक विस्तार हुआ है। शाह के तूफानी दौरों, रणनीति और मोदी की सभाओं में उमड़ती भीड़ तथा मतदान में लोगों का भारी उत्साह, ये सारी बातें बहुत कुछ संदेश दे रही हैं। कई राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानने पर विवश हैं कि पश्चिम बंगाल के परिणाम इस बार चौंकाने वाले हो सकते हैं। इस विश्लेषण का अर्थ तो यही निकलता है कि भाजपा ने जो 22 सीटों का लक्ष्य निर्धारित किया, उसमें उसे सफलता मिल सकती है।

ओडिशा : ‘नवीन’ करेंगे मतदाता ?

नवीन पटनायक और नरेन्द्र मोदी (फाइल चित्र)।

ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं। यहाँ 147 सदस्यीय विधानसभा के लिए भी चुनाव हो रहे हैं। दो चरणों में ओडिशा में भारी मतदान हुआ है। भाजपा ने ओडिशा में भी पूरा दम-खम लगा रखा है। मोदी और शाह की जोड़ी ओडिशा की चुनावी ज़मीन पर सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (BJD), मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और कांग्रेस पर करारे प्रहार कर रहे हैं। ओडिशा में भी भाजपा की रैलियों में अच्छी-खासी भीड़ उमड़ रही है। इतना ही नहीं दोनों चरणों में यहाँ भारी मतदान हुआ है। भाजपा को ओडिशा से इसलिए उम्मीद है, क्योंकि उसे कहीं न कहीं लगता है कि स्थानीय नवीन सरकार के विरुद्ध संभावित लहर का उसे फायदा मिल सकता है। साथ ही मोदी की लोकप्रियता भी ओडिशा में कम नहीं है। ऐसे में भाजपा आशा लगाए बैठी है कि ओडिशा के मतदाता इस बार कुछ नवीन करेंगे।

केरल : भीड़ बदलेगी मतों में ?

केरल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली में उमड़ी भीड़ (फाइल चित्र)।

केरल यानी वामपंथियों का गढ़। केरल के 62 वर्षों के इतिहास में वामपंथी और कांग्रेस ही आपस में सत्ता की भागबँटाई करते रहे हैं। इस समय केरल में वापमंथी सरकार है और कांग्रेस मुख्य विपक्ष। केरल में लोकसभा की कुल 20 सीटें हैं। 1980 में बनी भाजपा 39 वर्षों में केरल में खाता तक नहीं खोल पाई है। 2014 की मोदी लहर में भी केरल की जनता ने भाजपा को भाव नहीं दिया, परंतु 2019 में यहाँ भगवा लहराने के लिए भाजपा ने त्रिपुरा की तर्ज पर रणनीति अपनाई है। नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक, सभी जुटे हैं वामपंथियों के गढ़ में सेंध लगाने के लिए। भाजपा के विस्तार से स्थिति यह हो गई है कि केरल में कई सीटों पर अब मुकाबला वामपंथियों और कांग्रेस नहीं, अपितु वामपंथियों और भाजपा के बीच हो गया है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि केरल में प्रधानमंत्री के रोड शो और रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या केरल में परिवर्तन की लहर है ? मोदी की सभाओं में उमड़ रही भीड़ वास्तव में मतों में परिवर्तित होगी ?

कर्नाटक : 2018 की कसक काम बनाएगी ?

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा (फाइल चित्र)।

कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं। यद्यिप 2014 में भाजपा को यहाँ अच्छी-खासी सफलता मिली थी, परंतु विधानसभा चुनाव 2018 में मतदाताओं ने भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। कर्नाटक ही वह पहला राज्य है, जिसके जरिये दक्षिण भारत में पहली बार भाजपा का कमल खिला था, परंतु बाद में यहाँ उसकी पकड़ ढीली पड़ी। 2018 में भाजपा ने कांग्रेस की सिद्धरमैया सरकार को हटाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया। परिणाम भी मिला। सिद्धऱमैया आज मुख्यमंत्री नहीं हैं, परंतु भाजपा और बी. एस. येदियुरप्पा सत्ता में वापसी से कुछ कदम दूर रह गए। ऐसे में भाजपा, मोदी और शाह कर्नाटक के लोगों को लगातार यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि 2018 में उन्होंने खंडित जनादेश दिया, जिसके कारण राज्य में अस्थिर सरकार बनी, जिसके मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी प्रायः रोते हुए नज़र आते हैं। भाजपा को लगता है कि कर्नाटक में स्थिरता के मुद्दे पर जनता 2018 की भूल को दोहराने से बचेगी और भाजपा को ही वोट देगी।

पूर्वोत्तर : मोदी का काम बनाएगा काम ?

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि देश के अधिकांश भागों से अक्सर कटे रहने वाले पूर्वोत्तर भारत में जितना काम वर्तमान मोदी सरकार ने किया है, उतना पूर्व की किसी सरकार ने नहीं किया। यही कारण है कि आज पूर्वोत्तर में कांग्रेस साफ हो चुकी है और भाजपा छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता में है। पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में लोकसभा की कुल 25 सीटें हैं और भाजपा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार की ओर से पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए किए गए कार्यों के दम पर अधिक से अधिक सीटें मिलने की आशा लगाए हुए है।

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