EXCLUSIVE MICRO ANALYSIS : तो उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को मिल सकती थीं 30 सीटें

* बुआ-बबुआ का अहंकार महागठबंधन को ले डूबा

* सपा-बसपा को भारी पड़ी कांग्रेस की अवहेलना

* 8 सीटों पर हार का कारण बनी कांग्रेस

* राहुल-प्रियंका मिल सकता था फायदा

* भाजपा को 50 सीटों में समेटा जा सकता था

* अजित सिहं, धर्मेन्द्र यादव की हार व मेनका गांधी की जीत में कांग्रेस का ‘हाथ’

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 4 जून, 2019। लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम गत 23 मई को घोषित हुए और सबसे अधिक चौंकाने वाले परिणाम उत्तर प्रदेश के रहे, जहाँ तमाम अवधारणाओं, जातिवाद और सम्प्रदायवाद से परे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) को 80 में से 62 सीटें मिलीं, वहीं भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए 25 वर्ष पुरानी शत्रुता भुला कर कथित महागठबंधन करने वालीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा-बीएसपी-BSP) और समाजवादी पार्टी (सपा-एसपी-SP) को मात्र 15 सीटें ही हासिल हो सकीं। स्थिति यह आ गई है कि अवसरवाद पर आधारित यह महागठबंधन अब टूट चुका है।

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। 2014 में भाजपा ने यहाँ की 71 सीटें जीती थीं, जब भाजपा विरोधी सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों सपा, बसपा, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल (रालोद-आरएलडी-RLD) ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी व गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर और तत्कालीन उत्तर प्रदेश भाजपा प्रभारी अमित शाह की चाणक्य नीति के चलते 2014 में जहाँ बसपा का खाता भी खुला था, वहीं सपा को पारिवारिक 5 और कांग्रेस को भी पारिवारिक 2 सीटें ही मिली थीं, जबकि भाजपा को 71 और उसके सहयोगी अपना दल (एडी-AD) को 2 सीटें मिली थीं।

लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा और मोदी विरोधी बिखरे विपक्ष को अचानक एकजुटता का ख्याल आया। यद्यपि इसकी नींव उत्तर प्रदेश में किए गए एक प्रयोग से ही पड़ी, जब कुछ लोकसभा और विधानसभा सीटों के उप चुनावों में बसपा सुप्रीमो मायावती ने पहल करते हुए अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और भाजपा के विरुद्ध सपा-बसपा की एकजुटता दिखाई। इसमें दोनों दलों को सफलता मिली, जिससे मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव का उत्साह बढ़ा। माया-अखिलेश का प्रयोग पूरे देश में मोदी विरोधी एकजुटता के लिए प्रेरक बल बना।

लोकसभा चुनाव 2019 में मायावती ने 25 वर्ष पुरानी शत्रुता को भुला कर सपा के साथ गठबंधन करने का निर्णय किया, परंतु मायावती और अखिलेश ने यहाँ एक बड़ी भूल कर दी। राष्ट्रीय स्तर पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ हाथ में हाथ मिलाने वाले मायावती-अखिलेश पर उप चुनावों में मिली जीत का घमंड इस कदर सवार था कि वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को तनिक भी भाव देने को तैयार नहीं थे। अखिलेश तो फिर भी राज़ी हो जाते, परंतु मायावती पर तो इस कदर घमंड छाया हुआ था कि वे यहाँ तक इसी कारण उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-आरएलडी का महागठबंधन तो बना, परंतु उसमें कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया और माया-अखिलेश का यही गुमान उन्हें भारी पड़ गया।

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण करने से पता चलता है कि यदि महागठबंधन में कांग्रेस भी शामिल होती, तो महागठबंधन को मिली 15 सीटों में 8 सीटों की वृद्धि होती। इतना ही नहीं कांग्रेस की 1 सीट भी महागठबंधन के खाते में गिनी जाती और उसका कुल सीटों का आँकड़ा 24 तक पहुँच जाता।इतना ही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और चुनावों के बीच राजनीति में लाई गईं कांग्रेस की ट्रम्प कार्ड समान प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीतिक कद, प्रियंका की व्यक्तिगत लोकप्रियता का भी महागठबंधन को फायदा मिल सकता था और सभी मिल कर भाजपा का सामना करते, तो महागठबंधन की सीटों का आँकड़ा 30 को भी छू लेता, तो आश्चर्य नहीं होता।

कांग्रेस के कारण 8 सीटों पर गठबंधन की सीधी हार

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की ऐसी 8 सीटें उभर कर सामने आई हैं, जहाँ यदि कांग्रेस प्रत्याशी मुकाबले में नहीं होता या कांग्रेस को प्राप्त मत गठबंधन प्रत्याशी को ट्रांसफर हो जाते, तो भाजपा प्रत्याशी की जीत नहीं हो पाती। कांग्रेस के कारण इन 8 सीटों पर गठबंधन प्रत्याशी को सीधी हार का सामना करना पड़ा :

बदायूँ : भाजपा के डॉ. संघमित्र मौर्य ने यह सीट 18,454 मतों से जीती। मौर्य को 5,11,352 (45.59 प्रतिशत) मत मिले, जबकि उनके निकटतम् प्रतिद्वंद्वी सपा प्रत्याशी व मुलायम परिवार के सदस्य धर्मेन्द्र यादव को 4,92,898 (45.59) प्रतिशत वोट हासिल हुए। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा विरोधी मतों विशेषकर मुस्लिम मतों का बँटवारा हो गया, क्योंकि कांग्रेस की ओर से सलीम इक़बाल शेरवानी चुनाव मैदान में थे। शेरवानी को 51,947 (4.8 प्रतिशत) मत हासिल हुए, जो धर्मेन्द्र की हार के अंतर से 3 गूना अधिक है। यदि महागठबंधन में कांग्रेस शामिल होती, तो धर्मेन्द्र यादव आसानी से यह सीट जाते।

बांदा : भाजपा के आरके सिंह पटेल ने यह सीट 58,938 मतों से जीती। पटेल को 4,77,926 (46.2 प्रतिशत) मत मिले, जबकि उनके निकटतम् प्रतिद्वंद्वी सपा के श्याम चरण गुप्ता को 4,18,988 (40.5 प्रतिशत) वोट हासिल हुए। जबकि तीसरे स्थान पर रही कांग्रेस के बालकुमार पटेल को 74,438 (7.29 प्रतिशत) वोट मिले, जोभाजपा-सपा के बीच हार-जीत के अंतर से अधिक है। स्पष्ट है कि बुआ-बबुआ कांग्रेस को महागठबंधन में शामिल करते, तो यह सीट सीधे-सीधे उनके खाते में आ जाती।

बाराबंकी : भाजपा के उपेन्द्रसिंह रावत ने यह सीट 1,10,140 मतों के भारी अंतर से जीती, परंतु इतने भारी अंतर को भी मात देकर महागठबंधन यह सीट आराम से जीत सकती, यदि कांग्रेस का साथ मिलता, क्योंकि भाजपा को यहाँ 5,35,917 (46.39 प्रतिशत), जबकि सपा प्रत्याशी राम सागर रावत को 4,25,777 (36.85 प्रतिशत) वोट मिले। सपा की हार में यहाँ कांग्रेस रूपी कारण छिपा हुआ है, क्योंकि कांग्रेस प्रत्याशी तनुज पुनिया ने मोदी विरोधी मतों में सेंध लगाते हुए 1,59,611 (13.82 प्रतिशत) मतों पर कब्ज़ा किया, जो भाजपा-सपा की हार जीत के अंतर से 19 हजार वोट अधिक है। यदि कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा होती, तो यह सीट महागठबंधन के खाते में आ सकती थी।

बस्ती : भाजपा के हरीश चंद्र उर्फ हरीश द्विवेदी ने बसपा के राम प्रसाद चौधरी को 30,354 मतों से हरा कर यह सीट अपने नाम कर ली। बसपा की हार का कारण कांग्रेस बनी, क्योंकि भाजपा को जहाँ 4,71,162 (44.68 प्रतिशत) और बसपा को 4,40,808 (41.8 प्रतिशत) वोट हासिल हुए, जबकि मोदी विरोधी मतों में सेंध लगाते हुए कांग्रेस के राज किशोर सिंह 86,920 (8.24 प्रतिशत) वोट बँटोर ले गए। यदि कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा होती, तो यह सीट निश्चित रूप से उसके खाते में आ सकती थी।

धौरहरा : भाजपा की रेखा वर्मा ने बसपा के अर्शद इलियास सिद्दीकी को 1,60,611 मतों के भारी अंतर से हरा कर यह सीट जीती, परंतु यदि महागठबंधन में कांग्रेस शामिल होती, तो यहाँ भाजपा की हार और बसपा या कांग्रेस की जीत निश्चित होती, क्योंकि भाजपा को जहाँ 5,12,905 (48.21 प्रतिशत) और बसपा को 3,52,294 (33.12 प्रतिशत) वोट मिले हैं, वहीं कांग्रेस के युवा नेता जितिन प्रसाद ने 1,62,856 (15.31 प्रतिशत) वोट हासिल कर मोदी विरोधी मतों को बाँट दिया, जिससे भाजपा आसानी से यह सीट भारी अंतर से जीत गई। कांग्रेस को मिले वोट हार-जीत के अंतर से अधिक हैं। यदि कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा होती, तो भाजपा का जीतना मुश्किल हो जाता और यह सीट गठबंधन के खाते में आ सकती थी।
कुंवर जितिन प्रसाद 1,62,856 15.31

मेरठ : भाजपा के राजेन्द्र अग्रवाल ने बसपा के हाज़ी मोहम्मद याक़ूब को क़रीबी मुकाबले में 4,729 मतों से हराया। भाजपा को 5,86,184 (48.19 प्रतिशत), जबकि बसपा को 5,81,455 (47.80 प्रतिशत) वोट मिले। यहाँ कांग्रेस के हरेन्द्र अग्रवाल को 34,479 (2.83 प्रतिशत) वोट मिले, जो हार-जीत के अंतर से 9 गुना अधिक हैं। ये वोट गठबंधन प्रत्याशी को ट्रांसफर होता, तो भाजपा की 1 सीट घटाई जा सकती थी।

संत कबीर नगर : भाजपा के प्रवीण कुमार निषाद ने बसपा के भीष्म शंकर को 35,749 मतों से हरा कर यह सीट जीती, परंतु कांग्रेस ने हार-जीत के अंतर से कहीं अधिक 1,28,506 (12.08 प्रतिशत) वोट हासिल किए, जो बसपा की हार का कार बने। भाजपा को जहाँ 4,67,543 (43.97 प्रतिशत), वहीं बसपा को
4,31,794 (40.61 प्रतिशत) वोट मिले। ऐसे में यदि कांग्रेस के वोट बसपा में ट्रांसफर होते, तो जीत बसपा उम्मीदवार की ही होती।

सुल्तानपुर : यदि महागठबंधन में कांग्रेस शामिल होती, तो पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी इस सीट से चुनाव नहीं जीत पातीं। मेनका ने बसपा के चंद्र भद्र सिंह को 14,526 वोटों के मामूली अंतर से हराया, जबकि कांग्रेस के डॉ. संजय सिंह को मिले मत हार-जीत के अंतर से पौने तीन गुना अधिक हैं। भाजपा को 4,59,196 45.91 (प्रतिशत), बसपा को 4,44,670 (44.45 प्रतिशत) और कांग्रेस को 41,681 (4.17 प्रतिशत) वोट मिले।

राहुल-प्रियंका का ज़ोर सुधार सकता था गठबंधन का गणित

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के लिए पड़े वोटों के गणित का विश्लेषण करने से स्पष्ट रूप से उभर कर एक बात सामने आती है कि यदि सपा-बसपा-आरएलडी महागठबंधन में मुलायम, मायावती, अखिलेश के साथ कांग्रेस व राहुल-प्रियंका का बल भी जुड़ जाता, तो जैसा कि हमने ऊपर देखा, कई सीटों पर परिणामों को पलटा भी जा सकता था। इतना ही नहीं, कुछ सीटें ऐसी भी हैं, जहाँ परिणाम की धारा कांग्रेस के समावेश से बदल सकती थी। आइए कुछ ऐसी ही सीटों पर नज़र डालते हैं :

रायबरेली : यदि सपा-बसपा-आरएलडी महागठबंधन में कांग्रेस भी होती, तो रायबरेली में सोनिया गांधी की पक्की जीत के चलते महागठबंधन की सीटों का आँकड़ा 1 तो अपने आप ही बढ़ जाता, क्योंकि सोनिया के विरुद्ध कई वर्षों की परम्परा जारी रखते हुए महागठबंधन ने इस बार भी प्रत्याशी नहीं उतारा था। ऐसे में महागठबंधन को यह सीट बोनस में मिल जाती।

वाराणसी : महागठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं करके सपा-बसपा (बुआ-बबुआ) ने वाराणसी में सम्मानजनक हार का मौका भी गँवा दिया। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध पराजय तो निश्चित ही थी, परंतु यदि कांग्रेस महागठबंधन में होती, तो मोदी विरोधी मत 32 प्रतिशत से अधिक हो जाते, परंतु वास्तविक आँकड़ों को देखें, तो भाजपा के नरेन्द्र मोदी को 6,74,664 (63.62 प्रतिशत) वोट हासिल हुए, जबकि सपा की शालिनी यादव को 1,95,159 (18.4 प्रतिशत) और कांग्रेस के अजय राय को 1,52,548 (14.38 प्रतिशत) वोट मिले। यदि महागठबंधन में कांग्रेस शामिल होती, तो सपा या कांग्रेस का कोई एक ही प्रत्याशी पीएम मोदी को अच्छे से चुनौती देता और सम्मानजनक तरीके से हारता।

सीतापुर : भाजपा के राजेश वर्मा ने बसपा के नकुल देव को 1,01,133 वोटों से हरा कर यह सीट जीती। भाजपा को 5,14,828 (48.33 प्रतिशत) और बसपा को 4,13,695 (38.86 प्रतिशत) वोट मिले, परंतु कांग्रेस की क़ैसर जहाँ 96,018 (9.02 प्रतिशत) वोट बँटोर ले गई। मोदी विरोधी मुस्लिम मतों का स्पष्ट विभाजन भाजपा को फला, जबकि गठबंधन की जीत की संभावना धूमिल कर गया। यदि कांग्रेस गठबंधन में शामिल होती, तो परिणाम बदल भी सकता था।
क़ैसर जहाँ कांग्रेस 96,018 9.02

मछलीशहर : भाजपा की बी. पी. सरोज ने मात्र 181 वोटों से यह सीट जीती। सरोज ने बसपा के त्रिभुवन राम को हराया। भाजपा 4,88,397 (47.19 प्रतिशत), तो बसपा को 4,88,216 (47.17 प्रतिशत) वोट मिले। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सुहैलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के राज नाथ को 11,223 (1.08 प्रतिशत), जबकि नोटा को 10,830 (1.05 प्रतिशत) वोट पड़े, जो हार-जीत के अंतर से कई गुना अधिक हैं। यदि ये वोट भाजपा या बसपा में से किसी एक के पक्ष में जाते, तो हार-जीत का अंतर बढ़ सकता था और परिणाम पलट भी सकता था।

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