ये है STARTUP का दम : दो फूल से खड़ी कर दी 2 करोड़ की ‘फुलवाड़ी’ !

* मंदिरों में चढ़ने वाले श्रद्धा के फूलों में पुन: भरी जाती है सुगंध

* गंगा किनारे आया विचार और 80 महिलाओं को मिला रोजगार

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 18 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान भले ही विपक्ष समय-समय पर बेरोजगारी का मुद्दा उठाता रहे, परंतु मोदी और उनकी नीति ही कुछ ऐसी है कि कोई व्यक्ति यदि धन कमाना की ठान ले, तो वह बेरोजगार नहीं रह सकता। यह मोदी की नीति का चमत्कार है कि आज देश में सहस्त्रों युवा किसी के आगे रोजगार के लिए हाथ फैलाने की बजाए लोगों को रोजगार देने की स्थिति में पहुँच रहे हैं। इस चमत्कार का मूल है मोदी स्टार्टअप इंडिया-स्टैण्डअप इंडिया अभियान। इस अभियान ने देश में अनेक युवाओं को जीने की नई राह दिखाई है।

ऐसे ही एक युवा हैं अंकित अग्रवाल, जिनकी सफलता ने सिद्ध कर दिखाया है कि मोदी के स्टार्टअप इंडिया अभियान में रोजगार या धनोपार्जन की अपेक्षा रखने वाले युवाओं के लिए असीमित संभावनाएँ और सफलताएँ हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-कानपुर (INDIAN INSTITUTE OF TECHNLOGY-KANPUR) यानी आईआईटी-कानपुर के छात्र अंकित अग्रवाल ने मोदी सरकार के स्टार्टअप इंडिया अभियान को अपनी सफलता की सीढ़ी बनाया और दो फूल से 2 करोड़ रुपए वार्षिक कारोबार वाली पूरी फुलवाड़ी खड़ी कर दी। अंकित ने जो स्टार्टअप बिज़नेस आरंभ किया, उसने मंदिरों में चढ़ने वाले श्रद्धा के फूलों में पुन: सुगंध भरी। गंगा के किनारे कौंधा एक विचार आज बड़ा कारोबार बन गया है और 80 महिलाओं के लिए रोजगार का साधन भी।

कौन हैं अंकित अग्रवाल और कैसे आया विचार ?

उत्तर प्रदेश में आईआईटी-कानपुर के छात्र अंकित अग्रवाल इस समय हेल्प अस ग्रीन (HELP US GREEN) नामक स्टार्टअप के संस्थापक हैं। यह स्टार्टअप मंदिरों, नदियों, सरोवरों और तालाबों में चढ़ाए-विसर्जित किए जाने वाले श्रद्धा के फूलों को बँटोरता है। इन्हें रिसाइकिल कर अगरबत्ती और धूप बनाया जाता है। आज हेल्प अस ग्रीन स्टार्टअप का वार्षिक टर्नओवर 2 करोड़ रुपए से अधिक का है, परंतु आपको जान कर आश्चर्य होगा कि अंकित ने यह स्टार्टअप केवल 2 फूलों से आरंभ किया था। बात 2017 की है, जब अंकित अग्रवाल अपने एक मित्र के साथ कानपुर में गंगा नदी के तट पर बैठे हुए थे। तट पर और नदी में पड़े पुष्पों को देख कर अंकित के मन में एक विचार स्फुरित हुआ कि क्यों न इन अनुपयोगी पुष्पों को उपयोगी बनाया जाए। उन्होंने यह विचार एक मंदिर में जाकर और वहाँ लोगों के समक्ष व्यक्त किए। मंदिर के पुजारी ने अनुमति दे दी। पहले दिन अंकित और उनके साथियों ने दो फूल लिए। अंकित और उनके साथियों की टीम ने बासी फूलों की विशेषता और उनमें छिपे गुणों पर दो महीनों तक अनुसंधान किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इन बासी फूलों में ऑर्गेनिक (जैविक) विशषताएँ हैं, जिनका प्रयोग कर अगरबत्तियाँ बनाई जा सकती हैं।

2 फूल, 72 हजार का निवेश और 2 महीने की रिसर्च

अंकित ने 2 फूल और 72 हजार रुपए का निवेश कर हेल्प अस ग्रीन नामक स्टार्टअप आरंभ किया, जो आज वार्षिक 8.50 टन अनुपयोगी फूलों का संग्रह कर अगरबत्ती-धूप बनाने का काम कर रहा है। ऐसा नहीं है कि अंकित और उनकी टीम को यह सब कुछ बिना परिश्रम के हासिल हो गया। अनुपयोगी फूलों की उपयोगिता पर रिसर्च में आईआईटी-कानपुर से एमटेक-बीटेक करने वाले छात्र भी जुड़े। कुछ प्राध्यापकों ने सहायता की। अंकित की टीम के एक सदस्य अपूर्व मिसाल के अनुसार सबसे पहले उन्होंने एक रिसर्ड डेवलपमेंट टीम खड़ी की, जिसके बाद कारखाना लगाने की योजना पर काम शुरू किया और साथ ही हमने इस कारखाने में महिलाओं को ही रोजगार देने का लक्ष्य रखा। आरंभ में दो-तीन महिलाएँ जुड़ीं। कुल मिला कर 10 लोगों की टीम थी, परंतु आज 80 महिलाएँ काम कर रही हैं। रिसर्च टीम में 15 सदस्य हैं। स्वतंत्र मार्केटिंग और सेल्स (विपणन व विक्रय) टीम भी है। हेल्प अस ग्रीन के कारखाने से निकलने वाला उत्पाद आज भारत के दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू सहित अलग-अलग हिस्सों में ही नहीं, अपितु सिंगापुर व अमेरिका सहित विदेशों तक जा रहा है।

अयोध्या और द्वारका में प्लांट लगाने की योजना

अंकित अग्रवाल का स्टार्टअप हेल्प अस ग्रीन अपने नाम को सार्थक करने का पूरा प्रयास कर रहा है। हेल्प अस ग्रीन का अर्थ ही होता है कि हरियाली में सहयोग करें। इसका सार है पर्यावरण संरक्षण। अंकित अग्रवाल की योजना देश के उन बड़े शहरों में जाने की है, जहाँ फूलों का सर्वाधिक उपयोग होता है। कुछ ही महीनों में तिरुपति में एक कारखाना लगाया जाएगा। इसके बाद अयोध्या और गुजरात के द्वारकाधीश में भी प्लांट लगाने की योजना है। कुछ लोगों ने स्वयं अंकित व उनके स्टार्टअप से सम्पर्क किया है। अंकित के साथी अपूर्व के अनुसार शुरू में बड़ी समस्याएँ पैदा हुईं, क्योंकि मंदिर वालों को यह समझाना बहुत कठिन हो जाता था कि फूल का हम क्या करेंगे। आज यह समस्या नहीं है। कई मंदिर और सामाजिक संगठन हमसे सहयोग कर रहे हैं।

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