चेता रहा चेन्नई : जानिए क्यों बिगड़ा भारत की ‘स्वास्थ्य राजधानी’ का स्वास्थ्य ?

* 10 वर्षों का भीषण जल संकट

* 40 लाख लोग टैंकरों के आसरे

* 50 हजार होटल-रेस्टोरेंट बंद

* 20 हजार कर्मचारी कर रहे WFH

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 22 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। आज हम बात करेंगे भारत के छठे सबसे बड़े शहर यानी चेन्नई की। अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात तमिलनाडु के इस महानगर को श्रेष्ठतम् स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते भारत की स्वास्थ्य राजधानी (HEALTH CAPITAL) भी कहा जाता है, परंतु क्या आप जानते हैं कि 40 लाख से अधिक की जनसंख्या वाला चेन्नई आज जिस संकट से जूझ रहा है, वह देश के हर बड़े ही नहीं, अपितु मध्यम और छोटे महानगरों के लिए भी चेतावनी समान है। भारत की स्वास्थ्य राजधानी का स्वास्थ्य यदि बिगड़ा है, तो उसका सीधा संदेश यही है कि यदि नहीं बचाया पानी, तो नहीं बचाएगा पानी।

सामान्यत: सूखाग्रस्त गाँवों, पानी की तंगी से जूझते क्षेत्रों, छोटे-मध्यम नगरों आदि में पानी भरने के लिए बर्तनों के साथ लोगों विशेषकर महिलाओं की जो लंबी कतारें देखने को मिलती हैं, वो पिछले कुछ दिनों से चेन्नई के आम जनजीवन का हिस्सा बन गई हैं। कतारों के बीच लड़ते-झगड़ते लोग। पानी की इतनी भीषण किल्लत कि लोग बड़ी मुश्किल से पीने का पानी जुटा पा रहे हैं और स्नान करना तो मानो सूची में शामिल ही नहीं है।

चेन्नई में हर ओर नज़ारा बदला-बदला-सा नज़र आता है। होटलों में लोगों को पीने का पानी उपयोग करने को लेकर चेतावनी दी जा रही है। चेन्नई के चार जलाशय सूख चुके हैं। शहर के लोगों के लिए आसरा अब सिर्फ सरकारी वॉटर टैंकर हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो ऊँची कीमत देकर अपने घरों पर टैंकर मंगवा रहे हैं, परंतु इसके बावजूद चार दिनों बाद पानी के टैंकर पहुँच रहे हैं। ज़मीन से पानी निकालने की कोशिशों को तब और झटका लगता है, जब खुदाई के बाद भी पानी नहीं निकलता। होटल मेहमानों के लिए पानी बचा रहे हैं।

जानकारों के अनुसार चेन्नई शहर दस वर्षों में पहली बार इतने भीषण जल संकट का सामना कर रहा है, जिसके पीछे कारण मॉनसून में देरी है। मॉल्स बंद हैं, सार्वजनिक शौचालय सहित कई ऐसी ही सेवाएँ प्रभावित हैं। परिस्थितियाँ इस तरह की हैं कि विश्व प्रसिद्ध आईटी कॉरिडोर ओल्ड ममहाबलिपुरम् रोड (OMR) की 650 से अधिक आईटी कंपनियों ने 20 हजार से अधिक कर्मचारियों को घर से काम करने (वर्क फ्रॉम होम) या फिर कंपनी के हैदराबाद या बेंगलुरू स्थित कार्यालयों से काम करने के निर्देश दिए हैं, ताकि कार्यालय में पानी की कम से कम आवश्यकता पड़े। कुछ होटल-रेस्टोरेंटों ने तो उन ग्राहकों को विशेष रियायतें दी हैं, जो घर ले जाकर खाना खाने को तैयार हैं। पानी की कमी के चलते पचास हजार छोटे व मध्य होटेल-रेस्टोरेंट बंद हैं और हजारों लोग बेरोजगार हो चुके हैं।

सवाल यह उठता है कि शिक्षा, आधनुनिकीकरण, स्वास्थ्य, विकास सहित हर तरह के क्षेत्रों में आगे चेन्नई अंततः बूंद-बूंद को क्यों तरस गया ? उत्तर है समाज के कथित विकास की दौड़ में स्वयं के द्वारा ही कुचल दी गई, भुला दी गई और नष्ट कर दी गई परम्परागत जल निधियों का लुप्त हो जाना। कभी समुद्र तट पर स्थित छोटा-सा मद्रासपट्टन गाँव आज जहाँ चेन्नई महानगर का रूप ले चुका है, वहीं विकास की इस अंधी दौड़ ने इस महानगर की 650 से अधिक जल निधियों में कूड़ा भर कर उन्हें सतल मैदान में परिवर्तित कर दिया। ये वही परम्परागत स्रोत थे, जहाँ पानी जमा होता था और जहाँ से समाज को पानी मिलता था। तालाबों की जगह पर गगनचुंबी इमारतों ने ले ली है। शहर के दक्षिण क्षेत्र में बीचों-बीच से गुज़रने वाली अडयार नदी कूड़ादान बन गई है। कूवम नदी का जल शहरी प्रदूषण से प्रदूषित हो चुकी है।

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