घाव पर घाव-बढ़ते रहे पाँव : अगर नहीं होते परमवीर एक्का, तो पाकिस्तान में होता अगरतला

* जब तक थी साँस लड़े वो… फिर अपनी लाश बिछा दी…

* भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 की 48वीं बरसी पर विशेष

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 3 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत की सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ गीत गाया तो था भारत-चीन युद्ध 1962 में बलिदान देने वाले शूरवीर जवानों की स्मृति में, परंतु इस गीत ने देश के हर नागरिक और हर जवान को सदैव प्रेरणा दी और आज भी दे रहा है। इसी गीत में एक पंक्ति यह भी आती है, ‘जब घायल हुआ हिमालय… ख़तरे में पड़ी आज़ादी… जब तक थी साँस लड़े वो… फिर अपनी लाश बिछा दी…’। इसी प्रकार फिल्म हक़ीकत का गीत है, ‘कर चले हम फ़िदा…’। इस गीत में भी कुछ इसी तरह की पंक्ति आती है, ‘साँस थमती गई… नब्ज़ जमती गई… फिर भी बढ़ते कदम को… न रुकने दिया… कट गए सर हमारे… तो कुछ ग़म नहीं… सर हिमालय का हमने न झुकने दिया…’। इन दोनों गीतों की ये पंक्तियाँ भारतीय सेना के तीनों अंगों के उन सभी जवानों पर सटीक बैठती हैं, जिन्होंने घाव पर घाव खाने के बाद भी एक-एक इंच भारत भूमि की रक्षा के लिए अपने बढ़ते कदमों को रुकने नहीं दिया। जान पर खेल गए, पर शान नहीं खोई।

आज भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 की 48वीं बरसी है। वैसे यह विजय दिवस नहीं है, परंतु 3 दिसम्बर, 1971 को ही भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध छेड़ा था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के चलते बंगाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान को मिला था, जो पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था, परंतु यहाँ के लोग पाकिस्तान के साथ ख़ुश नहीं थे। पाकिस्तान लगातार यहाँ के लोगों पर अत्याचार कर रहा था, जिसके चलते सहस्त्रों पीड़ित लोग शरणार्थी के रूप में भारत में विशेषकर पश्चिम बंगाल में आ रहे थे। जब भारत ने पाकिस्तान के सामने यह मुद्दा उठाया, तो पाकिस्तान ने यह कह कर हाथ खड़े कर लिए कि शरणार्थियों की समस्या भारत की अपनी समस्या है। फिर क्या था, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के इस रवैये और भारत को 24 वर्षों से तंग कर रही शरणार्थियों की समस्या की जड़ को उखाड़ फेंकने का निर्णय किया। एक तरफ पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्रता चाहता था, तो दूसरी तरफ भारत भी शरणार्थियों की समस्या को सदा के लिए समाप्त करना चाहता था। इसीलिए इंदिरा गांधी ने 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया और केवल 13 दिनों में पाकिस्तान को न केवल आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया, अपितु उसके दो टुकड़े भी कर दिए, जिसके फलस्वरूप 16 सितंबर, 1971 को बांग्लादेश नामक नए राष्ट्र का उदय हुआ।

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 में भारत ने 3500 से अधिक जवानों की क़ुर्बानी दी। एक-एक जवान की शहादत के पीछे बड़ी-बड़ी कहानियाँ हैं, परंतु हम आपको आज उस बलिदानी की गाथा सुनाएँगे, जिसके कारण अगरतला आज भारत का हिस्सा है और त्रिपुरा राज्य की राजधानी है। भारत ने 1971 का युद्ध तो 13 दिनों बाद जीत लिया, परंतु युद्ध के पहले ही दिन 3 दिसंबर, 1971 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में गंगासागर मोर्चे पर केवल 29 वर्षीय एक वीर सैनिक अल्बर्ट एक्का वीरगति को प्राप्त हुए, परंतु एक्का ने वीरगति को प्राप्त होने से पहले पाकिस्तान की मशीनगन धारी सेना को ऐसा सबक सिखाया कि वे अगरतला में घुसने के नापाक इरादों में सफल नहीं हो सके।

धनुष-बाण में निपुण एक्का ने जमाया सिक्का

झारखंड में गुमला जिले की डुमरी ब्लॉक की चैनपुर तहसील के जरी गाँव में 27 दिसम्बर, 1942 को जूलियस एक्का और मरियम एक्का के घर जन्मे अल्बर्ट एक्का ने जब से होश संभाला, तब से सेना में जाने की ललक भी जाग चुकी थी। स्कूली शिक्षा और आदिवासी बहुल गाँव में रहने के दौरान अल्बर्ट एक्का धनुष-बाण चलाने में निपुण थे। स्कूली खेलों में उनके अच्छे प्रदर्शन और सेना में शामिल होने की उनकी ललक को देखते हुए दिसम्बर-1962 में एक्का को भारतीय सेना में शामिल कर लिया गया। एक्का ने बिहार रेजिमेंट में कार्य शुरू किया। इसी दौरान जब 14 गार्ड्स का गठन हुआ, तब अल्बर्ट एक्का को इसमें स्थानांतरित कर दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान ही अधिकारियों को एक्का के अनुशासन और दृढ़ता ने इतना प्रभावित किया कि उन्हें लांस नायक बहना दिया गया। इसी बीच 14 गार्ड्स को उग्रवाद प्रभावित पूर्वोत्तर भारत में पोस्टिंग मिली, जहाँ विद्रोह को रोका जा सके।

गंगासागर रेलवे स्टेशन पर छिड़ा संग्राम

3 दिसम्बर, 1971 को जब भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ा, तो एक्का और उनके साथियों को गंगासागर पर कब्ज़ा करने का आदेश मिला, क्योंकि युद्ध में पाकिस्तान पर पकड़ बनाने के लिए गंगासागर मोर्चे पर फ़तह करना सामरिक रूप से महत्वपूर्ण था। अगरतला से मात्र 6.5 किलोमीटर दूर गंगासागर पर कब्ज़ा करके ही भारतीय सेना बांग्लादेश की स्वतंत्रता के महायज्ञ के लिए ढाका की ओर प्रयाण कर सकती थी। 3 दिसम्बर की सुबह गंगासागर रेलवे स्टेशन पर ही भारत-पाकिस्तान की सेनाएँ आमने-सामने थे। रणनीति के अनुसार भारतीय सेना की 2 कंपनियाँ आगे बढ़ रही थीं, जिनमें से एक की कमान एक्का के हाथ में थी। पूरे रेलवे स्टेशन पर सब तरफ माइन्स बिछी हुई थीं और पाकिस्तानी सेना ऑटोमैटिक मशीनगनों से आक्रमण कर रही थी। इससे भारतीय सेना के कदम लड़खड़ा रहे थे।

फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया…

पाकिस्तानी सेना तत्कालीन अत्याधुनिक मशीन गनों से भारतीय सेना को निशाना बना रही थी, तभी अल्बर्ट एक्का ने अपना निशाना पाकिस्तान की मशीन गनों और बंकरों पर साधा। एक्का ने अकेले ही पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोल दिया। मशीन गनों का सामना बंदूक से करते हुए एक्का ने दो पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा, तो पाकिस्तानी मशीन गनों का मुँह बंद हो गया। यद्यपि एक्का बुरी तरह घायल हो गए थे। इसके बावज़ूद एक्का गंगासागर मोर्चे को पूरी तरह जीतने के इरादे के साथ आगे बढ़ते रहे, परंतु कुछ दूर पहुँचते ही पाकिस्तान ने फिर से फायरिंग सुरू कर दी। दो मंजिला इमारत पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक ऑटोमैटिक मशीन गनों से फायरिंग करने लगीं, तो एक्का ने आपा खो दिया। एक्का ने हाथ में बम लिया और दो मंजिला इमारत पर फेंक दिया। एक्का के एक ही बम से पाकिस्तानी सैनिक और उनकी ऑटोमैटिक मशीन गनें ध्वस्त हो गईं। घाव पर घाव खाकर भी एक्का ने अपने बढ़ते कदमों को रुकने नहीं दिया, परंतु पहले ही वार में बुरी तरह घायल एक्का बाद में पड़े कई घावों के चलते वीरगति को प्राप्त हो गए।

अगरतला रक्षक एक्का को परमवीर चक्र

यद्यपि वीरगति को प्राप्त होने से पूर्व एक्का व उनके साथियों ने जो अदम्य साहस दिखाया, उसी कारण पाकिस्तानी सेना अगरतला में प्रवेश नहीं कर पाई। इतना ही नहीं, भारत को पहले ही दिन से युद्ध में बढ़त मिली। तेरह दिनों के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर बड़ी जीत हासिल की। पाकिस्तान को दोहरा झटका दिया। पहला तो उसे युद्ध में आत्मसमर्पण करना पड़ा और दूसरा उसके दो टुकड़े हो गए। युद्ध की समाप्ति के बाद भारत सरकार ने अल्बर्ट एक्का को भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया और साथ ही एक डाक टिकट भी जारी किया। बांग्लादेश ने भी भारत के इस महान सैनिक अल्बर्ट एक्का को ‘फ्रेंड्स ऑफ लिबरेशन वॉर ऑनर’ से सम्मानित किया। झारखंड में आज भी एक्का की शौर्यगाथा के कई चिह्न हैं। राजधानी राँची में एक्का के नाम पर राजमार्ग है, गुमला जिले के एक ब्लॉक का नाम एक्का के नाम पर रखा गया है।

दूसरी तरफ अगरतला रक्षक एक्का को त्रिपुरा सरकार भी नहीं भूली। त्रिपुरा सरकार ने हाल ही में एक्का के नाम पर अल्बर्ट एक्का पार्क बनाया है और इस पार्क में उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है। यदि लांस नायक अल्बर्ट एक्का और उनके साथी सैनिक न होते, तो कदाचित भारत विशेषकर अगरतला-त्रिपुरा का इतिहास कुछ और होता। युवाPRESS भी इस महान परमवीर अल्बर्ट एक्का के साहस और शौर्य को कोटि-कोटि नमन करता है।

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