फख्र है इस इक़बाल पर, जो वह ‘इक़बाल’ नहीं बने, जिन्होंने पाकिस्तान मांगा था…

* राम जन्म भूमि विवाद केस का चर्चित चेहरा रहे हैं इक़बाल अंसारी

* सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश इक़बाल नहीं चाहते पुनर्विचार याचिका

* ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक का किया बहिष्कार

अहमदाबाद 16 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। इक़बाल का अर्थ होता है सौभाग्य या किसी बात को स्वीकार कर लेना। इक़बाल अंसारी ने अपने नाम के अर्थ को वास्तव में सार्थक कर दिखाया है। इक़बाल अंसारी साढ़े चार सौ वर्ष पुराने राम जन्म भूमि विवाद में मुस्लिम पक्षकार थे। यद्यपि यह पक्षकारी उन्हें वर्ष 2016 में पिता से विरासत में मिली थी। उच्चतम् न्यायालय (SC) जब तक इस विवाद पर दलीलों और सुनवाइयों का सिलसिला चला, तब तक इक़बाल अंसारी ने विवादास्पद भूमि पर हिन्दुओं के अधिकार का पुरज़ोर विरोध किया, परंतु अब जबकि सुप्रीम कोर्ट यह निर्णय सुना चुका है कि विवादास्पद भूमि पर राम मंदिर का निर्माण किया जाए और मुस्लिमों को मस्जिद निर्माण के लिए अलग से 5 एकड़ भूमि दी जाए, तब इक़बाल अंसारी ने अपने नामार्थ के अनुरूप इस निर्णय को सिर-मत्थे चढ़ाते हुए तहेदिल से स्वीकार कर लिया है।

इक़बाल नाम आते ही अक्सर उर्दू साहित्य के प्रसिद्ध शायर मुहम्मद इक़बाल (अल्लामा इक़बाल) का नाम और चेहरा नज़रों के सामने उभर आता है, परंतु 2016 से देश में जो इक़बाल चर्चा में रहे हैं, वह राम जन्म भूमि विवाद केस में मुस्लिम पक्षकार के रूप में रहे हैं। 9 नवंबर, 1877 को तत्कालीन अखंड भारत के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में जन्मे शायर अल्लामा इक़बाल जहाँ ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसताँ हमारा…’ जैसी रचना के लिए सुप्रसिद्ध हैं, वहीं इस रचना के कुछ वर्षों बाद अचानक पाकिस्तान की मांग उठाने के कारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कुरूप चेहरे बने, वहीं पाकिस्तान में आज भी इक़बाल पूजनीय और पठनीय हैं।

ख़ैर, हमें फख्र इस बात का है कि उत्तर प्रदेश में लखनऊ में जन्मे इक़बाल अंसारी पर, जो अलग पाकिस्तान की मांग करने वाले अल्लामा इक़बाल के नक्श-ए-कदम पर नहीं चले और उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले का गरिमापूर्ण सम्मान किया। 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का फैसला आने के बाद मुस्लिम पक्षकारों में से कइयों ने असंतोष व्यक्त किया होगा, परंतु इक़बाल अंसारी ऐसे पहले मुस्लिम पक्षकार के रूप में उभरे, जिन्होंने कहा कि वे पहले ही कह चुके थे कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह उसे मानेंगे और उन्होंने फैसले के बाद यही कहा कि उन्हें यह फैसला स्वीकार है।

इक़बाल अंसारी अपने रुख पर अडिग

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर करने पर विचार करने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की रविवार को बैठक होने जा रही है, परंतु बोर्ड के सदस्य होने के बावज़ूद इक़बाल अंसारी ने इस बैठक का बहिष्कार करने का साहसपूर्ण और न्यायपालिका के प्रति अपने सम्मानपूर्ण रवैये वाला निर्णय किया है। यह इक़बाल की महानता नहीं है और न ही एआईएमपीएलबी पुनर्विचार याचिका दायर करने पर विचार करके कुछ ग़लत कर रहा है, परंतु सच्चाई यह है कि जब साढ़े चार सौ वर्ष पुराने केस का कोई हल देश की सबसे बड़ी अदालत में लंबी बहस के बाद निकल कर फैसला आ गया है, तो इक़बाल उसे चुनौती देना उचित नहीं मानते। इसीलिए इक़बाल अंसारी ने बोर्ड की इस बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया है।

कौन हैं इक़बाल अंसारी, जिनकी भारत को ज़रूरत है

भारत को ऐसे ही इक़बालों की ज़रूरत है, जैसे कि इक़बाल अंसारी हैं। लखनऊ निवासी 53 वर्षीय इक़बाल अंसारी एक गृहस्थ मुस्लिम परिवार से आते हैं। उन्होंने केवल 8वीं कक्षा तक हिन्दी माध्यम से पढ़ाई की है। उस समय अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा उपलब्ध नहीं थी। 7 सदस्यीय परिवार के स्वामी इक़बाल के पास आय का एकमात्र माध्यम एक छोटा-सा गराज़। इक़बाल की संतानों में चार पुत्र व एक पुत्री है। सभी पुत्र स्नातक हैं। उनका राम जन्म भूमि विवाद से कोई लेना-देना नहीं था। यद्यपि उनके पिता हामिद अंसारी 1949 में जब यह केस न्यायालय में गया, तब से मुस्लिम पक्षकारी कर रहे थे। अंसारी का निधन हो गया और 2016 से इक़बाल को मुस्लिम पक्षकारी विरासत में मिली। अदालती ख़र्च ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, सुन्नी वक़्फ बोर्ड और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी उठा रही थी।

हामिद अंसारी और महंत रामचंद्रदास की अटूट एकता

इक़बाल अंसारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक मीडिया से बातचीत में पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि अयोध्या के नाम पर पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिमों ने दंगे-फसाद किए होंगे, परंतु अयोध्या की हिन्दू-मुस्लिम एकता पूरी दुनिया के सामने आज फैसला आने के बाद तक मिसाल बनी हुई है। यह अयोध्या की संस्कृति है। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह दिन भी देखे हैं, जब अयोध्या मुद्दे पर सुनवाई वाले दिन उनके पिता मरहूम हामिद अंसारी और हिन्दू पक्षकार स्वर्गीय महंत रामचंद्रदास एक ही रिक्शा या तांगे में बैठ कर कोर्ट जाते थे। स्वयं इक़बाल अंसारी की कई हिन्दू संतों से अच्छी दोस्ती है और साथ-साथ तसवीरें भी हैं। इक़बाल अंसारी चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अब अंतिम निर्णय मान लेना चाहिए। अयोध्या के मुद्दे पर अब संघर्ष यहीं समाप्त हो जाना चाहिए।

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