पाँच वर्ष बाद ‘नोबेल’ में चमका भारतीय सितारा : क्या है J-PAL, जिसने अभिजीत को बनाया विजेता ?

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 14 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। वर्ष 2019 के लिये अर्थशास्त्र का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी को दिये जाने की घोषणा की गई है। यह पुरस्कार अभिजीत बैनर्जी को उनकी धर्मपत्नी एस्तेय डिफ्लो तथा अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर के साथ संयुक्त रूप से दिया जाएगा। इन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी कम करने के उद्देश्य से किये गये प्रयोगों के लिये यह पुरस्कार दिया जाएगा। 58 वर्ष के अभिजीत अभी अमेरिका में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं। इसी के साथ 5 वर्ष बाद भारतीय मूल के व्यक्ति को नोबेल पुरस्कार मिल रहा है। इससे पहले 2014 में शांति का नोबेल पुरस्कार कैलाश सत्यार्थी को मिला था।

कौन हैं भारतीय मूल के अभिजीत बैनर्जी ?

कोलकाता में 1961 में जन्मे अभिजीत बैनर्जी ने 1981 में कोलकाता यूनिवर्सिटी से बीए करने के बाद 1983 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) से एमए किया था। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के मैसाचुसेट्स् में स्थित निजी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की थी। अभिजीत ने ऐसी आर्थिक नीतियों पर गहन शोध किये, जो वैश्विक गरीबी को कम करने में मददगार बने। 2003 में उन्होंने एस्तेय डिफ्लो और सेंडहिल मुलैंटन के साथ मिल कर जमील पावर्टी एक्शन लैब (JPAL) की नींव रखी। 2009 में जेपाल को डेवलपमेंट कॉ-ऑपरेशन कैटेगरी में बीबीवीए फाउण्डेशन का फ्रंटियर नॉलेज अवॉर्ड मिला था। इसका पूरा नाम अब्दुल लतीफ जमील गरीबी कार्ययोजना प्रयोगशाला है। यह एक वैश्विक अनुसंधान केन्द्र है जो यह सुनिश्चित करने के लिये शोध करता है कि वैश्विक गरीबी कम करने के लिये कौन-सी नीतियाँ वैज्ञानिक तरीके से क्या प्रभाव डालती हैं। इसके अलावा जेपाल गरीबी के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण सवालों के जवाब ढूँढने का काम करती है। प्रभाव का मूल्यांकन करती है और नये शोध करने, ज्ञान को साझा करने तथा प्रभावी कार्यक्रमों को तैयार करने के लिये सरकारों, गैर सरकारी संगठनों और दाताओं व अन्य लोगों के साथ साझेदारी बनाता है।

अभिजीत बैनर्जी आर्थिक मामलों पर सभी प्रकार के लेख लिख चुके हैं। उन्होंने ‘पुअर इकोनॉमिक्स’ सहित 4 किताबें भी लिखी हैं। उपरोक्त किताब को गोल्डमैन सैक्स बिज़नेस बुक ऑफ दी इयर का खिताब भी मिला था। MIT पर दिये गये उनके परिचय में बताया गया है कि उन्होंने 2 डॉक्युमेंटरी फिल्मों का निर्देशन भी किया है। वे 2015 के बाद डेवलपमेंट एजेंडा पर बने यूएन सेक्रेटरी जनरल के हाई-लेवल पैनल में भी रहे हैं। बैनर्जी ने 2011 में आई अपनी उपरोक्त पुस्तक में लिखा है कि, ‘मोरक्को का कोई व्यक्ति जिसके पास खाने के पैसे न हों, वह टीवी क्यों खरीदेगा ? गरीब इलाकों में स्कूल जाने के बावजूद बच्चों को सीखने में कठिनाई क्यों होती है ? क्या कई बच्चे होने से लोग और गरीब हो जाते हैं ? यदि हम सचमुच वैश्विक गरीबी को कम करना चाहते हैं तो ऐसे सवालों का जवाब ढूँढना जरूरी है।’ अभिजीत बैनर्जी को अर्थशास्त्र का ज्ञान विरासत में मिला है। क्योंकि उनके पिता दीपक बैनर्जी भी कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे हैं। उनकी माता निर्मला बैनर्जी भी कोलकाता के सेंटर फोर स्टडीज़ इन सोशल साइसेंज में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। बेटे और बहू को नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद निर्मला बैनर्जी का कहना है कि वे बहुत खुश हैं। यह पूरे परिवार के लिये बड़े गौरव की बात है।

एस्तेय डिफ्लो भी एमआईटी में प्रोफेसर हैं

अभिजीत बैनर्जी के साथ-साथ उनकी धर्मपत्नी एस्तेय डिफ्लो भी एमआईटी में हैं और पॉवर्टी एलेविएशन एंड डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर हैं। फ्रांसीसी मूल की अमेरिकी अर्थशास्त्री डिफ्लो को भी उनके पति अभिजीत बैनर्जी के साथ ही नोबेल पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गई है। 1972 में पैरिस में जन्मी डिफ्लो ने हिस्ट्री और इकोनॉमिक्स से ग्रैजुएशन के बाद 1994 में पैरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (तत्कालीन DELTA) से मास्टर डिग्री प्राप्त की थी। 1999 में उन्होंने एमआईटी से इकोनॉमिक्स में पीएचडी की। एमआईटी में उन्होंने अभिजीत की देखरेख में ही अपनी पीएचडी पूरी की थी, क्योंकि बैनर्जी इसके जॉइंट सुपरवाइज़र थे। इसी दौरान दोनों के बीच प्रेम सम्बंध स्थापित हुए थे और दोनों एक साथ रहने लगे थे। 2015 में दोनों ने औपचारिक रूप से शादी कर ली।

नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति ने अपने ऑफिसियल ट्विटर हैंडल से एस्तेय डिफ्लो की एक सेल्फी पोस्ट करके उन्हें बधाई दी है। ट्वीट में लिखा गया है कि 2019 में इकोनॉमिक्स का नोबेल पाने वाली एस्तेय डिफ्लो को बधाई ! डिफ्लो जब सुबह उठीं तो उन्हें खुद को नोबेल मिलने की खबर मिली, जिसके बाद उन्होंने सेल्फी शेयर की है।

एक दर्जन भारतीय हस्तियों को मिल चुका नोबेल पुरस्कार

उल्लेखनीय है कि 1900 में स्थापित नोबेल पुरस्कार देने की शुरुआत 1901 से हुई है। इस प्रकार इसे शुरू हुए 119 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान भारतीय मूल के कुल 12 हस्तियों को अलग-अलग कैटेगरी में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। सबसे पहले रबीन्द्रनाथ टैगोर को 1913 में साहित्य श्रेणी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके बाद 1930 में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. सीवी रमण को 1979 में मदर टेरेसा को शांति नोबेल पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद 1998 में अमर्त्य सेन को आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और तत्पश्चात् 2014 में कैलाश सत्यार्थी को शांति नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

भारतीय मूल के प्रवासी नागरिकों की बात करें तो ब्रिटिश भारत में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जन्मे और अब पाकिस्तान निवासी हर गोविंद खुराना को फिजियोलॉजी या मेडिसिन के क्षेत्र में 1968 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इसी प्रकार ब्रिटिश भारत में लाहौर (अब पाकिस्तान) में जन्मे सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर को 1983 में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। तमिलनाडु के चिदंबरम में जन्मे और ब्रिटेन निवासी वेंकटरमण रामकृष्णन को 2009 में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। 3 ऐसे विदेशी नागरिकों को भी नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जो भारत में जन्मे थे। इनमें 1902 में रोनाल्ड रोस को फिजियोलॉजी या मेडिसिन के क्षेत्र में 1902 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो ब्रिटिश भारत में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे थे। इसी प्रकार मुंबई में जन्मे यूके स्थित रुडयार्ड किपलिंग को 1907 में साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भारत में जन्मे तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु 14वें दलाई लामा को भी 1989 में शांति नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

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