‘महात्मा’ से ‘गांधी’ तो ले लिया, पर नेहरू की ‘रईसी’ नहीं छोड़ सके : ये है कांग्रेस कल्चर ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

कहते हैं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में तन-मन-धन से संपूर्ण और महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू रंगीन मिज़ाज के थे। नेहरू के आचरण में उनकी रईसी झलकती थी। उनके रईसी आचरण को लेकर समय-समय पर अनेक रहस्योद्घाटन हुए हैं, परंतु आज हम नेहरू की बात नहीं करने जा रहे, अपितु हम बात करने जा रहे हैं नेहरू के उत्तराधिकारियों की, जिनमें से कुछ आज भी भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं। यह बात और है कि नेहरू के उत्तराधिकारी भारत में पिछले 77 वर्षों से गांधी उपनाम से राजनीति में सक्रिय हैं।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं भारतीय राजनीति में सबसे पुराने और ऐतिहासिक दल कांग्रेस और उससे जुड़े गांधी परिवार की। आज का गांधी परिवार 1942 की इंदिरा नेहरू के उस अडिग और सुदृढ़ स्वभाव का परिणा है, जिसके तहत इंदिरा ने पिता जवाहर के विरुद्ध जाकर अपने प्रेमी और स्वतंत्रता सेनानी फिरोज़ खान से विवाह किया। 26 मार्च, 1942 को इंदिरा नेहरू ने जैसे ही फिरोज़ के साथ विवाह किया, वह इंदिरा गांधी बन गईं, क्योंकि विवाह से पहले पारसी धर्मावलंबी फिरोज़ को महात्मा गांधी ने अपना उपनाम गांधी दे दिया था। इंदिरा हिन्दू थीं और फिरोज़ पारसी थीं। इसीलिए आम जनता में भी इस विवाह को लेकर विरोध था। ऐसे में नेहरू को भी इंदिरा-फिरोज़ का विवाह रास नहीं आ रहा था। नेहरू ने जब महात्मा गांधी से सलाह मांगी, तो प्रयोगों में निपुण महात्मा गांधी ने एक प्रयोग यह भी कर डाला। उन्होंने फिरोज़ को गोद ले लिया और इसके साथ ही फिरोज़ गांधी बन गए और उनसे विवाह करने के साथ ही इंदिरा नेहरू भी इंदिरा गांधी बन गईं।

मैं यहाँ महात्मा गांधी की किसी क्रिया पर कोई प्रतिक्रिया देना नहीं चाहता, क्योंकि न ही मुझे यह अधिकार है और न ही मैं स्वयं को इस योग्य समझता हूँ, परंतु गांधीजी के कुछ आलोचक कहते हैं कि महात्मा गांधी स्वयं चाहते थे कि उनके बाद भी देश में गांधी उपनाम भारतीय राजनीति में जीवित रहे। गांधीजी इंदिरा में एक भविष्य की तेजतर्रार नेतृत्वकर्ता के गुण परख चुके थे। इसीलिए उन्होंने अपने किसी पद को न पाने के त्याग के कथित चोले को बनाए रखतेहुए इंदिरा के विवाह से पहले फिरोज़ को गांधी उपनाम दिया, ताकि विवाह के बाद इंदिरा नेहरू भी इंदिरा गांधी हो जाएँ और स्वतंत्र भारत में भी गांधी की गूंज रहे।

ख़ैर यदि गांधीजी की यह इच्छा थी, तो उनकी यह इच्छा वास्तव में पूरी भी हुई है। स्वतंत्र भारत का 1947 से आज तक का पूरा इतिहास गांधी उपनाम का उपयोग किए बिना नहीं लिखा जा सकता, परंतु दुःख और पीड़ा की बात यह है कि महात्मा से गांधी उपनाम लेने वालों ने महात्मा के आदर्शों पर चलने की बारी आई, तब हर बार उन्हें ताक पर रख दिया और समय-समय पर स्वयं को अपने वास्तविक पूर्वज नेहरू की रईसी के साथ जोड़े रखा। फिर वह नेहरू से पहली गांधी बनीं इंदिरा हों या फिर उनके उत्तराधिकारी संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ही क्यों न हों। सभी को गांधी पसंद है, पर महात्मा के आदर्श नहीं। सभी ने गांधी उपनाम तो उधारी में ले लिया, परंतु यारी निभाई पूर्वज नेहरू की रईसी से।

इंदिरा के ये उत्तराधिकारी रहते तो भारत में हैं, परंतु इनके लिए सबसे बड़ा त्योहार थर्टी फर्स्ट नाइट होता है, जब पूरी दुनिया नया वर्ष मनाती है। अक्सर देखने-सुनने में आता है कि राहुल-प्रियंका 1 जनवरी को शुरू होने वाले अंग्रेजी नव वर्ष को मनाने के लिए छुट्टी पर देश या विदेश के किसी भव्य पिकनिक-टूरिस्ट स्पॉट पर चले जाते हैं। क्या यही महात्मा के आदर्श थे, जो गांधी परिवार निभा रहा है ? इसके उलट, गांधी परिवार तो नेहरू की रईसी की विरासत को आगे बढ़ा रहा है। दोष राहुल-प्रियंका का भी नहीं है, क्योंकि इस तरह की परम्परा नेहरू के लहु में थी, तो राजीव भी 1 जनवरी को शुरू होने वाला अंग्रेजी नया वर्ष मनाने को लेकर उत्साहित रहते थे। राहुल-प्रियंका उनकी ही विरासत को आगे बढ़ाते रहे हैं।

क्या है ताज़ा मामला ?

देश में लोकसभा चुनाव 2019 के पाँच चरण समाप्त हो चुके हैं। छठे और सातवें चरण में जहाँ चुनाव होने हैं, उनमें दिल्ली और पंजाब शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनीति में निपुण हैं और वे अच्छी तरह जानते हैं कि चुनावी बहस में कब-किस मुद्दे को जोड़ना है। दिल्ली और पंजाब वो राज्य हैं, जो पूर्व प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की राजनीति से अच्छी तरह परिचित हैं। 1980 में पंजाब के अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार चला कर इंदिरा गांधी पहले ही सिक्खों की दृष्टि में खलनायिका बन चुकी थीं और इसी कारण उनके सिक्ख अंगरक्षकों ने 1984 में उनकी हत्या भी कर दी। जब राजीव ने देश की शासनधुरा संभाली, तो इंदिरा और कांग्रेस समर्थकों में इंदिरा की हत्या को लेकर रोष था और यह रोष दिल्ली और पंजाब के उन सिक्खों पर फूटा, जिसका कलंक कांग्रेस पार्टी और राजीव गांधी आज तक नहीं धो सके। अब जब कि मोदी जानते हैं कि दिल्ली और पंजाब में सिक्खों की भारी संख्या है। ऐसे में मोदी ने चुनावी बहस में राजीव गांधी का मुद्दा उछाल दिया और उन्हें भ्रष्टाचारी नंबर 1 कह दिया।

क्या गांधी परिवार का आक्रोश उचित है ?

यह प्रश्न ही हमें यह शीर्षक देने पर विवश करता है कि इंदिरा नेहरू को जो गांधी उपनाम मिला था, उसकी लाज रखने में इंदिरा के उत्तराधिकारी सफल नहीं रहे। इंदिरा के उत्तराधिकारियों ने राजनीति में गांधी नाम का लाभ उठाने का तो कोई अवसर नहीं छोड़ा, परंतु महात्मा के सादगीपूर्ण जीवन के आदर्श पर चलने की बजाए अपने पूर्वज नेहरू की रईसी की विरासत को ही आगे बढ़ाया। फिर वह राजीव गांधी हों, सोनिया गांधी हों, राहुल गांधी हों या प्रियंका गांधी। ये सभी गांधी हैं, परंतु इनकी जीवनशैली हाई-फाई रही है। जनता के बीच तो ये लोग स्वयं को धरती से जुड़ा बताते हैं, परंतु समय-समय पर इनकी ऐसी तसवीरें और कारनामे बाहर आते हैं, जो दर्शाते हैं कि ये लोग सिर्फ उपनाम के गांधी हैं। वर्तमान राजनीति में सक्रिय सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को आपने समय-समय पर छुट्टियाँ मनाते और ऐसी मौज़-मस्ती करते देखा होगा, जिससे देश का हर वह ग़रीब दंग रह जाता होगा, जिसके बारे में ये नेता चुनावी ज़मीन पर बात करते हैं। ऐसे में यदि मोदी ने राजीव का मुद्दा चुनावी बहस में जोड़ा है, तो क्या कांग्रेस और गांधी परिवार का आक्रोश उचित है ? वे उस राजीव के नाम पर सहानुभूति बँटोरना चाहते हैं, जिनके साथ सिक्ख विरोधी दंगों, बोफोर्स तोप में दलाली, भोपाल गैस त्रासदी जैसे अनेक कांड जुड़े हुए हैं। भले ही राजीव किसी भी कांड में सीधे दोषी नहीं हैं, परंतु इन सभी कांडों के समय सरकार का नेतृत्व वे कर रहे थे।

राजीव भी ‘गांधी’ नहीं रह सके !

राजीव को गांधी उपनाम स्वाभाविक रूप से अपने माता-पिता से ही मिला था, परंतु इंदिरा के बाद उन्हें अनायास ही देश का प्रधानमंत्री पद मिल गया, तब वे भी महात्मा के ‘गांधी’ उपनाम और आदर्शों के पालन में नहीं, अपितु पूर्वज नेहरू की रईसी निभाने में लगे रहे। 18 वर्षों का सरकारी-राजनीतिक जीवन में एक भी छुट्टी नहीं लेने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक इंटरव्यू में राजीव से जुड़ा एक नया खुलासा किया, तो कांग्रेस और भड़क उठी। मोदी ने राजीव की प्रधानमंत्री के रूप में ली गई 10 दिन की उस गोपनीय छुट्टी का मुद्दा उठाया है, जिसमें भारतीय नौसेना के आईएनएस विराट का दुरुपयोग किया गया। एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी ने राजीव की जिस छुट्टी का जिक्र किया है, वह सही है।

PM के भव्य-वैभवी पिकनिक में कौन-कौन ?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 10 दिन की छुट्टी ली थी, जो पूरी तरह गोपनीय थी। मीडिया वालों को भनक न लगे, इसका पूरा ध्यान रखा गया। राजीव अपने पूरे परिवार और विशेष मित्रों के साथ खूबसूरत द्वीप बंगाराम गए थे। कोच्चिं से 465 किलोमीटर पश्चिम में लक्षद्वीप के पास स्थित और 0.5 वर्ग किलोमीटर में फैले निर्जन बंगाराम द्वीप देश की सबसे सुरक्षित जगह है। 1 जनवरी, 1998 को शुरू होने वाले नए वर्ष का स्वागत करने के लिए राजीव ने बंगाराम द्वीप का चयन किया। गांधी परिवार के कुछ सदस्य और कुछ निकटस्थ मित्र 27 दिसम्बर, 1997 को बंगाराम के लिए रवाना हो गए, जबकि राजीव और सोनिया 30 दिसम्बर, 1997 को बंगाराम पहुँचे। 31 दिसम्बर को राजीव के सबसे निकटतम् मित्र अमिताभ बच्चन हेलिकॉप्टर से पहुँचे। जया बच्चन, उनके बच्चे और प्रियंका 27 दिसम्बर को ही पहुँच चुके थे। इस पिकनिक में राहुल-प्रियंका के चार मित्र, सोनिया की बहन, बहनोई, उनकी बेटी, सोनिया की माँ, भाई और मामा शामिल थे, तो अमिताभ, जया, अभिषेक, श्वेता के अलावा अमिताभ के भाई अजिताभ की बेटी भी इस पिकनिक का हिस्सा थीं। आश्चर्य की बात यह है कि पीएम राजीव गांधी ने पिकनिक में उस बिजेन्द्र सिंह को भी शामिल किया था, जो फॉरेन एक्सचेंज रेग्युलेशन एक्ट (FERA) उल्लंघन में फँसे हुए थे। इस भव्य और वैभवी पिकनिक स्पॉट में स्वीमिंग, सनबाथ से लेकर फिशिंग तक हर सुविधा थी। साथ ही दिल्ली से शराब और पास के ही एक द्वीप से 100 चिकन की भी व्यवस्था की गई थी। इसके अलावा फल, ब्रेट, बटर, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक्स, मिनरल वॉटर, चीज़, काजू, आटा, चावल, सब्जियाँ सब कुछ इस निर्जन बंगाराम द्वीप पर लाया गया था।

जब ‘विराट’ बन गया वामन

पीएम के पिकनिक के लिए सामान लाने-ले जाने के लिए भारतीय नौसेना के युद्धपोत INS विराट का उपयोग किया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार युद्ध में दुश्मनों के दाँत खट्टे कर देने वाला आईएनएस विराट पीएम राजीव गांधी के आगे वामन बन गया। यह युद्धपोत 10 दिनों तक अरब सागर में खड़ा रहा। यही कारण है कि मोदी ने आरोप लगाया कि राजीव गांधी ने आईएनएस विराट को टैक्सी बना दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पीएम की यह आलीशान छुट्टी 6 जनवरी को ख़त्म हुई। सबसे पहले प्रियंका अपने दोस्तों के साथ बंगाराम से रवाना हुईं। उसके बाद विदेशी मेहमान, फिर बच्चन परिवार रवाना हुआ। उसी दिन राजीव और राहुल आईएनएस विराट में सवार होकर रवाना हुए। बीच में राजीव ने राहुल को युद्धपोत में छोड़ दिया और नौसेना के हेलिकॉप्टर से एमिनी आईलैण्ड गए, जहाँ उन्हें नव वर्ष 1998 में पहला सरकारी कार्यक्रम था। बंगाराम द्वीप से सबसे अंत में रवाना हुए सोनिया गांधी और उनके रिश्तेदार।

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