क्या ‘बाघिन’ के विरुद्ध बलवा करने जा रहे हैं बंगाली ?

क्या है ‘चुपेचाप कमल छाप’ का अर्थ ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

हर लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक चर्चा उत्तर प्रदेश की होती है। इस बार भी भाजपा, सपा-बसपा और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जहाँ लोकसभा चुनाव 2014 की सफलता दोहराने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं, वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा को रोकने के लिए 25 वर्ष पुरानी शत्रुता भुला कर सपा से गठबंधन किया है, तो अखिलेश यादव को भी मायावती क़ुबूल हो गई हैं। दूसरी तरफ सपा-बसपा से गठबंधन करने में विफल रही कांग्रेस ने अपने ट्रम्प कार्ड प्रियंका गांधी को राजनीति में उतार कर पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंप दी है, परंतु आज हम बात उत्तर प्रदेश की नहीं करने जा रहे हैं।

जी हाँ। हम उस राज्य की बात करने जा रहे हैं, जो लोकसभा चुनावों के 1952 से 2014 तक के इतिहास में कभी भी इतनी चर्चा में नहीं रहा, जितना कि लोकसभा चुनाव 2019 में है। इस बार के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के बाद सर्वाधिक चर्चित कोई राज्य है, तो वह है पश्चिम बंगाल। कभी कांग्रेस और कभी वामपंथी दलों का गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में आज कांग्रेस-वामपंथी नदारद हो चुके हैं और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुखिया ममता बनर्जी का शासन है। 1970 में कांग्रेस के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वालीं ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में वामपंथियों से बढ़ती निकटता के विरोध में कांग्रेस से किनारा कर लिया। ममता ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों की राजनीतिक ज़मीन की चूलें हिलाने के लिए 1 जनवरी, 1998 को अपने अलग दल ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी की स्थापना की। तेज तर्रार नेता और बंगाल की बाघिन की उपाधि प्राप्त ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक ज़मीन स्थापित करने के लिए 13 वर्षों तक कड़ी मेहनत की और अंततः सितम्बर-2011 में कांग्रेस-वामपंथियों के इस गढ़ में सेंध लगाने में सफलता प्राप्त करते हुए पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। 2016 में भी पश्चिम बंगाल की जनता ने टीएमसी और ममता पर ही मुहर लगाई।

तीन साल में ही कैसे बदल गए हालात ?

ममता बनर्जी की धाकड़ राजनेता की छवि है और इसी के बल पर वे ‘माँ, माटी, मानुष’ जैसे नारे के साथ विधानसभा चुनाव 2016 में दूसरी बार जीतने में सफल रहीं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि जिस पश्चिम बंगाल की लोकसभा चुनाव 2014 में कोई चर्चा नहीं थी, ममता और टीएमसी के विरुद्ध कोई चुनौती नहीं थी, उस पश्चिम बंगाल की लोकसभा चुनाव 2019 में इतनी चर्चा क्यों हो रही है ? 2016 से 2019 के बीच इन तीन वर्षों में कैसे बदल गए बंगाल के राजनीतिक हालात ? इस प्रश्न का उत्तर है मोदी-शाह की जोड़ी। मोदी की रणनीति और शाह की चाणक्य नीति में अचानक उस समय पश्चिम बंगाल महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया, जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की ज़मीन खिसकने का ख़तरा मंडराने लगा। वैसे मोदी-शाह ने उत्तर प्रदेश के अलावा सभी राज्यों से सीटें बँटोरने का विकल्प चुना, परंतु सबसे अधिक ज़ोर पश्चिम बंगाल में लगाया। भाजपा ने ममता के कथित कुशासन, टीएमसी नेताओं-कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी, भाजपा नेताओं की हत्या जैसे मुद्दों के साथ टीएमसी के गढ पश्चिम बंगाल में सेंध लगाने का प्रयास किया और उसे सफलता भी मिली। यही कारण है कि आज पश्चिम बंगाल में टीएमसी का मुकाबला कांग्रेस या वामपंथियों से नहीं, अपितु भाजपा से है, क्योंकि पिछले तीन वर्षों में बंगाल में भाजपा का जनाधार बढ़ा है और वह मुख्य विपक्षी दल बन कर उभरी है।

ममता के हाथ से सरक रहा बंगाल ?

भाजपा के बढ़ते जनाधार को ममता बनर्जी अच्छी तरह भाँप चुकी हैं और इसीलिए इस चुनाव में बंगाल का मुकाबला मोदी वर्सिस ममता बन गया है। बंगाल से आ रही कई मीडिया रिपोर्ट्स भी कह रही हैं कि ममता के हाथ से बंगाल सरक रहा है। मोदी और शाह बंगाल पर पूरा ज़ोर लगा रहे हैं और कहा जा रहा है कि बंगाल की जनता में भी ममता और टीएमसी के विरुद्ध रोष है, तो भाजपा और मोदी के पक्ष में लहर है। बंगाल में टीएमसी ने भय का ऐसा कथित माहौल फैला रखा है कि आम जनता ममता या टीएमसी के विरुद्ध खुल कर बोलने को तैयार नहीं है, परंतु बंगाल के मतदाताओं के बीच इन दिनों एक नारा चल रहा है – ‘चुपेचाप – कमल छाप’। यह नारा यह दर्शाता है कि बंगालियों ने अब अपनी बाघिन से बलवा करने की ठान ली है। यह नारा दर्शाता है कि बंगाल के मतदाता ममता के विरद्ध बोल कर नहीं, बल्कि चुपचाप बलवा करने वाले हैं। अगर यह नारा वास्तव में बंगाल के मतदाताओं के मन में घूम रहा है और मतदान केन्द्र पर लोग इस नारे को सार्थक भी कर रहे हैं, तो यह निश्चित है कि पश्चिम बंगाल के परिणाम उत्तर प्रदेश सहित देश के किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे अधिक चौंकाने वाले होंगे। चुनाव पूर्व तमाम सर्वेक्षण पहले ही यह दावा कर चुके हैं कि ममता के गढ़ में भाजपा सेंध लगाने जा रही है। ऐसे में मोदी-शाह के बलबूते पर भाजपा के बढ़ते प्रभाव, चुनाव प्रचार के दौरान ममता की कथित हिन्दू विरोधी नीतियों के हो रहे पर्दाफाश के बीच यदि बंगाल में भाजपा 30 से अधिक सीटें भी ले आए, तो आश्चर्य नहीं होगा।

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