चाँद के साउथ पोल पर ही क्यों जा रहा भारत का चंद्रयान ? CLICK कीजिए और जानिए

अहमदाबाद, 22 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का मिशन मून यानी अत्यंत महत्वाकाँक्षी चंद्रयान-2 चाँद के साउथ पोल यानी चाँद के उस पार पहुँचने वाला है। इसीलिये भारत के इस कदम पर दुनिया भर के देशों की नज़र है। क्योंकि भारत का यह कदम दुनिया के लिये भी कई मायनों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं, भारत चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग के बाद चाँद पर पहुँचनेवाला अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। भारत ने चाँद के साउथ पोल में ही उतरने का फैसला क्यों किया है ? इस फैसले के क्या मायने हैं ? इसी पर हम यहाँ प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

चाँद के साउथ पोल में उतरेगा भारत का चंद्रयान-2

इसरो ने 129 महीने अर्थात् 94,848 घण्टे की मेहनत से महत्वाकाँक्षी चंद्रयान-2 तैयार किया है, जो पृथ्वी से 3,34,404 कि.मी. दूर स्थित चंद्र ग्रह की 51 दिन की यात्रा करके चाँद पर पहुँचेगा। चंद्रयान-2 14 अगस्त के आसपास चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करेगा और लगभग 6 सितंबर तक चाँद की सतह पर पहुँचेगा, जहाँ चंद्रयान-2 चाँद के साउथ पोल में यानी चाँद के उस पार उतरेगा, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी से हमें चाँद का एक भाग ही दिखाई देता है, जो नॉर्थ पोल है। इस नॉर्थ पोल की तुलना में साउथ पोल बहुत बड़ा है, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है, यह पृथ्वी से दिखाई देने वाले चाँद का पीछे का भाग है। भारत ने उसी हिस्से में जो कि दक्षिणी ध्रुव पर है, उतरने का निर्णय किया है। चाँद के इस साउथ पोल में ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में जो दो महत्वपूर्ण गड्ढे मंजिनस-सी तथा सिमपेलियस-एन के बीच खुले मैदान पर लगभग 700 दक्षिणी अक्षाँश पर चंद्रयान-2 की लैण्डिंग का प्रयास किया जाएगा। साउथ पोल का यह हिस्सा हमेशा छाया में रहता है और ऐसी संभावना जताई जाती है कि इस हिस्से में पानी भी हो सकता है।

काफी रोचक है चाँद का साउथ पोल

चाँद पर पहुँचने वाले अमेरिका, रूस और चीन भी अभी तक इस जगह पर नहीं पहुँच पाये हैं। इस भाग की बहुत सारी जानकारियाँ अभी तक सामने नहीं आई हैं। चाँद का यह साउथ पोल काफी रोचक है। चाँद के साउथ पोल में ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में प्रारंभिक सौर प्रणाली के लुप्त हो चुके जीवाश्म रिकॉर्ड मौजूद होने के प्रमाण मिले हैं। भारत के चंद्रयान-1 मिशन के दौरान इसी साउथ पोल में बर्फ के बारे में पता चला था और तभी से चाँद के इस हिस्से के बारे में और जानने की दुनिया की उत्सुकता बढ़ी थी। भारत का चंद्रयान-2 इसी भाग में जा रहा है, इसलिये भारत के इस मिशन पर दुनिया भर के देशों की नज़र बनी हुई है। यह भी माना जा रहा है कि भारत इस मिशन मून से दुनिया के अन्य देशों पर बढ़त हासिल कर लेगा। इस क्षेत्र में भारत चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर तथा प्रज्ञान रोवर का उपयोग करेगा। उनके माध्यम से ऐसे अनमोल खजाने की खोज कर सकता है, जिससे न केवल अगले लगभग 500 साल तक की ऊर्जा की जरूरतें पूरी की जा सकेंगी, बल्कि खरबों डॉलर की कमाई भी संभव हो सकती है। उम्मीद की जा रही है कि चाँद से मिलने वाली यह ऊर्जा सुरक्षित होगी और तेल, कोयले तथा परमाणु कचरे से होने वाले प्रदूषण से मुक्त होगी।

ऊर्जा के लिये हो रही चाँद पर फतह की कोशिश

ऊर्जा की भावी जरूरतों को पूरा करने के लिये विभिन्न देश चाँद पर अपने-अपने झंडे गाड़ने के प्रयासों में जुटे हैं। एक विशेषज्ञ का अनुमान है कि चाँद पर हीलियम-3 ऊर्जा का भण्डार मिलने की उम्मीद है। एक टन हीलियम-3 ऊर्जा की कीमत 5 अरब डॉलर तक हो सकती है, जबकि चंद्रमा से ढाई लाख टन हीलियम-3 लाया जा सकता है, जिसकी कीमत कई लाख करोड़ डॉलर हो सकती है। चीन ने भी इसी वर्ष हीलियम-3 की खोज के लिये चांग ई-4 यान चाँद पर भेजा है। अमेरिका, रूस, जापान तथा यूरोपीय देशों में भी इसी ऊर्जा को लेकर चाँद के प्रति इतनी रुचि है। इतना ही नहीं, दुनिया की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी एमेजॉन के मालिक जेफ बेजोस तो चंद्रमा पर कॉलोनी बसाने की इच्छा रखते हैं।

भारत के लिये चाँद पर चुनौतियाँ भी हैं

भारत के लिये चाँद पर चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। भारत पहली बार चाँद की सतह पर सॉफ्ट लैण्डिंग करेगा। चाँद पर लैण्डिंग करते ही अमेरिका, रूस और चीन के साथ ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। भारत ने पहले 15 जुलाई-2019 को चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग करने का निर्णय किया था, परंतु क्रॉयोजेनिक इंजन में लीकेज के कारण इसे रोक देना पड़ा था। इसरो चीफ के. सिवन के अनुसार लैण्डिंग से पहले के 15 मिनट का समय काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। यह 15 मिनट काफी तनावपूर्ण रहेंगे, क्योंकि इसरो पहली बार चाँद की सतह पर सॉफ्ट लैण्डिंग करने वाला है।

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