बदल गया भारत का भाल : केन्द्र शासित प्रदेश बने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, राज्यों की संख्या 37 पर पहुँची

*पाँच वर्षों के बाद एक और नए राज्य लद्दाख का उदय

*2004 में आंध्र प्रदेश से पृथक तेलंगाना बना था 36वाँ राज्य

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 31 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत अर्थात् राज्यों का संघ, जिसे हम युनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया (USI) भी कह सकते हैं। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुए भारत में 565 रजवाड़े और 17 प्रांत थे। स्वतंत्रता के बाद प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 50 के दशक में भाषा आधारित राज्य पुनर्गठन के माध्यम से अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया, जिसके चलते 1956 में भारत में राज्यों की कुल 20 हो गई, जिनमें 14 पूर्ण राज्य व 6 केन्द्र शासित प्रदेश थे। इन केन्द्र शासित प्रदेशों में राजधानी दिल्ली भी शामिल थी। समय-समय पर स्थानीय लोगों की मांग और आवश्यकता के अनुरूप राज्यों की संख्या बढ़ती गई, जो 30 अक्टूबर, 2019 के दिन 36 पर पहुँच गई है। इन 36 राज्यों में 29 स्वायत्त और 7 केन्द्र शासित प्रदेश हैं, परंतु 31 अक्टूबर, 2019 गुरुवार सरदार पटेल जयंती से राज्यों की संख्या 1 बढ़ कर 37 पर पहुँच जाएगी, क्योंकि गत 5/6 अगस्त, 2019 को संसद में पारित जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के अंतर्गत एक नए राज्य लद्दाख का उदय होगा। इस विधेयक के प्रावधान के अनुसार जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दोनों ही केन्द्र शासित प्रदेश होंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि 31 अक्टूबर, 2019 से भारत में स्वायत्त राज्यों की संख्या 29 से घट कर 28 हो जाएगी, जबकि केन्द्र शासित प्रदेशों की संख्या 7 से बढ़ कर 9 हो जाएगी।

राज्य पुनर्गठन आयोग से अधिनियम तक

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में अंग्रेजी साम्राज्य 21 प्रशासनिक इकाइयों में बँटा हुआ था। अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के अनुसार इन इकाइयों का गठन किया था। इनमें स्थानीय लोगों की संस्कृति, भाषा और अस्मिता का कोई स्थान नहीं था। 1920 में जब महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन की कमान संभाली, तब से कांग्रेस ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक प्रांत की जगह प्रदेश शब्द का उपयोग आरंभ किया। 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने भाषा, जनेच्छा, जनसंख्या, भौगोलिक व वित्तीय स्थिति को राज्यों के गठन का आधार माना। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता मिलते ही जहाँ भारत के समक्ष देशी रजवाड़ों के एकीकरण की चुनौती थी, वहीं राज्यों के पुनर्गठन का भी प्रश्न था। इसे देखते हुए 1947 में ही श्याम कृष्ण दर आयोग का गठन किया गया, जिसने भाषाई आधार पर राज्य निर्माण का विरोध किया, परंतु तत्कालीन जनभावनाओं को देखते हुए 1947 में ही जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभिसीतारमैया (JBP) आयोग बनाया गया, जिसने भाषा आधारित राज्यों के गठन का सुझाव दिया। इसके साथ ही सबसे 1 अक्टूबर, 1953 को मद्रास राज्य से अलग पहला नया राज्य बना आंध्र प्रदेश, जिसे तेलुगू भाषा के आधार पर बनाया गया। यद्यपि आंध्र प्रदेश के गठन के लिए सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामलू ने 58 दिन का आमरण अनशन किया था और उनका निधन हो गया था, जिसके चलते केन्द्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। 22 दिसम्बर, 1953 को न्यायाधीश फ़ज़ल अली की अध्यक्षता में प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग बना और उसकी अनुसंशाओं में कुछ संशोधनों के बाद केन्द्र सरकार ने 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम संसद में पास किया, जिसके अंतर्गत 14 राज्य तथा 6 केन्द्र शासित प्रदेश अस्तित्व में आए।

गुजरात से तेलंगाना : 54 वर्षों में 21 नए राज्य

भाषा आधारित राज्य पुनर्गठन अधिनयम बनने के बाद देश में अलग-अलग स्थानों से पृथक राज्य की मांग उठने लगी। यही कारण है कि 1960 में जहाँ गुजरात सहित कई क्षेत्रों में पृथक राज्य की मांग को लेकर आंदोलन चले, वहीं कई राज्यों में अब भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। यद्यपि 1960 से 2014 तक यानी 54 वर्षों में देश में 21 नए राज्यों का गठन हुआ, जिनमें 4 केन्द्र शासित प्रदेश शामिल हैं। इसके साथ ही राज्यों की कुल संख्या 36 पर पहुँच गई। बात 1960 की करें, तो बृहन्मुंबई राज्य में शामिल गुजराती भाषियों ने 1956 से ही पृथक गुजरात की मांग को लेकर महागुजरात आंदोलन छेड़ दिया, जिसके चलते 1 मई, 1960 को बृहन्मुंबई राज्य का विभाजन हुआ और गुजरात तथा महाराष्ट्र नामक दो नए राज्य अस्तित्व में आए। 1963 में नगालैण्ड का गठन हुआ। 1966 में पंजाब का विभाजन कर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का गठन किया गया। 1972 में मेघालय, मणिपुर व त्रिपुरा अस्तित्व में आए। 1987 में मिज़ोरम का गठन हुआ, तो केन्द्र शासित अरुणाचल प्रदेश तथा गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। 2000 में उत्तर प्रदेश से पृथक उत्तराखंड, बिहार से पृथक झारखंड और मध्य प्रदेश से पृथक छत्तीसगढ़ का गठन हुआ। अंतिम बार 5 वर्ष पूर्व यानी 2 जून, 2014 को आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना नामक नए राज्य का गठन किया गया। इसी दौरान पंजाब और हरियाणा के बीच विवाद का कारण बने चंडीगढ़ को 1 नवम्बर, 1966 को केन्द्र शासित प्रदेश घोषित किया गया। 1961 में दादरा व नगर हवेली और 1987 में दमण नामक केन्द्र शासित प्रदेश अस्तित्व में आए।

अब जम्मू-कश्मीर व लद्दाख आए अस्तित्व में

राज्य पुनर्गठन की निरंतर जारी प्रक्रिया के अंतर्गत जहाँ देश में अधिकांश राज्यों की स्थापना भाषा, संस्कृति, अस्मिता आदि के आधार पर की गई, वहीं जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नामक दो नए केन्द्र शासित प्रदेशों की स्थापना इन सबसे ऊपर राष्ट्रवाद और राष्ट्रहित से जुड़ी हुई है। स्वतंत्रता के समय जिस अखंड जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ था, वह जम्मू-कश्मीर 1947 के पाकिस्तानी हमले के बाद खंडित हो गया। लगभग एक तिहाई हिस्से पर इस समय पाकिस्तान का कब्ज़ा है, जो भारत का अभिन्न अंग है। इतना कुछ गँवाने के बावजूद पूर्ववर्ती सरकारों ने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और 35ए लागू कर इस राज्य को भारत की मुख्य धारा से जुड़ने में बाधा डाली, जिसे मोदी सरकार ने समाप्त किया। संसद में पारित प्रस्ताव के साथ ही जम्मू-कश्मीर 31 अक्टूबर, 2019 को विभाजित हो जाएगा। इसका एक हिस्सा जम्मू-कश्मीर कहलाएगा, जबकि दूसरा हिस्सा लद्दाख कहलाएगा। दोनों ही नए केन्द्र शासित प्रदेश बनेंगे। इसके साथ ही देश में केन्द्र शासित प्रदेशों की संख्या 9 हो जाएगी, जबकि पूर्ण राज्यों की संख्या 28 रह जाएगी। इनमें जम्मू-कश्मीर की अपनी विधानसभा होगी, जबकि लद्दाख पूर्णत: केन्द्रीय प्रशासन के अंतर्गत रहेगा।

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