JNU छात्र आंदोलन : क्या सड़क पर उतरने वाले ‘विरोध-विद्रोह’ की सूक्ष्म भेद रेखा समझते हैं ?

विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 18 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। दिल्ली में जिन छात्रों को क्लासरूम में होना चाहिये, वे एक सैलाब के रूप में सोमवार को सड़कों पर उतर आए। छात्रों का यह हुजूम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का है, जो 19 साल बाद बढ़ी फीस का विरोध कर रहा है। विरोध के चलते यूनिवर्सिटी प्रशासन ने बढ़ी हुई फीस में 50 प्रतिशत की कटौती भी कर दी है, इसके बावजूद सभी छात्र संगठन मिल कर, शुल्क वृद्धि पूरी तरह से वापस लेने और हॉस्टल मैनुअल में किये गये बदलाव भी वापस लेने की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। जब तक विरोध प्रदर्शन की बात है तो यह छात्रों का अधिकार है, परंतु इसे विशेषाधिकार नहीं समझना चाहिये। यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि कहीं विरोध विद्रोह में परिवर्तित न हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो कहीं विद्रोह देशद्रोह की संज्ञा में न आ जाए, यह भी देखना जरूरी है। छात्रों के इस आंदोलन ने पूरी दिल्ली को प्रभावित कर दिया है। इतना ही नहीं, इसका प्रभाव दिल्ली से निकल कर देश के अन्य भागों में भी पहुँच रहा है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी जेएनयू छात्रों के आंदोलन को सपोर्ट किया है। जेएनयू के आंदोलन कारी छात्र संगठनों ने भी देश के अन्य छात्र संगठनों से उनका समर्थन करने की माँग की है, जिससे संभावना बढ़ गई है कि यह आंदोलन देश के अन्य भागों में भी न फैल जाए। छात्र आंदोलन मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड कर रहा है। अनेक नेता और सेलिब्रिटीज़ आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, वहीं कुछ लोगों का यह भी कहना है कि आंदोलन इतना उग्र न हो कि पुलिस को बल प्रयोग करना पड़े और किसी माता-पिता के लाड़ले या लाड़ली को कोई क्षति पहुँचे। क्योंकि ऐसा होना किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

केन्द्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल को 6 घण्टे घेरे रखा

फीस बढ़ोतरी और ड्रेस कोड के विरोध में जेएनयू परिसर में छात्र पिछले 15 दिनों से प्रदर्शन कर रहे थे। उनके विरोध को देखते हुए परिसर में पुलिस को भी तैनात किया गया था। सोमवार को प्रदर्शन ने संसद मार्च का निर्णय किया तो दिल्ली पुलिस ने सीआरपीएफ के साथ मिलकर सुरक्षा व्यवस्था की कमान सँभाली। चूँकि सोमवार से ही संसद का शीतकालीन सत्र प्रारंभ हुआ है, इसलिये संसद के आसपास और विरोध प्रदर्शन के चलते जेएनयू के आसपास धारा 144 लागू कर दी गई। जेएनयू के उत्तर और पश्चिमी द्वार के बाहर भारी संख्या में पुलिस तैनात कर दी गई और जेएनयू से संसद तक पुलिस की 9 कंपनियाँ तैनात की गईं, जिनमें लगभग 1,200 पुलिस कर्मी थे, इनमें सीआरपीएफ के जवान भी शामिल किये गये। पुलिस का कहना था कि धारा 144 का पालन कराना उसकी ड्यूटी है, इसलिये वह छात्रों को संसद के पास नहीं जाने दे सकती। दूसरी तरफ छात्रों का कहना था कि वे 15 दिन से आंदोलनरत् हैं, परंतु कोई मंत्री या सांसद उनकी बात सुनने के लिये नहीं आया। इसलिये वे शांतिपूर्वक संसद की तरफ जा रहे थे, ताकि सांसदों से मिल कर उनसे पूछ सकें कि क्या वे छात्रों के आंदोलन का समर्थन करेंगे या नहीं ? हालांकि पुलिस ने 5 जगहों पर बैरिकेड्स लगाकर उनका मार्ग रोकने का प्रयास किया, परंतु पुलिस की मौजूदगी के बावजूद छात्रों का हुजूम बैरिकेड्स तोड़ते हुए आगे बढ़ता रहा। इस बीच जेएनयू से 3 कि.मी. दूर स्थित अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) में दीक्षांत समारोह चल रहा था, जिसमें उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू तथा केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेशचंद्र पोखरियाल ‘निशंक’ आए हुए थे। छात्र आंदोलन के चलते पुलिस ने एआईसीटीई का द्वार बंद कर दिया था, परंतु छात्रों के वहाँ पहुँचने से पहले ही उप राष्ट्रपति वहाँ से निकलने में सफल हो गये, जबकि रमेश पोखरियाल ऐसा नहीं कर पाये। छात्रों ने 6 घण्टे तक उन्हें वहीं घेरे रखा। आखिरकार सुबह 10 बजे से घिरे रमेश पोखरियाल को शाम 4.15 बजे वहाँ से निकलने का मौका मिला।

छात्र आंदोलन में पुलिस की सराहनीय भूमिका

छात्र आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस की भूमिका सराहनीय रही। बैरिकेड्स तोड़ते हुए पुलिस ने सैकड़ों छात्रों को हिरासत में अवश्य लिया, परंतु छात्रों पर कोई बल प्रयोग न करके स्वयं को भी नियंत्रित रखा और छात्रों को भी नियंत्रित रखने में सफलता प्राप्त की। कई स्थानों पर एहतियात के तौर पर वॉटर केनन भी तैयार रखे थे, परंतु इनका उपयोग नहीं किया गया, जो अच्छी बात रही। इस बीच छात्रों ने ‘दिल्ली पुलिस गो बैक’ के नारे भी लगाये, परंतु पुलिस ने किसी भी प्रकार से संयम नहीं खोया। छात्रों की माँग पर देर शाम पुलिस ने हिरासत में लिये गये छात्रों को मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, पुलिस ने छात्रों के समक्ष उनके एक प्रतिनिधि मंडल की मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात करवाने का प्रस्ताव भी पेश किया है।

क्या है छात्र आंदोलन का कारण ?

जेएनयू के डीन ऑफ स्टूडेंट्स उमेश कदम के अनुसार यूनिवर्सिटी प्रशासन 19 साल बाद हॉस्टल के चार्जिस में बढ़ोतरी की है। हॉस्टल में सिंगल बैड कमरे का किराया जो 10 रुपये मासिक लिया जाता था, उसे बढ़ा कर 300 रुपये और डबल बैड रूम का मासिक किराया जो 20 रुपये था, उसे बढ़ाकर 600 रुपये किया था। इसके अलावा अभी तक कोई सर्विस चार्ज नहीं लिया जाता था। अब से 1,700 रुपये सर्विस चार्ज लेने का प्रस्ताव किया गया था। जबकि कैंटीन की फीस जो पहले 1,980 रुपये थी, उसे अब 2,000 से 4,000 रुपये कर दिया है। कदम के अनुसार छात्रों को खाने के लिये जो 22 रुपये चुकाने होते थे, वह अब बढ़ाकर 44 रुपये किये गये हैं। इस तरह से छात्रों का एक दिन का खर्च लगभग 132 रुपये होगा। चूँकि जेएनयू में अनलिमिटेड खाना मिलता है, इसलिये इस वृद्धि के बावजूद यह सस्ता ही है। नये मैनुअल के अनुसार अब विजिटर्स को रात 10.30 बजे तक हॉस्टल छोड़ कर निकल जाना होगा, जबकि लड़कों के कमरे में लड़की या लड़की के कमरे में लड़के की एंट्री पर रोक लगाई गई है। इस नियम का पालन न करने पर 10,000 रुपये के फाइन का प्रस्ताव किया गया है। यह फीस वृद्धि और मैनुअल में बदलाव 28 अक्टूबर से लागू किया गया है, जिसका छात्र संगठन विरोध कर रहे हैं। हालाँकि छात्रों के विरोध के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन की कार्यकारी परिषद की गत बुधवार को बैठक हुई, जिसमें 50 प्रतिशत तक शुल्क वृद्धि वापस लेने का फैसला किया गया। इसके बावजूद छात्रों ने आंदोलन जारी रखा है।

क्या है छात्रों की माँग ?

छात्रों के अनुसार यूनिवर्सिटी की 48वीं वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार जेएनयू में पढ़ने वाले कुल छात्रों में से 40 प्रतिशत छात्र गरीब हैं, जिनके पैरेंट्स की आय वार्षिक 1.4 लाख रुपये से भी कम है। ऐसे में शुल्क वृद्धि से प्रत्येक छात्र पर वार्षिक कम से कम 56,000 रुपये का खर्च आएगा, जो कि गरीब छात्र अफोर्ड नहीं कर सकते और उन पर पढ़ाई बीच में ही छोड़ने का दबाव बढ़ जाएगा। छात्र संघ की ओर से जारी पर्चे में कहा गया है कि फरवरी-2018 की सीएजी रिपोर्ट के अनुसार सेकेंड्री और हायर में 94,036 करोड़ रुपये उपयोग ही नहीं किये गये। सीएजी रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि 7,298 करोड़ रुपये रिसर्च और विकास कार्यों में खर्च किये जाने थे, जो कि नहीं किये गये। ऐसे में फीस बढ़ा कर तथा मैनुअल में बदलाव करके छात्रों और उनके परिवार की आर्थिक परेशानियाँ बढ़ाई जा रही हैं। हालाँकि रमेश पोखरियाल ने छात्रों को आश्वासन दिया है कि उनकी माँगों पर सरकार की ओर से विचार विमर्श किया जाएगा।

एक तरफ छात्र अपने हित के लिये संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर छात्र आंदोलन को लेकर कुछ राजनेता राजनीति करने लगे हैं और छात्र आंदोलन को समर्थन देने की आड़ में सरकार पर दोषारोपण करने में जुट गये हैं। ऐसे में छात्रों के लिये यह चुनौती उत्पन्न हो गई है कि उन्हें देखना होगा कि कहीं उनका संघर्ष राजनीति का पर्याय न बन जाए। उनका विरोध प्रदर्शन दिशा न भटक जाए और सरकार के विरुद्ध विद्रोह न बन जाए। यह भी देखना जरूरी है कि उनका आंदोलन देश द्रोह में न बदल जाए, इसके लिये छात्रों और उनके संगठनों को संयम बरतना जरूरी है। बता दें कि आंदोलन में कुछ वामपंथी छात्र संगठन भी शामिल हैं, जो सरकार के विरुद्ध उग्र दोषारोपण कर रहे हैं, अभी तक छात्रों ने धैर्य और संयम बरता है, परंतु कहीं इनके बहकावे में आकर छात्र भड़कते हैं तथा उग्र होते हैं तो ऐसी सूरत में पुलिस को उनके साथ सख्ती बरतनी पड़ सकती है, जो छात्रों या उनके परिवारों के हित में नहीं होगी।

You may have missed