जे. आर. डी. टाटा, जिन्होंने कैम्ब्रिज जाने का सपना छोड़ भारत को कर्मभूमि बनाया…

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 29 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। फलों से लदे एक विशाल वृक्ष की प्रशंसा तो हर कोई करता है, परंतु उसकी गहराई में जाकर उसकी जड़ों की विशालता का अनुमान लगा पाना बहुत कठिन है। व्यापार जगत में एक ऐसा ही विशाल और मज़बूत वृक्ष है टाटा समूह, जिसकी जड़ें देश से लेकर विदेशों तक में फैली हुई हैं। टाटा कंपनी के बीज जमशेदजी टाटा ने 151 वर्ष पूर्व यानी 1868 में ही बो दिये थे, जो आज एक गुच्छेदार फलों वाला वटवृक्ष बन गया है। जमशेदजी टाटा (1839-1904) भारत के महान उद्योगपति तथा विश्वप्रसिद्ध औद्योगिक थे, जिन्होंने भारत की सबसे बड़ी समूह कंपनी टाटा समूह की स्थापना की। उनका जन्म ब्रिटिश भारत में बृहन्मुंबई में बड़ौदा (अब वडोदरा-गुजरात) के एक छोटे से कस्बे नौशेरी में हुआ था। जमशेदजी टाटा को “भारतीय उद्योग का जनक” कहा जाता है। वह उद्योग जगत में इतने प्रभावशाली थे कि जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें वन-मैन प्लानिंग कमीशन के रूप में संदर्भित किया था। आज हम टाटा कंपनी की स्थापना या उसके विकास की नहीं, अपितु इस कंपनी की तीसरी पीढ़ी के उद्योगपति जे. आर. डी. टाटा यानी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (Jehangir Ratanji Dadabhoy Tata) से परिचित कराने जा रहे हैं, जिन्होंने न केलव टाटा कंपनी को एक अलग पहचान दी, अपितु दुनिया को उड़ना भी सिखाया। जे. आर. डी. टाटा न केवल एक कुशल व्यापारी थे, अपितु भारत के प्रथम लाइसेंस प्राप्त पायलट भी थे। हम जे. आर. डी. टाटा को इसलिए भी याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 26वीं पुण्यतिथि है। टाटा समूह आज अभियांत्रिकी (ENGINEERING), सूचना प्रौद्योगिकी (INFROMATION TECHNOLOGY), संचार (TELECOM), वाहन (VEHICLE), रासायनिक उद्योग (CHEMICAL INDUSTRIES), ऊर्जा (ENERGY), सॉफ्टवेयर (SOFTWARE), होटल (HOTEL), इस्पात (STEEL) एवं उपभोक्ता सामग्री (CONSUMER PRODUCTS) के क्षेत्रों में अपनी सेवाएँ लोगों तक पहुँच रहा है।

जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 को एक पारसी परिवार में जहाँगीर के रूप में हुआ था। वे व्यवसायी रतनजी दादाभाई टाटा और उनकी फ्रांसीसी पत्नी सुज़ैन “सूनी” ब्रेरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत में अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। उनकी 2 बहन Sylla और Rodabeh तथा 2 भाई Darab और Jamshed (Jimmy) थे। फ्रांस में जन्म और माता के फ्रांसिसी मूल की होने के कारण उनकी मूल भाषा फ्रेंच ही रही। जे. आर. डी. टाटा ने पेरिस के जानसन डी सेलली स्कूल में पढ़ाई की। स्कूल में उन्हें एक शिक्षक L’Egyptian कहते थे। जे. आर. डी. टाटा की बाकी की शिक्षा शिक्षा लंदन, जापान, फ्रांस और भारत में हुई। फ्रांस के नागरिक के रूप में जे. आर .डी. टाटा को कम से कम 1 वर्ष के लिए सेना में भर्ती होना पड़ा। फ्रांसीसी सेना में शामिल होने के बाद वह Spahis (The Sepoys) नामक रेजिमेंट में तैनात किये गये। जे. आर. डी. टाटा को फ्रेंच और अंग्रेजी पढ़ने, लिखने के साथ-साथ टाइप करना भी आता था, जिसके चलते उन्हें फ्रांस के स्क्वॉड्रन कर्नल ने अपने कार्यालय में सचिव की नौकरी दे दी।

फ्रांस की सेना में 12 महीने की संधि के बाद वह आगे की शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज जाना चाहते थे, पंरतु उनके पिता ने उन्हें टाटा कंपनी में शामिल कर लिया। जे. आर. डी. टाटा 1925 में ‘TATA & SONS’ में एक अप्रेंटिस के रूप में भर्ती हुए, इस काम के लिए उन्हें पैसे भी नहीं मिलते थे। 1938 में जब वह मात्र 34 वर्ष के थे, उन्हें भारत के सबसे बड़े इंडस्ट्रीयल ग्रुप ‘टाटा एंड संस’ का चेयरमैन चुना गया। 1929 में जे. आर. डी. टाटा ने अपनी फ्रांसीसी नागरिकता त्याग दी और भारतीय नागरिक बन कर टाटा कंपनी में करने लगे। 1930 में जे. आर. डी. टाटा ने थेल्मा विकाजी से विवाह कर लिया, जो उनकी टाटा कंपनी में काम करती थीं। उसी दौरान जे. आर. डी. टाटा अपने एक मित्र के पिता लुईस ब्लेयर से काफी प्रेरित थे, क्योंकि वह अंग्रेजी चैनल पर उड़ान भरने वाले प्रथम व्यक्ति थे। एवियेशन की दुनिया में लुईस ब्लेरियात काफी प्रसिद्ध थे। 10 फरवरी 1929 को जे. आर. डी. टाटा ने भारत में प्रथम पायलट लाइसेंस प्राप्त किया और उन्हें भारतीय नागरिक उड्डयन के पिता के रूप में जाना जाने लगा। यह पहला मौका था, जब भारत में किसी व्यक्ति को वाणिज्यिक पायलटका लाइसेंस जारी किया गया था। जेआरडी टाटा एयर इंडिया के परिचालन के मामले में इतने सूक्ष्म स्तर पर निगाह रखते थे कि एक बार उन्होंने क्रू मेंबर्स के साथ टॉयलेट भी साफ किया था। अगर वो एयर इंडिया के काउंटर पर धूल देख लेते, तो तुरंत अपने हाथों से साफ करने में भी नहीं हिचकिचाते थे। वे हर चीज़ पर निगाह रखते थे। चाहे वो प्लेन के भीतर का डेकोरेशन हो या एयर होस्टेस की साड़ी का रंग या फिर एयर इंडिया की होर्डिंग, सब पर अपनी निगाह रखते थे। उन्होंने 1932 में भारत की पहली वाणिज्यिक एयरलाइन, टाटा एयरलाइंस की स्थापना की, जो 1946 में एयर इंडिया बन गई, जो अब भारत की राष्ट्रीय एयरलाइन है। 1932 में टाटा एविएशन सर्विस, टाटा एयरलाइन और एयर इंडिया के अग्रदूत को आसमान में ले गई।

जे. आर. डी. टाटा के नेतृत्व में टाटा कंपनी 100 मिलियन (7,17,05,50,000.00 Indian Rupee) से 5 बिलियन (3,58,52,25,00,000.00 Indian Rupee) यूएस डॉलर पर पहुँच गई। उनके मार्गदर्शन में 1941 में ‘टाटा मेमोरियल सेंटर फ़ॉर कैंसर रिसर्च एंड ट्रीटमेंट’ की स्‍थापना की गई। यह एशिया में अपने तरह का पहला कैंसर का अस्पताल था। उन्होंने भारत की शिक्षा के आधारभूत ढाँचे को विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज’, ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च’, और ‘नेशनल सेंटर फ़ॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स’ की भी स्‍थापना की। 26 जुलाई, 1988 को उन्होंने जब पद छोड़ा, तब तक 95 कंपनियाँ इस समूह का हिस्‍सा बन चुकी थीं। टाटा की भागेदारी केलव एविएशन और उद्योग तक ही सीमित नहीं था। जन कल्याण में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट’ की शुरुआत से वह इसके ट्रस्टी रहे। जे. आर. डी. टाटा अपने नैतिक मूल्य और उच्‍च आदर्श के लिए उद्योग जगत में विख्यात थे, उन्होंने कभी भी राजनीतिज्ञों को रिश्वत देने या काला बाज़ारी का पक्ष नहीं लिया और वे इससे सदैव दूर ही रहे।

1954 में फ़्राँस ने उन्हें अपने सर्वोच्‍च नागरिकता पुरस्कार ‘लीजन ऑफ द ऑनर’ से नवाजा। 1957 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से अलंकृत किया। 1988 में उन्हें ‘गुगेन‌हीम मेडल फॉर एवियेशन’ प्रदान किया गया। 1992 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्‍च अलंकरण ‘भारत रत्न’ से सम्‍मानित किया। उसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ ने उन्हें भारत में जनसंख्या नियंत्रण में अहम योगदान देने के लिए ‘यूनाइटेड नेशन पापुलेशन आवार्ड’ से सम्‍मानित किया। जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष 29 नवम्बर, 1993 में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। उन‌की मृत्यु पर संसद ने अपनी कार्यवाही स्थगित कर दी थी। यह एक ऐसा सम्मान था, जो आमतौर पर केवल सांसदों को ही दिया जाता है। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में ही दफ़नाया गया। भारत के प्रसिद्ध उद्योगपतियों और आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक व्यक्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है।

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