वीर शहीद खुदीराम बोस की 130वीं जयंती : जिसे खुदीराम मारना चाहते थे, वो अंग्रेज डर से ही मर गया

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 3 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। वीर शहीद खुदीराम बोस की मंगलवार को 130वीं जन्म जयंती है। खुदीराम बोस एक ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने फाँसी की सज़ा सुन कर भी मुस्कराकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी और जिस दिन उन्हें फाँसी दी गई, उस दिन सुबह भी वो न सिर्फ हँस रहे थे बल्कि फाँसी देने के लिये ले जाने आए जेलर समेत जेल प्रशासन के अधिकारियों को भी खूब हँसाया था। खुदीराम बोस मात्र 18 वर्ष की उम्र के एक नौजवान थे, जो हँसते हुए फाँसी के फंदे पर झूल गये थे। उनकी फाँसी ने पूरे देश में देश भक्ति और क्रांति की नई अलख जगा दी थी। इस अलख ने 39 साल में देश को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद घोषित करवा लिया। 11 अगस्त-1908 को खुदीराम बोस को फाँसी दी गई थी, इसके बाद 15 अगस्त-1947 को देश आज़ाद हुआ था। वीर शहीद खुदीराम बोस के बारे में अनेक किस्से प्रचलित हैं, परंतु हम जिस किस्से की बात कर रहे हैं, वह उनकी शहादत से ही जुड़ा हुआ है। वीर शहीद खुदीराम बोस को जिस जज पर बम फेंकने के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई गई थी, उस जज के जहन में इस कदर अपनी मौत का डर बैठ गया था, कि इस घटना के बाद उसने न सिर्फ जज की नौकरी छोड़ दी, बल्कि इसी डर ने उसकी जान भी ले ली थी।

वीर शहीद खुदीराम बोस के बारे में…

आज से 130 साल पहले यानी 3 दिसंबर-1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी गाँव में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस और उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मीप्रिया देवी के यहाँ खुदीराम बोस का जन्म हुआ था। खुदीराम बोस बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों वाले थे और जब वे कक्षा 9 में थे, तब उन्हें अपने देश को ग़ुलामी से आज़ाद कराने की ऐसी धुन लगी कि उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और बाल्यकाल में ही स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। स्कूल छोड़कर वे ‘युगांतर’ नामक क्रांतिकारियों की एक गुप्त संस्था से जुड़ गये थे और उसकी तरफ से ‘वंदे मातरम्’ लिखे पेम्फलेट्स वितरण करते थे। 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाए गये आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

जज किंग्सफोर्ड को मारने की बनी योजना

1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया और उसके विरोध में लोग सड़कों पर उतरे तो आंदोलनकारियों को कोलकाता के तत्कालीन मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया था। कई अन्य मामलों में भी वह क्रांतिकारियों को कष्टदायी दंड देकर उत्पीड़न देता था। इसके परिणाम स्वरूप एक तरफ अंग्रेज हुकूमत ने किंग्सफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश नियुक्त किया, वहीं दूसरी ओर युगांतर समिति की बैठक में किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई गई। इस काम के लिये खुदीराम बोस और प्रफुल्लकुमार चाकी को चुना गया था। खुदीराम को एक बम और एक पिस्तौल दी गई थी, जबकि प्रफुल्लकुमार को केवल पिस्तौल दी गई थी। दोनों ने मुजफ्फरपुर आकर किंग्सफोर्ड को मारने के लिये उसके बंगले की रेकी की और उसकी खास बग्गी तथा उसके घोड़े का रंग देख कर बग्गी में घर से दफ्तर के लिये निकलने पर या ऑफिस से घर के लिये निकलने के दौरान ही मौका देखकर बग्गी पर बम फेंक कर उसकी हत्या करने का निश्चय किया था। इसके लिये खुदीराम ने उसके दफ्तर की भी रेकी की थी। रेकी करने के बाद 30 अप्रैल-1908 को अपनी योजना को अंजाम देने के लिये दोनों बाहर निकले थे। इस दिन रात के समय किंग्सफोर्ड क्लब गया था और वहाँ से रात को 8.30 बजे किंग्सफोर्ड की बग्गी और घोड़े से मिलती-जुलती दूसरी बग्गी निकली तो दोनों इस बग्गी के पीछे पड़ गये। यह बग्गी भी किंग्सफोर्ड के बंगले के रास्ते पर ही आगे बढ़ रही थी, इससे दोनों ने मान लिया कि इसी बग्गी में किंग्सफोर्ड सवार है। जैसे ही यह बग्गी किंग्सफोर्ड के बंगले के पास पहुँची तो खुदीराम ने उस पर बम फेंक दिया। किंग्सफोर्ड का यह सदभाग्य था कि वह इस बग्गी में नहीं था और खुदीराम व उनके साथी का यह दुर्भाग्य था कि इस बग्गी में किंग्सफोर्ड नहीं था। इस हमले में दो यूरोपियन महिलाओं की मृत्यु हो गई। अंग्रेज पुलिस दोनों को पकड़ने के लिये उनके पीछे भागी तो दोनों रात के अंधेरे में नंगे पाँव लगभग 24 मील तक भागते चले गये। अंततः वैनी रेलवे स्टेशन पर पुलिस ने दोनों को घेर लिया। खुद को घिरा पाकर प्रफुल्लकुमार चाकी अपनी पिस्तौल से खुद को गोली मार कर शहीद हो गये, परंतु खुदीराम ने ऐसा नहीं किया। इसलिये वे पकड़े गये। इसके बाद मुजफ्फरपुर की अदालत में उन्हें फाँसी की सज़ा दी गई, तब खुदीराम मुस्कराए तो जज को लगा कि 18 वर्ष के इस नौजवान को कदाचित सज़ा समझ में नहीं आई है। इसलिये जज ने उनसे पूछा कि क्या तुम्हें पता है कि क्या सज़ा सुनाई गई है। खुदीराम ने मुस्कराकर जवाब दिया कि अभी भी मेरे पास इतना समय बचा है, जिसमें मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूँ। जज ने भी कहा कि खुदीराम बोस एक निर्भीक क्रांतिकारी थे। जब 11 अगस्त-1908 की सुबह उन्हें फाँसी दी जाने वाली थी, उससे पहले की रात जेलर ने खुदीराम को खाने के लिये 4 आम दिये थे। सुबह जेलर फाँसी देने के लिये उन्हें लेने आया तो उसने देखा कि आम तो रखे हुए हैं। उसने खुदीराम से पूछा, तुमने आम नहीं खाए। खुदीराम ने कहा, जो व्यक्ति मरने वाला हो, उसे खाना-पीना अच्छा लगता है क्या ? इसके बाद जेलर ने आम वापस लेने के लिये आम उठाने का प्रयास किया तो उसके हाथ आम के छिलके लगे, जो खुदीराम ने आम की तरह ही फुलाकर रख दिये थे। जब जेलर के हाथ छिलके आये तो खुदीराम अटहास के साथ हँस पड़े और उनके साथ जेलर के साथी अधिकारी भी हँस पड़े। जेलर यह देखकर सन्न रह गये कि जिसे अभी कुछ देर में फाँसी होने वाली है, वह लड़का इतना बेफिक्र कैसे हो सकता है और हँस कैसे सकता है ? इतना ही नहीं, जब खुदीराम को फाँसी दी गई, तब भी उनके हाथ में भगवद गीता थी और वे हँसते हुए फाँसी के फंदे पर झूल गये थे।

दूसरी ओर मुजफ्फरपुर के जज किंग्सफोर्ड को यह सुन कर इतना गहरा सदमा लगा था कि जो बम दो यूरोपियन महिलाओं की बग्गी पर फेंका गया, वो बम उनकी बग्गी के लिये था, जिसमें उनके शरीर के चीथड़े उड़ने वाले थे। यह सोच कर कि उसने जिन क्रांतिकारियों को कष्ट दिया था, वे उसकी जान के पीछे पड़े हैं, वो इतना डर गया कि उसने जज की नौकरी छोड़ दी। बाद में इसी डर से कुछ ही समय में उसकी मृत्यु भी हो गई थी।

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