जल और फल से चित्त कीजिए चमकी को : जानलेवा नहीं, जान लेना जरूरी है !

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 20 जून 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। बिहार में मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के जिलों में आजकल एक बीमारी ने बच्चों पर कहर बरपाया हुआ है। सामान्य भाषा में ‘चमकी बुखार’ के नाम से पहचानी जाने वाली इस बीमारी ने अब तक 1 से 15 साल तक की उम्र के लगभग 135 बच्चों की जान ले ली है। सैकड़ों बच्चे अभी भी अस्पताल में उपचाराधीन हैं। यह बीमारी इस कदर बच्चों में मौत बाँट रही है कि चमकी के नाम से भी लोग सिहर उठते हैं और बच्चों को सामान्य बुखार आने पर भी घबरा जाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह चमकी बुखार है क्या और इससे कैसे बचा जा सकता है ? तो आइये जानते हैं इस बीमारी के बारे में…

एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (चमकी बुखार)

डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी रहस्यमयी बनी हुई है और इसे लेकर रिसर्च चल रही है। डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी से होने वाली मौतों में कई प्रकार की बीमारियाँ सामने आई हैं और इसी कारण इस बीमारी को एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम नाम दिया गया है। इसमें पाँच से छह प्रकार की बीमारियाँ सामने आई हैं, जिनके कारण पीड़ित बच्चों की मौत हो रही है। चिकित्सकों के अनुसार इस बीमारी से पीड़ित बच्चे को तेज बुखार आता है, जिससे शरीर में अकड़न या ऐंठन होती है। जैसे मिर्गी का दौरा पड़ता है, कुछ इसी तरह से इस बीमारी में बच्चा काँपने लगता है। इसलिये सामान्य बोलचाल की भाषा में इस चमकी बुखार कहने लगे हैं।

सामान्य रूप से मस्तिष्क ज्वर या दिमागी बुखार के रोगियों में जो लक्षण पाये जाते हैं, वैसे ही लक्षण चमकी बुखार के पीड़ित बच्चों में भी पाये जाते हैं, परंतु चमकी की चपेट में बच्चों में वायरस नहीं पाया गया है, बल्कि इनके ब्लड में शुगर की कमी पाई गई है।

चिकित्सकों के अनुसार गुजरात और राजस्थान जैसे इलाकों में सर्दियों में जैसे स्वाइन फ्लू कहर बरपाता है, वैसे ही बिहार और उससे जुड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश में गर्मी की सीज़न में यह चमकी बुखार हर साल सिर उठाता है और सैकड़ों बच्चों की जान लेता है। डॉक्टरों की मानें तो चमकी बुखार जान लेवा नहीं है, परंतु लापरवाही और जागरूकता का अभाव बच्चों की मौत का कारण बन रहे हैं। प्राथमिक उपचार केन्द्रों और सामूहिक उपचार केन्द्रों में इस बीमारी के उपचार की पूरी व्यवस्था है, परंतु लोगों की लापरवाही और जागरूकता के अभाव ने इस बीमारी को भयावह बना दिया है।

इस बीमारी में अनेक प्रकार के संक्रमण शामिल होते हैं और यह छोटे बच्चों को प्रभावित करते हैं, जिससे बच्चा मस्तिष्क ज्वर या मस्तिष्क में हुए इंफेक्शन से ग्रसित हो जाता है। मस्तिष्क का इंफेक्शन, मस्तिष्क में मलेरिया और दिमागी बुखार से बच्चा पीड़ित हो जाता है, जिसके कारण उसके ब्लड में शुगर की कमी हो जाती है और ब्रेन डेमेज होने लगता है, जिससे बच्चे की मौत हो जाती है।

चिकित्सकों के अनुसार गर्मी और चमकी बुखार का आपस में सीधा सम्बंध है। जो बच्चे गाँवों में भरी दोपहर में खाने-पीने की परवाह किये बिना नंगे पाँव और कपड़े पहने बिना नंग-धड़ंग गली-मोहल्लों में या खेत-खलिहानों में घूमते-फिरते हैं, वह सूर्य की सीधी किरणों की चपेट में आकर हीट स्ट्रोक का शिकार होते हैं। इससे उनके शरीर और खासकर सिर में पानी की कमी हो जाती है, जिससे वह दिमागी बुखार की गिरफ्त में आ जाते हैं। इसके बाद उनके परिवार वालों की लापरवाही और जागरूकता का अभाव बीमारी को बच्चों के लिये घातक बना देते हैं। इस बीमारी में एक जो महत्वपूर्ण बात सामने आई है वह ये कि जो बच्चे इसके शिकार हुए हैं, वह कुपोषण के शिकार हैं, गरीब हैं तथा गाँवों में रहने वाले हैं। इस अज्ञात बीमारी से मरने वालों में शहर का कोई बच्चा शामिल नहीं है।

बच्चों का टीकाकरण कराना जरूरी

डॉक्टरों ने यह भी कहा कि इस बीमारी से बचाव का एक तरीका यह भी है कि बच्चों का टीकाकरण करवाया जाए। सरकारी अस्पतालों में टीका उपलब्ध हैं, जिन्हें इस बीमारी के प्रभावित इलाकों में जाकर बच्चों को जरूर देना चाहिये। इससे इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। इसके अलावा लोगों में जागरूकता फैलाने की भी जरूरत है। लोगों को टीकाकरण के लिये भी प्रेरित करना होगा। टीकाकरण और बच्चों पर ध्यान देकर, बीमार होने पर उन्हें तुरंत इलाज मुहैया कराने से इस बीमारी से बचा जा सकता है।

चमकी का लीची से रिश्ता !

इस बीमारी का लीची नामक फल से भी सम्बंध जोड़ा जा रहा है। लंदन के एक मेडिकल जर्नल ‘दी लैन्सेट’ में प्रकाशित एक शोध के बाद इस बीमारी का लीची से सम्बंध जोड़ा गया है। इस जर्नल में कहा गया है कि लीची में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ हाइपोग्लाइसीन-ए तथा मिथाइल इनसाइक्लोप्रोपीलग्लाइसीन जो कि अधपकी लीची में पाया जाता है, यह दोनो ही रसायन पूरे पके हुए लीची के फल में कम हो जाते हैं। परंतु बच्चे अधपके लीची खाकर इन रसायनों को शरीर में उतार लेते हैं, जो शरीर में पहुँचकर फैटी एसिड मेटाबॉलिज्म बनने में रुकावट पैदा करते हैं। इससे खाली पेट अधपकी लीची खाने से शरीर में ब्लड शुगर अचानक कम हो जाता है। विशेषकर रात का खाना न खाने के कारण जब शरीर में ब्लड शुगर का लेवल पहले से ही कम हो और सुबह खाली पेट लीची खा लेने से चमकी बुखार का खतरा बढ़ जाता है। हालाँकि केवल लीची ही इस बीमारी की एकमात्र वजह नहीं है।

चमकी बुखार के लक्षण

चमकी बुखार का मौसम के साथ गहरा सम्बंध है। जैसे-जैसे गरमी बढ़ती है, वैसे-वैसे इस रोग का प्रकोप और दायरा भी बढ़ता है। जैसा कि ऊपर कह चुके हैं, बच्चों को बुखार आने पर सबसे पहले बिना कोई लापरवाही बरते तुरंत अस्पताल ले जाकर इलाज करवाने से यह बीमारी जानलेवा नहीं बन पाती है। इस बीमारी में बच्चे को तेज बुखार आता है। बुखार आने पर शरीर अकड़ जाता है या शरीर में ऐंठन हो जाती है। बच्चा बेसुध हो जाता है। बच्चे चमकने लगते हैं और काँपने लगते हैं। शरीर पर चकत्ते पड़ जाते हैं। इससे शरीर में ग्लूकोज़ की कमी हो जाती है और ब्लड में शुगर कम हो जाती है। इससे बुखार दिमाग पर कब्जा जमा लेता है। इस बुखार के प्रभाव से और ब्लड शुगर की कमी से दिमाग डेमेज होने लगता है, जिससे बच्चे की मौत हो जाती है।

चमकी बुखार से बचने के उपाय

चमकी बुखार से बच्चों को बचाने के उपाय बिल्कुल सामान्य हैं। इन्हें आसानी से और कोई भी इस्तेमाल कर सकता है। बच्चों को खाली पेट न रखें और खाली पेट लीची जैसे फल न खाने दें। रात को खाने के बाद कुछ मीठा जरूर खिलाएँ। बच्चों को धूप में खेलने न जाने दें और गरमी में शरीर खुला रखकर धूप में न जाने दें। पूरी बाँह के कपड़े और पैरों में जूते या चप्पल जरूर पहनाएँ। गरमी में बच्चों के शरीर में पानी की कमी न हो, इसलिये उन्हें खूब पानी पिलाएँ और संभव हो तो रसीले फलों के ज्यूस पिलाएँ। बच्चों को हलका और सामान्य भोजन कराएँ, जंकफूड से दूर रखें। घर के आसपास पानी जमा न होने दें और जमा हुए पानी में कीटनाशक का छिड़काव करें। रात को सोते समय बच्चों को मच्छरों से बचाने के लिये मच्छरदानी का उपयोग करें। बच्चों को सड़े-गले फल न खानें और रसीले तथा ताजा फल ही खिलाएँ। इन उपायों से बच्चों को चमकी तथा अन्य मौसमी बीमारियों से बचाकर स्वस्थ रखा जा सकता है।

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