भारत की इस ‘दिव्यता’ से चमक रही दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कम्पनी ! जानिए इनके बारे में सब कुछ

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 23 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। भारतीय मूल की बहुत सारी महिलाओं ने विश्व के विभिन्न देशों में उच्च पदों पर पहुँचकर दुनिया में भारत का गौरव बढ़ाया है। हाल ही में देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) अंशुला कांत ने दुनिया के सबसे बड़े विश्व बैंक में प्रबंध निदेशक (MD) और चीफ फाइनांसियल ऑफीसर (CFO) का पद प्राप्त करके भारत का गौरव बढ़ाया। इसी प्रकार यदि निजी क्षेत्र की बात करें तो दिव्या सूर्यदेवरा का नाम सबसे ऊपर आता है, जिन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी जनरल मोटर्स में प्रथम महिला सीएफओ का पद प्राप्त करके अपना कद तो ऊँचा किया ही है, भारत का भी गौरव बढ़ाया है।

कौन हैं दिव्या सूर्यदेवड़ा ?

दिव्या सूर्यदेवड़ा भारतीय मूल की महिला हैं, जिनकी शिक्षा चेन्नई में हुई। चेन्नई में उन्होंने अर्थशास्त्र से स्नातक और पर-स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वह 22 साल की उम्र में ही अमेरिका चली गईं और वहाँ की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वहाँ से एमबीए करने के बाद वह निवेशक बैंक यूबीएस से जुड़ी और इसके बाद 25 साल की उम्र में 2005 में वह अमेरिका की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी जनरल मोटर्स से जुड़ गई थी। उन्हें 2018 में जनरल मोटर्स में पहली महिला मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) नियुक्त किया गया है, उन्होंने 1 सितंबर-2018 से यह पद संभाला हुआ है। सीएफओ बनने से पहले तक दिव्या ने कंपनी में ऑटोमैटिक ड्राइविंग व्हिकल स्टार्ट-अप क्रूज़ के अधिग्रहण समेत कई महत्वपूर्ण सौदों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जनरल मोटर्स की सीईओ (CEO) मेरी बर्रा के अनुसार दिव्या को बहुत अच्छी वित्तीय जानकारी है और उन्होंने कई मामलों में अच्छा नेतृत्व और प्रदर्शन किया है। दिव्या की मदद से ही जापान की प्रमुख वित्तीय कंपनी सॉफ्ट बैंक ने 2.25 बिलियन डॉलर का जनरल मोटर्स में निवेश किया था। इससे पहले भी दिव्या ने कई मामलों में अपनी प्रमुख और मुखर भूमिका निभाई थी।

2016 में ऑटोमोटिव न्यूज़ राइज़िंग स्टार घोषित हुईं

2016 में दिव्या सूर्यदेवड़ा ऑटोमोटिव न्यूज़ राइज़िंग स्टार घोषित हुईं। 2017 में वह 40 वर्ष से कम उम्र की सफल बिज़नेस वुमन का खिताब जीतीं। रियल सिंपल डॉट कॉम को दिये एक इंटरव्यू में दिव्या ने कहा था कि उनका जीवन काफी संघर्षों के बीच गुजरा है। वह बहुत कम उम्र की थी, जब उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी मां ने कठिनाइयों से अपनी तीन संतानों की परवरिश की, लेकिन उन्होंने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी नहीं रखी। माता की उम्मीदों ने उन्हें लगातार प्रेरित किया। उनकी माता ने उन्हें यह सीख भी दी थी कि कुछ भी आसानी से नहीं मिलता है। कोई भी लक्ष्य प्राप्त करने के लिये कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। जब वह भारत में अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके अमेरिका पहुँची थी तो यहाँ उन्हें सबसे पहले कल्चर शॉक का सामना करना पड़ा था। उस समय हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल ऐसे लोगों को ही प्रवेश देता था, जिनके पास वर्क एक्सपीरियंस हो। उन्होंने कॉलेज के दिनों में काम किया था, परंतु कॉलेज से निकलकर सीधे यहाँ पहुँच गई थी। पढ़ाई के दिनों को याद करते हुए दिव्या ने बताया कि उनके दोस्त स्कूल ट्रिप पर जाते थे, परंतु उनके लिये ऐसा करना बिल्कुल भी संभव नहीं था, क्योंकि उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे। उन्होंने विदेश में पढ़ाई के लिये कर्ज लिया था, जो उन्हें पढ़ाई पूरी होने के बाद चुकाना था। ऐसे में उन्हें पढ़ाई के बाद नौकरी ढूँढनी थी। दिव्या बताती हैं कि वह अपने दिलो-दिमाग को शाँत रखने के लिये कसरत करती हैं और इसके लिये उन्हें बॉक्सिंग बहुत पसंद है। वह अपनी बेटी के साथ समय बिताती हैं। उन्हें अपनी बेटी को स्कूल ले जाना अच्छा लगता है।

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