धर्म-अध्यात्म का जानकार ‘रामचंद्र’ कैसे बना नाथूराम और क्यों गोडसे के रूप में ‘कुख्यात’ हुआ ? जानिए पूरी कहानी

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 28 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। कोई भी व्यक्ति जब कोई कर्म करता है, तो उस पर तीन गुणों में से किसी एक गुण का सर्वोच्च प्रभाव होता है। यदि सात्विक गुण की प्रधानता है, तो व्यक्ति अच्छे-पुण्यशाली काम करता है, राजसिक गुणों की प्रधानता व्यक्ति से ‘करने-न करने’ योग्य यानी पाप-पुण्य दोनों ही काम कराती है और जब तामसी गुण प्रधान होता है, तो व्यक्ति केवल और केवल पाप कर्म करता है। तामसी गुण के अभाव में पाप कर्म करना संभव ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि इन तीनों प्रकार के कर्म करने वाला व्यक्ति सदैव अलग-अलग ही हो। चूँकि प्रत्येक व्यक्ति में ये तीनों गुण सदैव विद्यमान रहते हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति न तो पूर्ण रूप से पुण्यशाली होता है और न ही पूर्ण रूप से सदाचारी। अच्छे काम करने वालों से भी ख़राब काम हो जाते हैं और ख़राब काम करने वाले भी कभी-कभी अच्छे काम कर जाते हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी है नाथूराम गोडसे की, जो भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर के लोकसभा में दिए गए एक वक्तव्य के कारण फिर एक बार चर्चा के केन्द्र में है। वास्तव में भावनाओं का आवेग सदैव हानिकारक होता है। इसी आवेग ने भारतीय इतिहास में नाथूराम गोडसे को युगपुरुष महात्मा गांधी का हत्यारा बनाया और यही आवेग साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भी गोडसे को देशभक्त कहने के लिए प्रेरित करता है। गोडसे देशभक्त था या नहीं ? इसका निर्णय न ठाकुर कर सकती है और न ही कोई और। यह तो गोडसे ही भली-भाँति जानता था कि उसने जो किया, वह पाप था या पुण्य ? भारत सहित पूरे विश्व की दृष्टि तथा क़ानून की दृष्टि में गोडसे नि:संकोच हत्यारा था अर्थात् उसने गांधीजी को मार कर पाप किया था और उसे उसका दंड भी मिला। उलझन और विवाद तब पैदा होते हैं, जब प्रत्यक्ष रूप से पापी दिखाई देने वाले-घोषित हो चुके गोडसे को कोई अपने निजी आवेग के चलते देशभक्त की संज्ञा दे देता है।

मन्नतों जन्मा ‘रामचंद्र’ इस तरह बना नाथूराम

नाथूराम गोडसे ने कदाचित अपने पूरे जीवनकाल में अनेक पुण्य कार्य किए होंगे और अनेक पाप कर्म भी किए होंगे, परंतु उसका 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या करना सबसे बड़ा पाप कर्म बन गया। यह ऐसा पाप था, जजो गोडसे के सभी अच्छे कर्मों, उच्च विचारधारा, हिन्दुत्व का पक्ष लेने की भावना आदि पर भारी पड़ा। गोडसे को भारत जब भी याद करेगा, तो उसे सत्य-अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के हत्यारे के रूप में ही याद करेगा और करना भी चाहिए, परंतु 30 जनवरी, 1948 से थोड़ा पीछे यानी 38 वर्ष पूर्व की ओर जाएँ, तो गोडसे का जन्म बड़ी मन्नतों के बाद हुआ था। महाराष्ट्र के नाशिक में रहने वाले और डाक घर में काम करने वाले वामनराव गोडसे और उनकी पत्नी लक्ष्मी गोडसे ने नाथूराम से पूर्व चार संतानों तीन पुत्रों व एक पुत्री को जन्म दिया, परंतु तीनों पुत्रों की मृत्यु हो गई। धार्मिक मान्यताओं में विश्वास रखने वाले गोडसे दम्पति को लगा कि उनकी पुरुष संतानों पर ईश्वर का श्राप है। इसीलिए दोनों ने ईश्वर के समक्ष मन्नत रखी कि अब यदि उन्हें कोई पुत्र होगा, तो वे उसे पुत्री (लड़की) की तरह पालेंगे। मन्नत फली और लक्ष्मी गोडसे ने 19 मई, 1910 को पुत्र को जन्म दिया। इस पुत्र का नाम रामचंद्र रखा गया, परंतु मन्नत के अनुसार रामचंद्र का लालन-पालन लड़की की तरह करना था। इसलिए रामचंद्र की नाक बचपन में ही छिदवा दी गई और नाक में नथ भी पहना दी गई। बालक रामचंद्र की नाक में हमेशा यह नथ रहती थी और इसी नथ के कारण रामचंद्र को लोगों ने नाथूराम बुलाना शुरू कर दिया।

धर्म-अध्यात्म की छाया में नाथूराम का मानस निर्माण

ब्राह्मण परिवार में जन्मे नाथूराम का बचपन धार्मिक कार्यकलापों के बीच बीत रहा था। नाथूराम स्वयं धार्मिक कार्यों में गहरी रुचि रखता था। नाथूराम बचपन से ही ध्यानावस्था में ऐसे-ऐसे श्लोक बोल जाता था, जो उसने कभी पढ़े ही नहीं थे। ब्राह्मण परिवार के धार्मिक क्रियाकांडों के चलते नाथूराम के मन में कुलदेवी का आविर्भाव भी हुआ करता था, जिसे साधारण भाषा में ‘माता आना’ कहते हैं, परंतु 16 वर्ष की आयु में नाथूराम को अध्यात्म की शिक्षा ने बहुत कुछ सिखा दिया और कुलदेवी का आविर्भाव स्वत: समाप्त हो गया। नाथूराम ने पुणे में प्राथमिक शिक्षा ली, परंतु हाईस्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, क्योंकि नाथूराम का झुकाव धर्म और अध्यात्म की ओर अधिक था। इसीलिए उसने रामायण, महाभारत, गीता, पुराणों का गहरा अध्ययन किया। इतना ही नहीं, नाथूराम ने किशोरावस्था में ही भारत के तत्कालीन आधुनिक महापुरुषों स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक और यहाँ तक कि उस महात्मा गांधी के साहित्य का भी अध्ययन किया, जिनकी हत्या के कारण वह आज भी भारत व भारतीयों के लिए घृणा का पात्र बना हुआ है। धर्म-अध्यात्म की छाया में नाथूराम का मानस निर्माण हो रहा था, परंतु कहीं न कहीं नाथूराम की दिशा भटकी हुई थी। उसने धर्म ग्रंथों और महापुरुषों के जीवन चरित्र से केवल क्रांतिकारी विचारों को ही उठाया, जो अन्याय का विरोध करना सिखाते हैं, परंतु उसने उन्हीं धर्म ग्रंथों और महापुरुषों के जीवन चरित्र से यह नहीं सीखा कि अन्याय का न्यायपूर्ण सामना कैसे करना चाहिए और इसी कमी ने गोडसे को विद्रोही बना दिया।

धर्म की रक्षा करते हुए विवेक को भुला दिया

नाथूराम गोडसे क्रांतिकारी विचारों के साथ सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में शामिल हुआ, परंतु 1930 में उसने संघ भी छोड़ दिया। वास्तव में वर्ष 1930 भारत के लिए एक ऐसा दौर था, जब जहाँ एक ओर स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था, वहीं दूसरी ओर मुहम्मद अली ज़िन्ना अपनी अलगाववादी विचारधारा से भारत में हिन्दू-मुस्लिम समाज के बीच नफ़रत पैदा कर रहे थे और पाकिस्तान के बीज बो रहे थे। यही कारण था कि तत्कालीन परिस्थितियों ने धर्म-अध्यात्म के ज्ञाता नाथूराम को प्रखर हिन्दुत्ववादी बनने के लिए प्रेरित किया और वह अखिल भारतीय हिन्दू महासभा में शामिल हो गया। इस दौरान उसने ‘अग्रणी’ तथा ‘हिन्दू राष्ट्र’ नामक दो समाचार पत्रों का सम्पादन भी किया। ज़िन्ना की अलगाववादी विचारधारा के पनपने से पहले तक गोडसे के जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। उसके मन में भी अंग्रेजों के विरुद्ध वही ज्वाला थी, जो गांधीजी के मन में थी। यही कारण है कि गोडसे एक समय गांधीजी का समर्थक था। उनके कार्यक्रमों और आंदोलनों का समर्थक था, परंतु जब ज़िन्ना की अलगाववादी विचारधारा हावी होने लगी, तब गोडसे ने व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव किया कि महात्मा गांधी हिन्दू-मुस्लिम एकता बनाए रखने के लिए केवल हिन्दुओं से बलिदान मांग रहे हैं। गांधीजी ने ज़िन्ना की आवाज़ दबाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया, परंतु गोडसे को ग़लतफ़हमी हुई कि गांधीजी एकता के नाम पर हिन्दुओं के साथ भेदभाव कर रहे हैं। इसी विचार ने गोडसे के मन में गांधी के प्रति द्वेष भरा और अंतत: गोडसे ने उनकी हत्या कर दी।

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