जानिए उस ‘नरेश’ को, जिन्होंने ‘नरेन्द्र’ को स्वामी विवेकानंद बनाया

* शिकागो धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक सनातनी भाषण की 126वीं वर्षगांठ पर विशेष

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 11 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज 11 सितंबर है। पूरा भारत गौरव के साथ इस तिथि को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाता है। यही वह तारीख़ थी, जब मात्र 30 वर्ष के एक भारतीय युवक ने भारत के अध्यात्म से परिपूर्ण वेदांत दर्शन को अमेरिका-यूरोप सहित पूरे विश्व तक पहुँचाया। 11 से 16 सितंबर, 1893 के दौरान अमेरिका में आयोजित प्रथम विश्व धर्म संसद में जाने से पहले जो युवक मूल नाम नरेन्द्रनाथ दत्त से लेकर धार्मिक नाम सच्चिदानंद आदि के रूप में पहचाना जाता था, वह युवक शिकागो की इस धर्म संसद में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद का नाम धारण करके पहुँचा।

12 जनवरी, 1863 को ब्रिटिश साम्राज्य के बंगाल राज्य में कलकत्ता में विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के घर जन्मे बालक का नाम नरेन्द्रनाथ रखा गया था। घर में ही धार्मिक वातावरण के चलते नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते चले गए। यही कारण है कि नरेन्द्र के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा ने जन्म लिया। उनके प्रश्नों के आगे माता-पिता से लेकर बड़े-बड़े कथावाचक पंडित भी चक्कर में पड़ जाते थे। 8 वर्ष की आयु में नरेन्द्र ने शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में पदार्पण किया और इस यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहे दक्षिणेश्वर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस। फिर क्या था। नरेन्द्र पहुँच गए रामकृष्ण परमहंस के पास, जिन्हें माँ काली साक्षात् थीं और जिनके बारे में माना जाता था कि वे परमात्मा से एकाकार हो चुके हैं। नरेन्द्र ने रामकृष्ण परमहंस के सामने सीधे ही पूछ लिया, ‘‘क्या आपने भगवान को देखा है ?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘हाँ, केवल देखा ही नहीं, उससे बात भी की है। तुम चाहो, तो तुम्हारी बात भी करा सकता हूँ।’’ यह कह कर उन्होंने नरेन्द्र को स्पर्श किया। इतने से ही नरेन्द्र को भाव समाधि लग गयी। अपनी सुध-बुध खोकर वे मानो दूसरे लोक में पहुँच गये। अब नरेन्द्र का अधिकांश समय दक्षिणेश्वर में बीतने लगा। ईश्वर की खोज में नरेन्द्र ने संन्यास ले लिया। जब रामकृष्ण परमहंस को लगा कि उनका अंत समय पास आ गया है, तो उन्होंने नरेन्द्र को स्पर्श कर अपनी सारी आध्यात्मिक शक्तियाँ उन्हें दे दीं। अब विवेकानन्द ने देश-भ्रमण प्रारम्भ किया और वेदान्त के बारे में लोगों को जागृत करने लगे।

रामकृष्ण परमहंस ने नहीं दिया स्वामी विवेकानंद नाम

आम धारणा यह है कि नरेन्द्र को विवेकानंद नाम उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने दिया, परंतु आज यह त्रुटिपूर्ण धारणा है। आज जब स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म संसद में भारतीय अध्यात्म और सनातन धर्म पर दिए गए भाषण की 126वीं वर्षगांठ है, तब आपको हम यह बताने जा रहे हैं कि रामकृष्ण परमहंस से सनातन धर्म और अध्यात्म की शिक्षा लेने वाले नरेन्द्र को वास्तव में स्वामी विवेकानंद नाम गुरु रामकृष्ण परमहंस ने नहीं दिया। वास्तव में नरेन्द्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद बनने की इस यात्रा का संबंध शिकादो धर्म संसद से जुड़ा हुआ है। यदि नरेन्द्रनाथ दत्त ने शिकागो धर्म संसद में जाने का प्रण न किया होता, तो कदाचित वे स्वामी विवेकानंद के रूप में प्रसिद्ध नहीं होते।

जब नरेन्द्र ने किया शिकागो जाने का प्रण

अब तक भारत भ्रमण कर देश में ही सनातन धर्म और अध्यात्म का प्रचार-प्रसार कर रहे नरेन्द्रनाथ दत्त को लोग संत तो मान ही चुके थे। कोई उन्हें सच्चिदानंद कहता, तो कोई अन्य किसी संत समान उपाधि नाम से संबोधित करता। संपूर्ण देश का भ्रमण कर और छोटे-बड़े सैकड़ों प्रसिद्ध विद्वानों से वार्तालाप के बाद नरेन्द्र इस निश्चय पर पहुँचे कि वे विदेशों में जाकर भारतीय सनातन धर्म का डंका बजाएँगे। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि तत्कालीन भारत के शिक्षित लोग विदेशी सभ्यता से चकाचौंध होकर भारत की प्राचीन संस्कृति से विमुख हो रहे थे। नरेन्द्र के मन में विदेशों में जाकर सनातन धर्म का प्रचार करने को लेकर जन्मे विचार को उस समय पंख लग गए, जब मद्रास में उन्हें यह सूचना मिली कि शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन होने वाला है और इसमें भारत की ओर से अभी तक किसी प्रतिनिधि का जाना निश्चित नहीं हुआ है। नरेन्द्र की अंतरात्मा पुकार उठी कि यही यह अवसर है, जब भारत के अध्यात्म से परिपूर्ण सनातन धर्म का पूरे विश्व में डंका बजाया जाए। नरेन्द्र ने सभी मित्रों और शुभचिंतकों से विचार-विमर्श किया और 31 मई, 1893 को शिकागो धर्म संसद में भाग लेने का निर्णय किया।

जयपुर रेलवे स्टेशन पर मिला ‘स्वामी विवेकानंद’ नाम

वर्ष 1893 वह कालखंड था, जब भारत अंग्रेजों की दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। ऐसे दौर में भारत से अमेरिका स्थित शिकागो तक जाना अत्यंत खर्चीला और कठिन काम था। शिकागो जाने के लिए नरेन्द्र और उनके शुभचिंतक धन की व्यवस्था कर रहे थे। इसी दौरान राजस्थान के शेखावटी स्थित राजपूताना खेतड़ी रिसायत के नरेश अजीत सिंह के दीवान जगमोहनलाल उनकी सेवा में उपस्थित हुए। जगमोहनलाल ने नरेन्द्र से कहा, ‘आपने दो वर्ष पहले राजा साहब को पुत्र होने का आशीर्वाद दिया था, जो सफल रहा है। इसीलिए एक आनंदोत्सव का आयोजन किया गया है, जिसमें नरेश अजीत सिंह ने आपसे पधारने की प्रार्थना की है।’ नरेश के निमंत्रण पर नरेन्द्र खेतड़ी पहुँचे और नवजात शिशु को आशीर्वाद देकर लौटने लगे। खेतड़ी नरेश अजीत सिंह ने दीवान को उनके साथ भेजा। उनकी यात्रा का पूरा प्रबंध किया। खेतड़ी नरेश अजीत सिंह स्वयं नरेन्द्र को विदा करने जयपुर स्टेशन तक आए। इसी समय खेतड़ी नरेश अजीत सिंह ने नरेन्द्र से पूछा, ‘आप अमरीका पहुँच कर किस नाम से प्रचार-कार्य करेंगे ?’ नरेन्द्र ने उत्तर दिया, ‘अभी तक तो मैंने कोई पक्का नाम रखा नहीं है। कभी सच्चिदानंद, कभी अन्य कोई नाम रख कर फिरता रहा हूँ।’ उसी समय खेतड़ी नरेश अजीत सिंह ने नरेन्द्र से कहा, ‘स्वामीजी ! आपको विवेकानंद नाम कैसा लगता है ?’ नरेन्द्र ने यह नाम स्वीकार कर लिया और उसी दिन से रामकृष्ण परमहंस के शिष्य नरेन्द्रनाथ दत्त स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वामी विवेकानंद की इस अमेरिका यात्रा का पूरा खर्च खेतड़ी नरेश अजीत सिंह ने उठाया था।

सनातन धर्म के प्रचार के लिए कई कष्ट झेले

31 मई, 1893 को स्वामी विवेकानंद बम्बई के बंदरगाह से अमेरिका जाने वाले जहाज पर सवार हुए। उन्होंने भगवा रंग का रेशमी चोला पहना हुआ था और माथे पर भगवा फेंटा बांधा हुआ था। इस सबकी व्यवस्था खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के आदेश पर दीवान जगमोहनलाल ने की थी। जगमोहनलाल और मद्रास के एक भक्त अलसिंह पेरुमल स्वामी विवेकानंद को जहाज के दरवाजे तक पहुँचाने आए। बम्बई से रवाना हुआ जहाज कोलंबो, पिनांग, सिंगापुर, हांगकांग, नागासाकी, ओसाका, टोकियो आदि होते हुए अमेरिका के बैंकॉवर बंदरगाह पहुँचा। वहाँ से स्वामी विवेकानंद रेल द्वारा शिकागो पहुँचे। शिकागो धर्म संसद 11 सितंबर से आरंभ होने वाली थी, जबकि स्वामी विवेकानंद जुलाई के पहले सप्ताह में ही अमेरिका पहुँच गए। एक माह से अधिक के लम्बे समय तक शिकागो जैसे महंगे शहर में ठहरने के लिए स्वामी विवेकानंद के पास धन नहीं था। स्वामी जी ने शिकागो यात्रा के बारे में स्वयं लिखा था कि ‘जब उनका जहाज शिकागो पहुँचा था, तो वहाँ इतनी ठंड थी कि मैं हडि्डयों तक जम गया था। मुंबई से रवाना होते हुए मेरे दोस्तों ने जो कपड़े दिए थे वो नॉर्थ-वेस्ट अमेरिका की कड़ाके की ठंड के लायक नहीं थे। कदाचित मेरे दोस्तों को ठंड का अनुमान नहीं था। वह विदेशी धरती पर एक दम अकेले थे। विश्व धर्म सम्मेलन के पांच हफ्ते पहले वह गलती से पहुँच गए थे। शिकागो काफी महंगा शहर था। उनके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे और जितने पैसे थे वह तेजी से खत्म हो गए थे। स्वामी विवेकानंद ने आगे लिखा था, ‘साथ लाई विचित्र-सी चीज़ों का बोझ लेकर मैं कहाँ जाऊँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर मेरी विचित्र-सी वेशभूषा देख कर वहाँ के लड़के मेरे पीछे भी दौड़ते थे।’

रेल के डिब्बे में सोए, भीख तक मांगी, पर पीछे नहीं हटे

देश से दूर किसी विदेशी शहर में स्वामी जी के लिए वह मुश्किल का दौर साबित हुआ, जब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन राइट नेउन्हें धर्म संसद समिति के अध्यक्ष का पता दिया और उनका परिचय देते हुए पत्र भी दिया, परंतु वह भी उनसे खो गया। उनका शरीर खाली पेट और थकावट से टूट चुका था, जिसके बाद उन्हें खुद को कड़ाके की सर्दी से बचाने के लिए मालगाड़ी के यार्ड में खड़े खाली डिब्बे में सोना पड़ा। अगली सुबह विवेकानंद पास के धनी इलाके लेक शोर ड्राइव में भोजन के लिए भीख मांगने गए, परंतु वहां के लोग उन्हें चोर और डाकू समझ कर भगा देते थे। हर दरवाजे की दहलीज़ पर उन्हें उपहास और तिरस्कार ही मिला। खुद को इतना लाचार महसूस करने के बाद उनके दिमाग में सिर्फ एक ही बात आती कि सब कुछ छोड़कर भारत लौट जाएँ, परंतु इतने कष्ट सहने के बाद भी वह डटे रहे, क्योंकि यही वह मौका था, जब वह भारतीयों को गरीबी से मुक्त कर सकते थे। वे ये मौका नहीं छोड़ना चाहते थे। भले ही वह शारीरिक रूप से हार चुके थे, परंतु आंतरिक साहस शेष था। एक पार्क में जाकर बैठ गए और स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दिया। इसके बाद विवेकानंद कम महंगे शहर बोल्टन के लिए रवाना हो गए। रास्ते में एक भद्र महिला से परिचय हुआ, जिन्होंने विवेकानंद को अपने घर में ठहरा लिया। यहाँ विवेकानंद के लिए उनका भगवा चोला समस्याओं का सबब बनने लगा। लोग मज़ाक उड़ाने लगे। इस पर उस महिला ने पोशाक बदलने की सलाह दी। जैसे-तैसे एक महीने का समय गुज़र गया और स्वामी विवेकानंद पुन: शिकागो पहुँचे और 11 सितंबर, 1893 को उन्होंने विश्व धर्म संसद में भारतीय सनातन धर्म, प्राचीन संस्कृति और अध्यात्म परम्परा का पूरी दुनिया में डंका बजाया।

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