VIDEO : SALUTE TO APJ, जिन्होंने उड़ते पक्षी से प्रेरणा ली और बन गए भारत के ‘मिसाइल मैन’ !

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 15 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘इस दुनिया को, इस धरती को जीने लायक कैसे बनाया जाए ?’ ये उस महान वैज्ञानिक के अंतिम शब्द हैं, जो उन्होंने 27 जुलाई, 2015 को मेघालय में शिलांग स्थित भारतीय प्रबंध संस्थान (IIM) में आयोजित कार्यक्रम में कहे थे। आईआईएम के विद्यार्थियों से बहुत कुछ कहने-पूछने की इच्छा अभी पूरी होती, उससे पहले दिल का दौरा पड़ा और भारत ने एक महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति को खो दिया।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं डॉ. अबुल पाकिर जैनुलअब्दीन कलाम मसऊदी यानी डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की। 27 जुलाई, 2015 को आईआईएम में आयोजित कार्यक्रम का पूरा सभागार महानुभावों और विद्यार्थियों से भरा हुआ था। कलाम ने अभी अपना भाषण आरंभ ही किया था कि चंद मिनटों बाद ही वे अचानक लड़खड़ा कर ज़मीन पर गिर गए और इसके साथ ही दुनिया की चिंता करने वाले इस महान वैज्ञानिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

पक्षियों की उड़ान ने दी वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा

कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिनालुड में रामेश्वरम् स्थित धनुषकोडी गाँव में मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे कलाम के बारे में कदाचित ही किसी ने सोचा होगा कि वे एक दिन भारत के मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध होंगे। इतना ही नहीं, कलाम ने जितनी उपलब्धियाँ भारत को दिलाईं, भारत ने भी कलाम का सम्मान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कलाम भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति भी रहे। सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया। वैसे कलाम के प्रारंभिक जीवन की बात की जाए, तो पाँच वर्ष की आयु में रामेश्वरम् के पंचायत विद्यालय में उनकी शिक्षा-दीक्षा आरंभ हुई। कलाम जब पाँचवीं कक्षा में थे, तब क्लास टीचर सुब्रह्मण्यम अय्यर ने विद्यार्थियों से पूछा कि चिड़िया कैसे उड़ती है ? कोई छात्र उत्तर नहीं दे सका, तो अय्यर अगले दिन सभी छात्रों को समुद्र तट पर ले गए, जहाँ सैकड़ों पक्षी उड़ रहे थे। अय्यर ने छात्रों को पक्षी के उड़ने के पीछे के कारण और पक्षियों के शरीर की बनावट के बारे में विस्तारपूर्वक बताया, जो उनके उड़ने में सहायक होती है। स्वयं कलाम के शब्दों में, ‘शिक्षक सुब्रह्मण्यम अय्यर द्वारा समझाई गई ये बातें मेरे अंदर इस कदर समा गईं कि मुझे महसूस होने लगा कि मैं रामेश्वर के समुद्र तट पर हूँ और उस दिन की घटना ने मुझे जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा दी। मैंने तय किया कि उड़ान की दिशा में ही अपना कैरियर बनाऊँगा। मैंने बाद में फिज़िक्स की पढ़ाई की और मद्रास इंजीनियिरंग से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।’

मछुआरे का बेटा, अखबार भी बेचा

कलाम के पिता जैनुलाब्दीन मध्यम वर्गीय व्यक्ति थे। वे न अधिक पढ़े-लिखे थे और न ही अधिक धनवान। वे मछुआरे थे और मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। दूसरी तरफ कलाम ने भी प्रारंभिक जीवन में बहुत संघर्ष किया। आठ वर्ष की आयु में कलाम गणित का ट्यूशन लेने के लिए सुबह 4 बजे उठते थे, क्योंकि उन्हें मुफ्त में ट्यूशन लेना था। जो टीचर गणित का ट्यूशन देता था, वह हर वर्ष पाँच बच्चों को मुफ्त में गणित पढ़ाता था। कलाम ट्यूशन से आने के बाद नमाज पढ़ते। इसके बाद सुबह आठ बजे तक रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर अखबार बाँटते थे।

और इस तरह कलाम बन गए मिसाइल मैन

1950 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद कलाम ने हॉवरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिए भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) प्रवेश किया। कलाम की अंतरिक्ष में उड़ान की मूल यात्रा यहीं से आरंभ हुई। 1962 में कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से जुड़े। उन्होंने इसरो में परियोजना महानिदेशक के रूप में भारत का प्रथम स्वदेशी उपग्रह एसएलवी 3 प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रय हासिल हुआ। 1980 में उन्होंने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया, जिसके चलते भारत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बना। इसके बाद कलाम ने स्वदेशी लक्ष्य भेदी नियंत्रित प्रक्षेपास्त्र (गाइडेड मिसाइल) डिज़ाइन किया। वे कलाम ही थे, जिन्होंने अग्नि और पृथ्वी जैसी स्वदेशी मिसाइलों का निर्माण किया। जुलाई-1992 से दिसम्बर-1999 तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा सुरक्षा शोध व विकास विभाग के सचिव रहे कलाम के नेतृत्व में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पोखरण परमाणु परीक्षण किया। कलाम ने ही भारत को विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति के जरिए 2020 तक अत्याधुनिक करने की खास सोच विजन 2020 में दी। कलाम भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। 1982 में कलाम को रक्षा अनुसंधान विकास प्रयोगशाला (DRDL) का निदेशक बनाया गया। इसी दौरान अण्णा विश्वविद्यालय ने कलाम को डॉक्टर की उपाधि दी। उसी काल में कलाम ने रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक डॉ. वी. एस. अरुणचालम् के साथ इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) का प्रसातव तैयार किया। स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए कलाम की अध्यक्षता में एक समिति भी बनाई गई। इसके पहले चरण में जमीन से जमीन पर मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें बनाने पर जो़र था। फिर हवा में मार करने वाली मिसाइल, टैंकभेदी मिसाइल और रिएंट्री एक्सपेरिमेंट लॉन्च व्हिकल (रेक्स) बनाने का प्रस्ताव था। इस कार्यक्रम के तहत पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग नामक मिसाइलें बनाई गईं। कलाम ने अपने सपने रेक्स को अग्नि नाम दिया। कलाम के नेतृत्व में 1985 में त्रिशूल, 1988 में पृथ्वी और 1989 में अग्नि का परीक्षण किया गया। 1998 में रूस के साथ मिल कर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल बनाने के लिए ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। ब्रह्मोस को धरती, आसमान और समुद्र कहीं भी दागा जा सकता है। इस सफलता के साथ ही कलाम को मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्धि मिली और इस उपलब्धि के लिए कलाम को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 1981 में भारत सरकार ने कलाम को पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया।

भारत से सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचे कलाम

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) सरकार ने 2002 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में कलाम को उम्मीदवार बनाया। वे विजयी रहे। 25 जुलाई, 2002 को कलाम देश के राष्ट्रपति बने। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ। राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी कलाम अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय रहे। कलाम आईआईएम-शिलांग, अहमदाबाद, इंदौर और बेंगलौर के मानद् फैलो तथा विज़िटिंग प्रोफेसर बन गए। उन्होंने अपने निधन से पहले विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़े कई संस्थानों में अपने अनुभव बाँटे। कलाम ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ाई छेड़ी। कलाम धर्म से मुस्लिम होने के बावजूद कर्नाटक भक्ति संगीत हर दिन सुनते थे और हिन्दू संस्कृति में विश्वास करते थे।

You may have missed