जलियाँवाला बाग़ नरसंहार की 100वीं बरसी : डायर नहीं, ओ’ड्वायर था षड्यंत्रकारी ! भारत माँ के इस सपूत ने ऐसे लिया था प्रतिशोध : जानिए पूरा इतिहास

भारत पर अंग्रेजी शासन के दौरान अत्याचारों के अविरत् सिलसिले में सबसे भयावह कोई घटना थी, तो वह थी जलियाँवाला बाग़ नरसंहार। इस नरसंहार की आज 100वीं बरसी है। ठीक 100 वर्ष पहले 13 अप्रैल, 1919 के दिन पंजाब के जलियाँवाला बाग़ में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आयोजित एक शांतिपूर्ण सभा में जमा हुए हजारों भारतीयों पर अंग्रेजी शासकों ने अंधाधुंध गोलियों की बरसात की थी। ये सभी लोग जलियाँवाला बाग़ में ब्रिटिश हुकूत के रौलट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे।

माइकल ओ’ड्वायर और जनरल डायर

भारत के दासताकाल के इतिहास में जलियाँवाला बाग़ नरसंहार काली स्याही से अंकित है और इस कांड का नाम सुनते ही सभी भारतीयों के मस्तिष्क में एक ही चेहरा उभर कर सामने आता है और वह चेहरा है जनरल डायर का। जलियाँवाला बाग़ में हजारों भारतीयों पर गोली चलाने वाले और अपने साथियों को गोली चलाने का आदेश देने वाला जनरल डायर ही था, परंतु आज जलियाँवाला बाग़ की 100वीं बरसी पर हम आपको एक ऐसे रहस्य की बात बताने जा रहे हैं, जो कदाचित आपने पहले न सुनी-जानी हो। वास्तव में जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के पीछे मुख्य षड्यंत्र ब्रिटिश शासकों और पंजाब के तत्कालीन गवर्न माइकल ओ’ड्वायर का था। कई इतिहासकारों का मानना है कि जलियाँवाला बाग़ नरसंहार ओ’ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था। यह नरसंहार पंजाब पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पंजाबियों को डराने के उद्देश्य से किया गया था। इतना ही नहीं, ओ’ड्वायर तो इसने भयावह नरसंहार के बाद भी जनरल डायर का समर्थन करता रहा। वह पीछे नहीं हटा।

भारत के इस सरदार ने लिया प्रतिशोध

अंग्रेजी शासन के विरुद्ध पूरे देश में चल रहे आंदोलन में अनेक क्रांतिकारी शामिल थे। उन्हीं क्रांतिकारियों में एक थे सरदार उधम सिंह। उधम सिंह ने 21 वर्षों बाद जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरुद्ध अपने सीने में धधकती प्रतिशोध की ज्वाला शांत की थी। इस नरसंहार का प्रतिशोध लेने के लिए उधम सिंह लंदन पहुँचे उधम सिंह ने 13 मार्च, 1940 को नरसंहार के षड्यंत्रकारी माइकल ओ’ड्वायर की गोली मार कर हत्या कर दी। उधम सिंह ने कायरतापूर्वक नहीं, अपितु सरेआम उस समय ओ’ड्वायर को मौत के घाट उतारा, जब वे लंदन के कैक्स्टन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन ऑफ रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी की एक बैठक में उपस्थित थे। बाद में 31 जुलाई, 1940 को उधम सिंह को फाँसी दे दी गई।

कौन थे उधम सिंह ?

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में कंबोज परिवार में हुआ था। 1901 में माता और 1907 में पिता के निधन के बाद उधम सिंह को बड़े भाई के साथ अमृतसर में एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था। अनाथालय में ही दोनों भाइयों को उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले। उधम सिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे। इसलिए उन्होंने अपना नाम बदल कर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रखा था, जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक हैं।

और क्रांतिकारी बन गए उधम सिंह

उधम सिंह भाई साधु सिंह के साथ अमृतसर के अनाथालय में जीवनयापन कर रहे थे कि 1917 में भाई का देहांत हो गया। उधम सिंह अब पूरी तरह अनाथ हो गए। उन्होंने 1919 में अनाथालय छोड़ा और क्रांतिकारियों के साथ मिल कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए।

नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी उधम सिंह ने ली प्रतिज्ञा

13 अप्रैल, 1919 को जब जलियाँवाला बाग़ नरसंहार हुआ, तब उधम सिंह भी वहाँ मौजूद थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन, माइकल ओ’ड्वायर के षड्यंत्र और जनरल डायर की क्रूरता के कारण हजारों लोगों को अपनी आँखों के सामने मरते देखा था। इस घटना ने उधम सिंह के सीने में आग लगा दी। उधम सिंह ने जलियाँवाला बाग़ की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ’ड्वायर से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा ली और अपने मिशन को अंजाम देने के लिए अलग-अलग नाम धारण कर अफ्रीका, नैरोबी, ब्राज़ील और अेरिका की यात्रा करते हुए 1934 में लंदन पहुँचे। वे लंदन में 9, एल्डर स्ट्रीट कॉमर्शियल रोड पर रहने लगे। उन्होंने लंदन में यात्रा के लिए कार खरीदी और साथ में अपने मिशन को पूरा करने के लिए 6 गोलियों वाली एक रिवॉल्वर भी खरीद ली।

अवसर मिलते ही ले लिया प्रतिशोध

भारत का यह वीर क्रांतिकारी अब माइकल ओ’ड्वायर को नर्क पहुँचाने के लिए योग्य समय की प्रतीक्षा करने लगा। उसे अवसर मिला 21 साल बाद 1940 में। 13 मार्च, 1940 को लंदन में रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी की कैक्स्टन हॉल में आयोजित बैठक में माइकल ओ’ड़्वायर मुख्य वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह इस बैठक स्थल पर पहुँचे। उन्होंने रिवॉल्वर एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उसी तरह काट लिया था, जिससे ओ’ड्वायर की मौत का सामान आसानी से छिपाया जा सके। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ’ड्वायर पर गोलियाँ बरसाईं। उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। उधम सिंह ने भागने की कोशिश नहीं की, अपितु सीना तान कर गिरफ्तारी दी। 4 जून, 1940 को उधम सिंह को अदालत ने हत्या का दोषी ठहराया और 31 जुलाई, 1940 को उधम सिंह को पेंटनविले जेल में फाँसी दे दी गई।

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