दत्तात्रेय अवतरण दिवस : इन 24 गुरुओं से सीख लीजिए जीना, तो मृत्यु भी टल जाएगी

* अत्रि-अनसुइया पुत्र कैसे कहलाए दत्तात्रेय ?

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 11 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज यानी 11 दिसंबर, 2019 बुधवार मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा है। इसी तिथि को भारत की भूमि पर महापुरुष और ईश्वरीय अवतार दत्तात्रेय का अवतरण हुआ था। इस दिन को दत्त जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। दत्त जयंती पर हर वर्ष की भाँति पूजा-पाठ-व्रत-अनुष्ठान आदि वह सब कर्म-क्रिया करेंगे, जो वे वर्षों से करते आए हैं, परंतु कोई भी भगवान दत्तात्रेय के जीवन में झाँकने का प्रयास नहीं करेगा। आधुनिक धार्मिक कहलवाने वाले लोगों की दिक्कत ही यह है कि वे ‘हो चुके’ महापुरुषों को भगवान मान कर उनकी पूजा-पाठ की क्रियाओं में लग जाते हैं, परंतु उनके जीवन व आचरण से सीख लेने का साहस नहीं करते।

भगवान दत्तात्रेय को लेकर सबसे अधिक प्रसिद्ध बात यह है कि उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की, परंतु दत्तात्रेय को भगवान के रूप में पूजने वालों की दृष्टि उनके गुरुओं पर नहीं जाएगी। यदि दत्तात्रेय के बनाए व बताए 24 गुरुओं से हम भी शिक्षा प्राप्त करें, तो हमारा न केवल जीवन सफल हो सकता है, अपितु मृत्यु भी टल सकती है। कहते हैं कि गुरु बिना ज्ञान संभव नहीं है। साधारणत: भारतीय सनातन धर्म-संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा रही है और लोग किसी न किसी को गुरु बना कर अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं, परंतु यह प्रयास तभी सफल होते हैं, जब गुरु पूर्ण और प्रकट स्वरूप में हो, न कि किसी मूर्ति या देवी-देवता या भगवान के रूप में।

दत्तात्रेय की अवतार कथा

आइए सबसे पहले आपको बताते हैं भगवान दत्तात्रेय की अवतार कथा के विषय में। पौराणिक तथ्यों के अनुसार महायोगीश्वर दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार थे। मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन इनका अवतरण हुआ था। श्रीमद् भगवत के अनुसार महर्षि अत्रि ने पुत्र प्राप्ति की कामना से व्रत किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने महर्षि अत्रि को पुत्र प्राप्ति का वरदान देते हुए कहा, ‘दत्तो मयाहमिति यद् भगवान् स दत्त:’। इसका अर्थ है कि भगवान विष्णु ने अत्रि से कहा, ‘मैंने अपने आपको (स्वयं को) तुम्हें दे दिया।’ भगवान विष्णु के वरदान के फलस्वरूप महर्षि अत्रि की पत्नी सती अनसुइया ने मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा के दिन पुत्ररत्न को जन्म दिया। चूँकि यह पुत्र विष्णु दत्त (विष्णु द्वारा दिए गए थे) थे, इसीलिए वह दत्त कहलाया। महर्षि अत्रि का पुत्र होने के कारण दत्त आत्रेय भी कहलाए। दत्त और आत्रेय से मिल कर दत्तात्रेय नाम की उत्पत्ति हुई।

दत्तात्रेय के गुरु आज भी जीवित

वर्तमान धार्मिक आडंबरों में फँसे तथाकथित धार्मिक लोग देहत्याग कर चुके गुरुओं के चरणों में लौट रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि गुरु उसे बनाना चाहिए, जो जीवित हो। हनुमान और शबरी ने राम की उस समय आराधना की, जब वे देह धारण किए हुए थे। सुदामा और अर्जुन ने कृष्ण को उनके जीवन काल में गुरु बनाया। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी समर्थ-ज्ञानी और जीवित पुरुष को ही गुरु बनाना चाहिए। बिजली के बंद तार में कभी भी करंट नहीं आ सकता और न ही वह तार कोई सहायता कर सकता है। भगवान दत्तात्रेय ने अपने जीवन में परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए एक नहीं, 24 गुरु बनाए। इतना ही नहीं, दत्तात्रेय ने जिन्हें गुरु माना, वे आज भी जीवित हैं। यदि हम भी उन गुरुओं से शिक्षा लें, तो हमें परमात्मा, उसकी प्रकृति, उसकी माया से जुड़े सभी रहस्यों का पता चल सकता है। बस आवश्यकता है, तो इन गुरुओं से सीखने की।

कौन हैं दत्तात्रेय के 24 गुरु ?

भगवान दत्तात्रेय गुरु की खोज में नहीं निकले, अपितु उन्होंने परमात्मा रचित इस सृष्टि में ही अपने गुरुओं को खोज निकाला। भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं व उनसे प्राप्त शिक्षा का विवरण निम्नानुसार है :

सूर्य : भगवान दत्तात्रेय ने सूर्य को इसलिए गुरु माना, क्योंकि वह एक होने के बावज़ूद अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग दिखाई देता है। ठीक उसी तरह एक आत्मा विभिन्न देहों के रूप में अलग-अलग दिखाई देता है, परंतु आत्मा होता एक ही है, जैसे कि सूर्य एक है।

पृथ्वी : दत्तात्रेय ने पृथ्वी से सहनशीलता व परोपकार की भावना सीखी। पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी प्राणी उसका सदुपयोग-दुरुपयोग दोनों करते हैं, परंतु वह माता की तरह आघात को परोपकार की भावना से निरंतर सहनशीलता बनाए रखती है।

पिंगला : पिंगला एक वेश्या थी, जिसने धन कमाने की लालसा में वेश्यावृत्ति का मार्ग अपनाया था, परंतु जब एक दिन उसके मन में वैराग्य जागा, तो उसे समझ में आया कि वास्तविक सुख धन में नहीं, अपितु परमात्मा के ध्यान में है। आत्म-साक्षात्कार के बिना स्थायी सुख संभव नहीं है। दत्तात्रेय ने पिंगला के इस हृदय परिवर्तन को देखते हुए उसे अपना गुरु माना।

कबूतर : कबूतर के माध्यम से दत्तात्रेय ने मोह के बंधन को तोड़ने की कला सीखी। जब उन्होंने देखा कि कबूतर का एक जोड़ जाल में फँसे बच्चों को बचाने के चक्कर में स्वयं भी जाल में जा फँसा, तो दत्तात्रेय का विवेक जागृत हुआ कि किसी से भी अपेक्षा से अधिक स्नेह-मोह प्राणी को केवल और केवल दु:ख ही देता है।

वायु : वायु निरंतर गतिशील रहता है। संतप्तों को सांत्वना देते हुए, गंध को वहन करते हुए भी वायु निर्लिप्त रहता है। पवन की इन्हीं विशेषताओं ने उसे दत्तात्रेय का गुरु बनाया।

मृग-मछली : मृग अपनी मस्ती और उछल-कूद में इतना मदमस्त हो जाता है कि उसे अपने आस-पास आने वाले हिंसक प्राणियों का भान तक नहीं रहता और यही उसकी मृत्यु का कारण बनता है। दत्तात्रेय ने मृग को गुरु मानते हुए सीखा कि कभी भी मौज-मस्ती को लापरवाही में नहीं बदलना चाहिए। इसी प्रकार जिह्वा की लोलूप मछली को कछुआरे की जाल में तड़पते देख दत्तात्रेय ने उसे गुरु माना और सीखा कि लोलूपता या लोभ सदैव हानि पहुँचाते हैं।

समुद्र : नदियों के अकूत जल प्रवाह, अच्छे-बुरे सभी प्रकार के जल को ग्रहण करने के बावज़ूद सागर कभी छलकता नहीं है। सागर से दत्तात्रेय ने स्वयं को और अपने हृदय को विशाल बनाने की सीख ली।

पतंगा : पतंगे को आग के आकर्षण से सदैव मृत्यु ही मिलती है। दत्तात्रेय ने सीखा कि मनुष्य को रंग-रूप-आकार आदि के आकर्षण और मिथ्या मोहजाल में नहीं उलझना चाहिए और जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए।

आकाश : अनेक ब्रह्मांडों को समाए आकाश से निराभिमान का गुण सीखना चाहिए। इसीलिए दत्तात्रेय ने निरंकारी आकाश का गुरु के रूप में वरण किया।

जल : सभी प्राणियों के जीवन का महत्वपूर्ण स्रोत जल है, जो सदैव सरल और तरल रहता है। कितना भी तपाएँ, फिर भी शीतलता का मूल स्वरूप नहीं छोड़ता। सभी को जीवन देने वाले जल को दत्तात्रेय ने अपना गुरु माना।

यम : यम का नाम सुनते ही लोग मृत्यु के भय से काँपने लगते हैं, परंतु दत्तात्रेय यम को अनुपयोगी को हटाने वाला, अभिवृद्धि पर नियंत्रण रखने वाला, संसार यात्रा से थके हुए लोगों को विश्राम देने वाला महान देव माना और उन्हें गुरु बनाया।

अग्नि : ऊर्ध्वमुखी अग्नि निरंतर प्रकाशमान है, संग्रह से दूर रखने वाली है और उसे स्पर्श करने वाले को अपना रूप दे देती है। दत्तात्रेय ने अग्नि के इन्हीं गुणों के कारण उसे अपना गुरु वरण किया।

चंद्र : स्वयं प्रकाशित न होने के बावज़ूद सूर्य से प्रकाश लेकर भी चंद्र पृथ्वी लोक में रात्रि में प्रकाश फैला कर यह संदेश देता है कि विपत्ति में भी निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि हर अमावस्या के बाद पूर्णिमा भी आती है। चंद्र का धैर्य गुण दत्तात्रेय को उन्हें अपना गुरु बनाता है।

अजगर : अजगर में जो सहनशीलता है, वह प्रत्येक प्राणी में हो, तो वह कभी भूख से विचलित नहीं हो सकता। अजगर ठंड के मौसम में भूख लगने पर मिट्टी खाकर भी जीवन यापन कर लेता है। उसकी इसी सहनशीलता के कारण दत्तात्रेय ने अजगर को गुरु माना।

मधु मक्खी : दत्तात्रेय ने मधु मक्खी के जीवन कार्य में अद्भुत साधना देखी। पुष्पों का मधुर संचय कर दूसरों को मधु देने में लगी रहने वाली मधु मक्खी परमार्थी है।

भौंरा : भौंरे में यह गुण है कि वह अलग-अलग फूलों से पराग लेता है। दत्तात्रेय ने भौरे के गुरु मान कर उससे सीखा कि हमें सदैव अच्छी बातें सीखने के लिए सज्ज रहना चाहिए।

हाथी : हाथी पर सदैव काम सवार रहता है। यही कारण है कि वह शिकारियों के बिछाए काम जाल में फँस कर जीवन भर दासता का वरण कर लेता है। दत्तात्रेय ने हाथी को गुरु मान कर वासना के दुष्परिणामों से सावधान रहना सीखा।

काक : दत्तात्रेय को काक (कौआ) ने सिखाय कि धूर्तता और स्वार्थपरकता की नीति अंतत: हानिकारक ही होती है।

अबोध बालक : संसार के मोह-माया के जाल से मुक्त अबोध (नवजात) बालक राग, द्वेष, चिंता, काम, क्रोध, लोभ आदि गुणों से रहित होता है और इसीलिए वह सुखी तथा शांत होता है। प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में अबोध बालक की तरह निर्दोष बनना चाहिए।

धान कूटती स्त्री : दत्तात्रेय ने देखा कि धान कूटती स्त्री की चूड़ियाँ खनक रही थीं। घर आए अतिथियों को पता न लगे, इसलिए उसने दोनों हाथों में एक-एक चूड़ियाँ ही रहने दीं। दत्तात्रेय ने इस स्त्री से सीखा कि अनेक कामनाओं के रहते चूड़ियों की तरह मन में संघर्ष होते रहते हैं, परंतु यदि एक लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाए, तो सभी उद्वेग-आवेगों का शमन हो जाता है।

लुहार : लोहार को भठ्ठी में लोहे के टूटे-फूटे टुकड़ों को गर्म कर हथौड़े की चोट से कई तरह के सामान बनाते देख दत्तात्रेय ने सीखा कि निरुपयोगी और कठोर प्रतीत होने वाला मानव भी यदि स्वयं को तपाने और चोट सहने को सज्ज हो जाए, तो वह एक उपयोगी उपकरण बन सकता है।

सर्प : सर्प अपनी प्रकृति के अनुसार दूसरों को कष्ट देता है और प्रत्युत्तर में त्रास पाता है। दत्तात्रेय ने सर्प को गुरु मानते हुए सीखा कि उद्दंड, क्रोधी, आक्रामक और आततायी होना किसी के लिए भी हितकर नहीं है।

मकड़ी : मकड़ी के जाल बुनने की क्रिया देख कर दत्तात्रेय ने सीखा कि प्रत्येक मनुष्य का जगत वह स्वयं बनाता है और मकड़ी की तरह फँस कर सुख और दु:ख की अनुभूति करता है।

भृंगज : भृंगज कीड़ा एक झींगुर को पकड़ कर लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने समान बना लिया। दत्तात्रेय ने भृंगज को गुरु मानते हुए यह सीखा कि एकाग्रता व तन्मयता के माध्यम से मनुष्य शारीरिक व मानसिक कायाकल्प करने में निश्चित रूप से सफल हो सकता है।

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