गुजरात का VOTING TREND : लहर क्या, आंधी भी नहीं झकझोरती ‘GUJJU’ मतदाताओं को ! इस बार टूटेगा 52 वर्ष पुराना RECORD ?

गुजरात में लोकसभा चुनाव 2019 के लिए तीसरे चरण में 23 अप्रैल यानी कल मंगलवार को सभी 26 सीटों के लिए मतदान होना है। लगभग 4 करोड़ 47 लाख मतदाताओं को मंगलवार को अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में मतदान करना है, परंतु गुजरात का वोटिंग ट्रेंड निराशाजनक रहा है। लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व में गुजरात के मतदाताओं का इतिहास ज्यादातर उदासीन रहने का है। गुजरात के लोगों को लेकर मान्यता बन चुकी है कि गुजराती मतदाता मतदान के लिए मिलने वाली छुट्टी को पिकनिक में बदल देते हैं। यही कारण है कि गुजरात में अब तक हुए 14 लोकसभा चुनावों का औसत मतदान प्रतिशत केवल 53.37 ही है यानी 42.63 प्रतिशत मतदाता मतदान केन्द्र तक मतदान देने पहुँचते ही नहीं हैं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या गुज्जूभाई इस बार के लोकसभा चुनाव में गरजेंगे या फिर हर बार की तरह वोटिंग डे पर हॉलिडे मनाएँगे। मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार 23 अप्रैल को गर्मी का पारा भी 42 के पार रहने की आशंका है। ऐसे में भीषण गर्मी को मात देकर क्या गुजराती मतदाता 52 वर्ष पुराने उस रिकॉर्ड को 23 अप्रैल को तोड़ेंगे, जो उन्होंने 1967 में बिना किसी बड़ी लहर के बनाया था और जो रिकॉर्ड उन्होंने 1967 के बाद उपजी तीन बड़ी-बड़ी लहरों में भी नहीं तोड़ा ?

मोदी लहर ने नहीं झकझोरा इन्हें

गुजरात में लोकसभा चुनाव के लिए पहली बार 1962 में मतदान हुआ और तब से लेकर अब तक हुए 14 लोकसभा चुनावों में कई बार देश में सत्ता विरोधी या सत्ता के समर्थन में लहर चली, परंतु गुजरात के मतदाताओं को इन लहरों ने भी नहीं झकझोरा। अधिक पीछे न जाते हुए, 2014 की ही बात करें, तो पूरे देश में नरेन्द्र मोदी के पक्ष में लहर थी। वो नरेन्द्र मोदी, जो उस समय गुजरात के ही मुख्यमंत्री थे। पूरे देश ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया। आशा यह थी कि गुजरात 1967 के सबसे ऊँचे मतदान के रिकॉर्ड को लोकसभा चुनाव 2014 में ध्वस्त कर देगा, परंतु इस चुनाव में भी जागृत राज्य के रूप में स्थापित गुजरात में केवल 63.6 प्रतिशत ही मतदान हुआ यानी 36.4 मतदाताओं ने मतदान नहीं किया। यद्यपि जिन लोगों ने वोट दिया, उनका रुख मोदी समर्थन में था और भाजपा ने सभी 26 सीटें जीतीं, परंतु लहर में भी कम मतदान चिंता का विषय रहा।

राजीव विरोधी लहर बेअसर

लोकसभा चुनाव 1989 एक ऐसा चुनाव था, जिसमें पूरे देश में एक तरफ भाजपा ने हिन्दुत्व का एजेंडा अपनाया था और इसका गुजरात में व्यापक असर था, तो दूसरी तरफ जनता दल (जद) के नेता वी. पी. सिंह राजीव सरकार के विरुद्ध बड़े चेहरे के रूप में उभरे थे। यह चुनाव भाजपा-जद ने मिल कर लड़ा था। आशा थी कि गुजरात के मतदाता इस चुनाव में राजीव विरोधी लहर में मतदान के प्रति भारी उत्साह दिखाएँगे, परंतु केवल 54.6 प्रतिशत वोटिंग ही हुई अर्थात् 45.4 मतदाता घरों से बाहर ही नहीं निकले। इन चुनावों में भी जिन्होंने वोट दिया, वे लहर के पक्ष में थे, जिसके चलते भाजपा को 12, जद 11 को और कांग्रेस को केवल 3 सीटें मिलीं।

इंदिरा विरोधी लहर नहीं जगा सकी गुज्जूभाइयों को

भारतीय लोकतंत्र में 25 जून, 1975 एक काले दिन के रूप में अंकित है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया था। इस कारण पूरे देश में इंदिरा और कांग्रेस के विरुद्ध जोरदार आक्रोश था। दो साल बाद आपातकाल हटा और लोकसभा चुनाव 1977 हुए। पूरे देश ने इंदिरा और कांग्रेस के विरुद्ध जबर्दश्त आक्रोश के साथ विपक्षी मोर्चे के पक्ष में जनादेश दिया, परंतु देश व्यापी आक्रोश में गुजरात ने आधा-अधूरा साथ दिया, क्योंकि केवल 59.2 प्रतिशत लोगों ने ही वोट से चोट की यानी 40.8 प्रतिशत वोटर घरों से निकले ही नहीं। परिणाम यह हुआ कि इस चुनाव में भारतीय लोकदल (भालोद-BLD) को केवल 16 सीटें ही जीत सका, जबकि आक्रोश के बावजूद गुजरात की जनता ने 10 सीटें कांग्रेस की झोली में डालीं।

इंदिरा के प्रति सहानुभूति लहर में भी उदासीन गुजराती

देश में दो ऐसे लोकसभा चुनाव हैं, जो कांग्रेस के लिए ऊर्ध्वगति और अधोगति की पराकाष्ठा समान हैं। एक 1984 का चुनाव, जिसमें कांग्रेस ने रिकॉर्ड 450 सीटें जीतीं और दूसरा 2014 का चुनाव, जिसमें कांग्रेस रिकॉर्ड 44 सीटों पर सिमट गई। 2014 की तो हम बात कर चुके हैं। अब आपको बताते हैं 1984 की बात। इन चुनावों से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी। इस कारण पूरे देश में इंदिरा के प्रति सहानुभूति लहर थी। इंदिरा की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले पुत्र राजीव को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए पूरे देश ने कांग्रेस के पक्ष में भारी जनादेश दिया, परंतु गुजराती मतदाता यहाँ भी उदासीन दिखा। लोकसभा चुनाव 1984 में गुजरात में इंदिरा सहानुभूति लहर में भी 57.9 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 42.1 प्रतिशत गुज्जूभाइयों ने वोट नहीं डाला। इन चुनावों में कांग्रेस ने गुजरात में सर्वाधिक 24 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाया, जबकि भाजपा और जनता पार्टी को 1-1 सीट मिली।

गुजरातियों ने बिना लहर बनाया रिकॉर्ड

गुजरात में 14 लोकसभा चुनावों में सर्वाधिक 63.7 प्रतिशत 1967 में हुआ था। यह रिकॉर्ड 52 वर्षों से बरकरार है। 1967 में देश की तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार पर जनमत संग्रह था, लेकिन गुजरात में ऐसी कोई लहर नहीं थी। न नेहरू के पक्ष में, न नेहरू के विरोध में। इसके बावजूद गुजरात में लोकसभा चुनाव 1967 में 63.7 प्रतिशत मतदान हुआ और गुजरात के चुनावी इतिहास में यह एक रिकॉर्ड के रूप में स्थापित हो गया। 1967 के बाद कभी भी गुजरातियों ने इतना अधिक मतदान नहीं किया और आज तक यह रिकॉर्ड बरकरार है। यद्यपि इस चुनाव में भी 46.3 प्रतिशत मतदाता वोट देने नहीं निकले और जिन्होंने वोट दिया, उन्होंने स्वतंत्र पार्टी को 12, कांग्रेस को 11 और 1 सीट निर्दलीय को दी।

गुजरातियों के नाम कम मतदान का रिकॉर्ड

अधिक मतदान न करने में माहिर गुजरातियों के नाम कम मतदान का रिकॉर्ड अवश्य दर्ज है। 1996 में जब गांधीनगर सीट से अटल बिहारी वाजपेयी ने त्यागपत्र दे दिया, तब हुए उप चुनाव में गांधीनगर के मतदाताओं ने केवल 20 प्रतिशत वोटिंग की, जो भारत के चुनावी इतिहास में किसी एक सीट के लिए हुए सबसे कम मतदान के रिकॉर्ड के रूप में दर्ज हो गई। गुजराती मतदाताओं का यह रुख रहा है कि वे बार-बार वोटिंग से परेशान हो जाते हैं। इसीलिए छह महीने के भीतर ही आए उप चुनाव में गांधीनगर के 80 प्रतिशत लोग वोट देने निकले ही नहीं। ऐसी ही स्थिति तब हुई, जब 1989 के दो साल बाद ही 1991 में चुनाव आ गए। इस चुनाव में सिर्फ 44 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 66 प्रतिशत मतदाताओं की उदासीनता दर्शाती है कि लोग दो साल में ही दोबारा चुनाव से परेशान थे। 1996 का चुनाव निस्संदेह 5 वर्ष बाद हुआ था, परंतु गुजरात के मतदाताओं ने एक नया रिकॉर्ड ही अपने नाम दर्ज करा लिया। इस चुनाव में अब तक का सबसे कम 35.9 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 64.1 प्रतिशत लोग घरों में दुबके रहे। फिर तो चुनावों की मानों झड़ी लग गई। दो साल बाद ही हुए 1998 के चुनाव में 59.3 और फिर एक साल बाद 1999 के चुनाव में सिर्फ 47 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया।

पहले ही चुनाव में भारी उदासीनता

लम्बे स्वायत्तता आंदोलन के बाद 1 मई, 1960 को गुजरात की स्थापना हुई थी। पूरे देश में कांग्रेस का बोलबाला था, तो गुजरात में भी कांग्रेस की तूती बोलती थी, लेकिन स्वायत्त गुजरात में पहली बार 1967 में हुए लोकसभा चुनाव में सिर्फ 58 प्रतिशत मतदान हुआ यानी 42 प्रतिशत लोग मतदान के प्रति उदासीन रहे। इसी प्रकार 1971 में 55.5, 1980 में 55.4, 2004 में 45.2 और 2009 में 47.9 प्रतिशत ही मतदान हुआ। इनमें 1971 और 1980 में इंदिरा के प्रति, 2004 और 2009 में मनमोहन के प्रति न कोई समर्थन था, न ही विरोध। परिणाम यह हुआ कि मतदाताओं में मतदान के प्रति भारी उदासीनता देखने को मिली।

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