जानिए गुजरात में कांग्रेस के लिए किस तरह ‘छलावा’ सिद्ध हुई मोदी विरोधी ‘युवा तिकड़ी’ ? भाजपा की राह हुई आसान

नरेन्द्र मोदी 2014 में मुख्यमंत्री पद से विदा क्या हुए, गुजरात में भाजपा मानो शून्य हो गई। जब तक नरेन्द्र मोदी के गुजरात मुख्यमंत्री रहे, तब तक उनके या उनकी सरकार के विरुद्ध विरोध का कोई बड़ा सुर सनने को नहीं मिला, परंतु मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही मानो गुजरात में सुषुप्त पड़ी मोदी विरोध की चिनगारी को हवा मिल गई और इस चिनगारी से तीन युवा नेता हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी उभरे।

गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 से पहले तक ये तीनों नेता किसी पार्टी से संबंध नहीं रखते थे। हार्दिक पटेल पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाने के लिए पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति (PAAS) के बैनर तले आंदोलन चला रहे थे, तो अल्पेश ठाकोर ने ओबीसी समाज के नेता होने के नाते समाज को जागृत करने का अभियान छेड़ रखा था। जिग्नेश मेवाणी दलितों के साथ अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे थे। यद्यपि तीनों नेताओं के सुर में मोदी और भाजपा विरोध साफ झलकता था। इसी का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए 29 वर्षों से सत्ता से दूर कांग्रेस ने तीनों नेताओं, उनके आंदोलनों, अभियानों, कार्यक्रमों को घोषित-अघोषित समर्थन दिया और गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 को फतह करने की कोशिश की। कांग्रेस को इस कोशिश में पहली सफलता तब मिली, जब अल्पेश ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और विधायक भी बन गए। यद्यपि जिग्नेश भी निर्दलीय विधायक बने, परंतु उन्होंने पार्टी का सिम्बॉल नहीं लगने दिया। हालाँकि जिग्नेश की नीतियाँ घोषित तौर पर मोदी विरोधी और अघोषित तौर पर कांग्रेस समर्थक ही रहीं। इन तीनों युवा नेताओं के मोदी विरोध के चलते गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में भाजपा को भारी नुकसान झेलना पड़ा। लोकसभा चुनाव 2019 आने से पहले कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली, जब हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए।

हार्दिक के सहारे पाटीदार वोट बैंक दाँव फेल

लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस और अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस युवा तिकड़ी का भरपूर राजनीतिक फायदा उठाने की कवायद में सबसे पहले हार्दिक को पार्टी में शामिल कराया, परंतु कांग्रेस का यह दाँव हार्दिक की 2015 की एक करतूत के कारण फेल हो गया। मेहसाणा के विसनगर में पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान दंगों के एक केस में हार्दिक पटेल को विसनगर की अदालत ने 2 साल की सजा सुनाई। सजा पर रोक लगती, तो हार्दिक चुनाव लड़ पाते, परंतु कांग्रेस-हार्दिक दोनों का दुर्भाग्य यह रहा कि गुजरात उच्च न्यायालय (HC) से लेकर उच्चतम् न्यायालय (SC) तक कहीं से भी हार्दिक को राहत नहीं मिली और हार्दिक गुजरात के चुनावी मैदान से बाहर हो गए। कांग्रेस हार्दिक के बलबूते गुजरात में भाजपा की मजबूत 12 प्रतिशत पाटीदार वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती थी, परंतु कांग्रेस को इस रणनीति में मात मिली और भाजपा के लिए राह आसान हो गई।

अल्पेश ने बीच भँवर में छोड़ा साथ

गुजरात के बड़े ओबीसी वोट बैंक का कथित नेतृत्व करने वाले अल्पेश ठाकोर ने 2017 में कांग्रेस जॉइन की और विधायक भी बन गए, परंतु अल्पेश पार्टी में अपनी अवहेलना से लगातार नाराज थे। जिस क्षत्रिय-ठाकोर सेना ने अल्पेश ठाकोर का निर्माण किया, उसने अल्पेश को समाज के भले के लिए कांग्रेस छोड़ने का आदेश दिया। अल्पेश ने वही किया। लोकसभा चुनाव 2019 में जब कांग्रेस को ओबीसी वोटरों को लुभाने के लिए अल्पेश की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तभी अल्पेश ने कांग्रेस छोड़ दी। बताया जाता है कि अल्पेश स्वयं पाटण से चुनाव लड़ना चाहते थे और साबरकांठा से अपने संगठन के लिए एक टिकट मांग रहे थे, परंतु बात बनी नहीं और अल्पेश ने कांग्रेस छोड़ दी। इससे कांग्रेस का ओबीसी दाँव भी फेल हो गया और गुजरात में भाजपा की राह का एक और काँटा निकल गया।

मेवाणी गुजरात से दूर बेगूसराय में कन्हैया के साथ

कांग्रेस को यद्यपि दलित नेता जिग्नेश मेवाणी का प्रत्यक्ष समर्थन कभी नहीं मिला। यहाँ तक कि मेवाणी ने गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 भी निर्दलीय के रूप में लड़ा। हालाँकि दलितों के मुद्दे पर मेवाणी के मोदी-भाजपा विरोध से दलितों के वोट अवश्य कांग्रेस को मिले। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव 2019 में भी मेवाणी से परोक्ष फायदे की उम्मीद थी, परंतु मेवाणी न तो गुजरात में लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और न ही वे इस समय गुजरात में किसी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। मेवाणी ने पकड़ी है बेगूसराय की राह, जहाँ सीपीएम उम्मीदवार कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। मेवाणी बेगूसराय में भाजपा के गिरीराज सिंह को हराने के वास्ते कन्हैया कुमार के लिए वोट मांग रहे हैं। मेवाणी स्वयं को राष्ट्रीय स्तर का दलित चेहरा बनाना चाहते हैं। इसीलिए वे गुजरात से 2 हजार किलोमीटर दूर बेगूसराय में कन्हैया कुमार के लिए प्रचार कर रहे हैं। इस तरह गुजरात में भाजपा की राह का एक और काँटा दूर हो गया और कांग्रेस को मेवाणी से फायदे की आस में तीसरा बड़ा झटका लगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed