जानिए इस ‘संन्यासी’ को, जिसने हिला डाला था एक एक ‘सिंहनी’ का सिंहासन !

* भारत के एकमात्र नेता, जिन्होंने एक प्रधानमंत्री को दो-दो बार किया पस्त

* भारत के एकमात्र नेता, जिन्होंने ‘दुर्गा’ को ‘दमनकारी’ बनने पर विवश किया

* भारत के एकमात्र नेता, जो देश की पहली NON-CONG सरकार की नींव बने

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 25 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। ऊपर जो चित्र आप देख रहे हैं, पहली दृष्टि में वह किसी संन्यासी, संत या साधु का लगता है। आपने सही पहचाना है। चित्र में दिखाई दे रहा व्यक्ति वास्तविक जीवन में संन्यासी ही था, परंतु राजनीति में उसके हिस्से जो भूमिका आई, उसने उसे भारत के लिए सदा के लिए अमर कर दिया।

आज की पीढ़ी कदाचित नहीं जानती होगी कि आज यानी 25 जून, 2019 क्यों एक विशेष दिवस है, परंतु हम नई पीढ़ी का ज्ञानवर्धन किए देते हैं। भारत के परतंत्र और स्वतंत्र इतिहास में 24 जून, 1975 से पहले कभी 25 जून कदाचित कोई ऐतिहासिक तिथि नहीं थी, परंतु 1975 में आई 25 जून को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जो किया, उसके बाद से लेकर हर वर्ष 25 जून भारत देश के लिए एक ऐतिहासिक और लोकतंत्र के लिए कलंकित दिवस बन गया, जबकि कांग्रेस पार्टी आज भी अपनी पूर्वज प्रधानमंत्री इंदिरा के उस कृत्य को लेकर हर बार घिर जाती है और पिछले 44 वर्षों से निरुत्तर है।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं आपातकाल यानी EMERGENCY की, जो न तो कभी परतंत्र भारत में ब्रिटिश शासनकाल में लागू हुआ था और न ही स्वतंत्र भारत में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर लालबहादुर शास्त्री तक के कार्यकाल में लागू हुआ था। 25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए देश में पहली बार आपातकाल लागू किया और इसके साथ ही लोकतंत्र और उसके चारों स्तंभों विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता को अपने नियंत्रण में ले लिया।

राजनारायण बने आपातकाल का निमित्त ?

आपातकाल लागू होने के बाद देश में राजनीतिक विरोधियों पर क्या-क्या अत्याचार किए गए, हम उसके बारे में तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है। हम बात उस व्यक्ति की करना चाहेंगे, जिसके कारण इंदिरा गांधी आपातकाल जैसा अनीतिपूर्ण, दुराचारी और अलोकतांत्रिक निर्णय लेने पर विवश हुईं। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि इंदिरा को यह निर्णय लेने के लिए विवश किया था राजनारायण ने। स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले राजनारायण आज़ादी से पहले कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे, परंतु 9 जून, 1951 को सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद राजनारायण उसके संयोजक बन गए। इसके बाद उत्तर प्रदेश में विधायक और विपक्ष के नेता जैसे पदों पर रहते हुए 1966 में पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए, परंतु लोकसभा चुनाव 1971 न केवल राजनारायण के लिए पहला चुनाव था, अपितु वे स्वयं नहीं जानते थे कि वे भविष्य के भारत में घटने वाली एक कलंकित घटना के लिए निमित्त बनने जा रहे हैं। वास्तव में राजनारायण ने अपने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव रायबरेली लोकसभा सीट से लड़ा और सीधा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनौती दी। इस चुनाव में इंदिरा गांधी चुनाव जीत गईं, परंतु राजनारायण सहित समूचे विपक्ष का आरोप था कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रायबरेली से चुनाव जीता। बस यह आरोप ही देश में 4 वर्ष बाद लगी इमर्जेंसी की नींव बना।

SC से पटखनी मिलते ही लगा आपातकाल

राजनारायण ने चुनाव में की गई धांधली के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय (HC) में याचिका दायर की। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध निर्णय सुनाया और इंदिरा विचलित हो गईं। उनके अहंकार को ऐसी ठेस पहुँचीं कि वे विवेक चूक गईं। उन्होंने पहले तो इस अदालती हार का न्यायपालिका के माध्यम से प्रतिशोध लेने के मार्ग अपनाया और सुप्रीम कोर्ट (SC) में HC के निर्णय को चुनौती दी, परंतु 24 जून, 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखने का आदेश दिया। इससे इंदिरा पूर्णत: झल्ला गईं। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दी थी। वे चाहतीं, तो रायबरेली से निर्वाचन अवैध घोषित होने के बावजूद कहीं ओर से उप चुनाव लड़ कर या राज्यसभा सदस्य बन कर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी बचा सकती थीं, परंतु इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट से मिली हार को अपने व्यक्तिगत अहंकार पर करारी चोट के रूप में लिया और आधी रात को यानी 24/25 जून, 1975 मध्य रात्रि 12.00 बजे देश में आपातकाल लागू कर दिया। इसके साथ ही देश के सभी आम नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित हो गए।

पहले मुकदमा, फिर चुनाव में दी मात

देश की शक्तिशाली नेता इंदिरा गांधी को अदालती मुकदमे में परास्त करने वाले राजनारायण इसके बाद तो देश में बनने वाली पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार के मूलाधार सिद्ध हुए। वास्तव में आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गांधी को यह लगा कि वे उनके विरुद्ध एकजुट हुई विपक्षी शक्ति को सत्ता के बल पर कुचल देंगी, परंतु इंदिरा का दमन चक्र अधिक दिनों तक नहीं चल सका। उन्होंने 1977 में चुनाव की घोषणा कर दी। अब गेंद फिर एक बार जनता के पाले में थी और जनता इंदिरा सरकार के आपातकाल तथा दमन चक्र के विरुद्ध भारी आक्रोश में थी। यही कारण है कि 1977 में न केवल कांग्रेस सत्ता से बेदखल कर दी गई, अपितु स्वयं इंदिरा गांधी भी रायबरेली से चुनाव हार गईं और उन्हें परास्त किया उन्हीं राजनारायण ने, जिन्हें इंदिरा ने 1971 में धांधली करके हराया था। राजनारायण देश के पहले ऐसे नेता बने, जिन्होंने किसी प्रधानमंत्री को चुनाव में हराया था। 15 मार्च, 1977 को बनारस में जन्मे राजनारायण प्रखर समाजवाद के नायक डॉ. राममनोहर लोहिया के शिष्यों में वे अनुपम शिष्य थे। राजनारायण गृहस्थ होते हुए भी किसी भी संन्यासी से बड़े संन्यासी कम नहीं थे। उनके-जैसे राजनेता आज दुर्लभ हैं। पद और पैसे के प्रति उनकी अनासक्ति लोगों को बहुत आकर्षित करती थी। उनके अंतिम दो-तीन वर्ष काफी कठिनाइयों से गुजरे थे।

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